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गैंडों का शिकार रोका तो और ज्यादा होने लगी हत्याएं, दो वर्षों में 32 एक सींग वाले गैंडों को शिकारियों ने बनाया निशाना

Thu, 19 Nov 2020 05:37 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 19 Nov 2020 05:37 PM IST
सार

संरक्षित जीव भारतीय गैंडों का शिकार रोकने के लिए ब्यरो की तरफ से विशेष अभियान चलाया गया। लेकिन इस अभियान के अगले दो सालों में 32 और गैंडों का शिकार कर लिया गया। यानी इस दौरान प्रति वर्ष गैंडों का शिकार 10 से बढ़कर 16 पर पहुंच गया...

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Poachers killed 32 one horned rhinos in two years
white rhino - फोटो : Amar Ujala (File)

विस्तार

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'मर्ज बढ़ता ही गया, ज्यों-ज्यों दवा की' ये पंक्तियां भारतीय वन विभाग और वन्य जीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो के ऊपर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। ब्यूरो ने संरक्षित जीवों में शामिल एक सींग वाले भारतीय गैंडों का अवैध शिकार रोकने के लिए दो वर्ष पूर्व विशेष अभियान चलाया। इसके लिए 100 से ज्यादा अतिरिक्त वन रेंजरों की भर्ती भी की। लेकिन इस अभियान के बाद गैंडों का शिकार घटने की बजाय और बढ़ गया। अभियान के पूर्व प्रति वर्ष लगभग 10 गैंडों का शिकार किया जा रहा था जो अभियान के बाद बढ़कर 16 हो गया। एक आरटीआई से यह चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है।


अधिवक्ता रंजन तोमर की एक आरटीआई का जवाब देते हुए वन्य जीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो ने बताया है कि 2018 के पूर्व दस वर्षों में एक सींग वाले 102 भारतीय गैंडों का शिकार किया गया था। यानी इस दौरान प्रति वर्ष लगभग 10 गैंडों का अवैध शिकार किया जा रहा था। यह जानकारी सामने आने के बाद हड़कंप मच गया। इसके बाद संरक्षित जीव भारतीय गैंडों का शिकार रोकने के लिए ब्यरो की तरफ से विशेष अभियान चलाया गया। लेकिन इस अभियान के अगले दो सालों में 32 और गैंडों का शिकार कर लिया गया। यानी इस दौरान प्रति वर्ष गैंडों का शिकार 10 से बढ़कर 16 पर पहुंच गया।

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लोगों की मदद से ही होगा वन्यजीवों का संरक्षण

दिल्ली चिड़िया घर के पूर्व निदेशक बीएम अरोड़ा ने अमर उजाला को बताया कि संरक्षित जीवों के संरक्षण के प्रयास में ईमानदारी न होने के कारण वन्यजीवों का लगातार शिकार होता रहता है। यही कारण है कि गैंडों के साथ-साथ शेर, चीते, गुलदार और अन्य वन्यजीवों के सामने विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। सरकार को इसके लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाकर उचित रणनीति पर काम करना चाहिए। वन्यजीवों के संरक्षण में आसपास के स्थानीय लोगों को शामिल किए बिना कोई भी प्रयास सफल नहीं होगा, इसलिए वन्यजीवों के संरक्षण अभियान में उनकी उचित भूमिका तय की जानी चाहिए।

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घास के मैदानों-वनों की कमी

बीएम अरोड़ा ने बताया कि गैंडे बच्चेपन में अपने मां के साथ जीवन बिताते हैं, लेकिन वयस्क होते ही वे अलग रहना पसंद करते हैं। झुंड में न रहने की उनकी प्रवृत्ति के कारण एक गैंडे के लिए लगभग 20-25 वर्ग किलोमीटर का वन-घास क्षेत्र चाहिए होता है। लेकिन सच्चाई यह है कि इस समय जितने भी गैंडे भारतीय वन क्षेत्रों में उपलब्ध हैं, उनके लिए भी पर्याप्त वन क्षेत्र उपलब्ध नहीं हो पाता। यही कारण है कि गैंडे अपने क्षेत्र में किसी अन्य गैंडे के आने पर उनसे लड़ जाते हैं और कई बार इसमें एक की मृत्यु भी हो जाती है।



अरोड़ा बताते हैं कि पश्चिम बंगाल की जलपाईगुड़ी, नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी गैंडों के रहन-सहन और उनके भोजन के लिए पर्याप्त इंतजाम किए जाने चाहिए। गैंडों में आपसी झगड़ा सबसे ज्यादा तालाबों पर कब्जे के लिए होता है, इसलिए क्षेत्र में उपयुक्त संख्या में तालाबों का निर्माण कराया जाना चाहिए। स्थानीय लोग किसी भी सामाजिक अभियान के सबसे बड़े हिस्सेदार होते हैं। किसी भी अभियान का सबसे बड़ा सीधा असर भी इन्हीं लोगों पर पड़ता है। इसलिए वन्य जीव संरक्षण में इनकी भूमिका को बढ़ाया जाना चाहिए। विशेषकर इन क्षेत्रों के बच्चों को वन्यजीव संरक्षण अभियान से जोड़ा जाना चाहिए। स्थानीय लोगों को वन्यजीवों के साथ साहचर्य से रहने की कला का प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए।

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