Exclusive: खुफिया एजेंसियों के रडार पर पीएमओ के अधिकारी-कर्मचारी, मांगी गई अकाउंट्स की जानकारी
साउथ ब्लॉक यानी प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ), रक्षा और विदेश मंत्रालय में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले कर्मचारियों, अधिकारियों को लेकर सरकार सतर्क हो गई है।
सरकार ने सोशल मीडिया में अधिकारियों, कर्मचारियों की मौजूदगी के संभावित खतरों को ध्यान में रखकर यह कदम उठाया है। कई सरकारी अधिकारी-कर्मचारी सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। इस वजह से केंद्र सरकार ने वहां काम करने वाले स्टाफ से उनके सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी मांगी है।
सूत्र बताते हैं कि पिछले दिनों भारतीय प्रशासनिक सेवा के दो अफसर इसके घेरे में आ गए थे। खुफिया एजेंसियां इस बारे में लगातार सतर्क रही थीं। इन अधिकारियों ने देश की एक बड़ी शख्सियत के बारे में सोशल मीडिया (फेसबुक) पर कुछ आपत्तिजनक कमेंट कर दिया था। हालांकि वह पोस्ट इन अफसरों ने नहीं डाली थी, लेकिन उन्होंने किसी दूसरे व्यक्ति की पोस्ट पर कमेंट किया था।
कमेंट करने के दो सप्ताह बाद वह पोस्ट साउथ ब्लॉक के किसी बड़े अधिकारी तक पहुंच गई। इसके बाद दोनों अफसरों से जवाब तलब किया गया। उन्होंने जिस अकाउंट के जरिए कमेंट किया था, वह सही था। दोनों अफसरों ने भी स्वीकार किया है कि वह अकाउंट फर्जी नहीं है। इसके बाद दोनों अफसरों का तबादला कर दिया गया।
सूत्रों के मुताबिक, इनमें से एक अफसर को अंडमान तो दूसरे को जम्मू कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में भेजा गया है। एक अफसर ने तो कुछ माह पहले ही अपने बच्चे का दाखिला दिल्ली के एक नामी स्कूल में कराया था, जहां अधिकतर आईएएस-आईपीएस अफसरों के बच्चे पढ़ते हैं।
इस घटना के बाद सरकार हरकत में आ गई। साउथ ब्लॉक में कार्यरत सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले सभी कर्मचारी और अधिकारी जांच एजेंसियों के राडार पर आ गए और प्रशासनिक स्तर पर इस तरह की घटना का दोहराव रोकने के लिए सभी से उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी मांग ली गई है।
सरकार सोशल मीडिया और इंटरनेट के प्रयोग पर समय-समय पर गाइड लाइन जारी करती रहती है। मंत्रालयों के कंप्यूटर को हैकर्स और सेंधमारों से बचाने के लिए भी तरह-तरह की सावधानी बरती जाती है। ऐसा भी देखने में आया है कि कुछ सरकारी कर्मी फर्जी आईडी के सहारे सूचनाओं को गलत हाथों तक आगे पहुंचाते हैं।
केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ अफसर का कहना है कि संभावित चुनौतियों को देखकर समय-समय पर इस तरह के एहतियात बरते जाते हैं। स्टाफ के लिए निर्देश जारी किया गया कि वे सोशल मीडिया पर अशांति या राष्ट्र विरोधी प्रचार करने वालों से बचें। उन पर किसी तरह का कोई कमेंट न करें और न ही उस विषय या सामग्री को आगे बढ़ायें। इसका असर यह हुआ कि स्टाफ के अनेक सदस्यों ने पुराना बिना इंटरनेट का पुराना मोबाइल फोन इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
भारत में सोशल मीडिया के नियंत्रण और नियमन बाबत कोई ठोस प्रावधान नहीं है
भारत में अभी तक सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम और दूसरे नए-नए माध्यमों पर कोई नियंत्रण नहीं है। पिछले छह माह में कई ऐसे बड़े मामले देखने को मिले, जिनमें बड़ी हस्तियों को निशाना बनाने के अलावा देश में नफरत का माहौल पैदा करने और राष्ट्र विरोधी प्रचार करने का प्रयास किया गया।
कश्मीर सहित दूसरे कई राज्यों में फेसबुक और व्हाट्सएप के द्वारा अशांति फैलाने की मुहिम चली। इसके चलते सरकार को इंटरनेट पर प्रतिबंध तक लगाना पड़ा। राष्ट्र विरोधी अफवाहों के चलते साल 2017 में सरकार ने बीस से ज्यादा इंटरनेट सेवाओं को बंद कर दिया था।
सोशल मीडिया पर फिलहाल इतना ही
अपने देश में इस बारे में दो ही बातें कही गई हैं, क्या करें और क्या न करें। इससे ज्यादा कुछ नहीं है। अगर कोई सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार करता है या कोई आपत्तिजनक सामग्री डालता है तो उस स्थिति में किसी भी तरह के सख्त कानून का अभाव है। हालांकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गत वर्ष इस दिशा में उक्त माध्यमों के दुरुपयोग पर नजर रखने के लिए एक प्रभावी योजना बनाने पर काम शुरू किया था। इस योजना में खुफिया एजेंसियों और दूसरे सुरक्षा बलों की राय भी ली गई है।
पिछले साल की कुछ घटना, जब इंटरनेट पर रोक लगानी पड़ी
- पांच जून को महाराष्ट्र सरकार ने नासिक जिले में किसानों के आंदोलन की वजह से मोबाइल इंटरनेट सेवा निलंबित कर दी।
- छह जून को मध्यप्रदेश सरकार ने भी किसानो के आंदोलन के चलते छह जिलों में इटरनेट सेवाओं पर रोक लगाई थी।
- सात जून को जम्मू कश्मीर में पीडीपी सरकार ने पांचवी बार मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद कर दी, वजह कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों के साथ झड़प में एक युवक की मौत हो गई थी। इसके बाद पत्थरबाजों ने वहां अशांति का माहौल पैदा कर दिया था।
- आठ जून को उत्तरप्रदेश सरकार ने सहारनपुर में दो समुदायों के बीच हुए झगड़े के बाद मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगा दी थी।
- पिछले छह साल में अभी तक करीब डेढ़ दर्जन राज्यों में 80 बार इंटरनेट सेवाएं निलंबित की जा चुकी हैं।