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Supreme Court: क्या पत्नी से जबरन संबंध बनाने पर दुष्कर्म केस से मिली छूट होगी खत्म? सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार
Wed, 18 Sep 2024 12:25 PM IST
काव्या मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: काव्या मिश्रा
Updated Wed, 18 Sep 2024 12:25 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में कुछ अन्य याचिकाएं भी दायर की गई हैं। कुछ याचिकाकर्ताओं ने वैवाहिक दुष्कर्म को मिली छूट की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी है कि यह उन विवाहित महिलाओं के खिलाफ भेदभाव है, जिनका उनके पति ही यौन शोषण करते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
अगर कोई व्यक्ति अपनी बालिग पत्नी को यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करता है तो क्या ऐसे में पति को दुष्कर्म के अपराध के लिए मुकदमे से छूट मिलनी चाहिए? सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अदालत इस जटिल सवाल पर याचिकाओं को सूचीबद्ध करने पर विचार करेगा।
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मामले में आंशिक सुनवाई हो चुकी है: सीजेआई
वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि याचिकाओं पर तुरंत सुनवाई की जरूरत है। इस पर देश के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि मामले में आंशिक सुनवाई हो चुकी है तथा सुनवाई पूरी करने के बाद अगले दो दिनों में कार्यभार का आकलन किया जाएगा। बता दें, पीठ में न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं।
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सीजेआई ने कहा कि मामले पर आज और कल होने वाली सुनवाई से हमें यह विचार मिलेगा। हम निश्चित रूप से वैवाहिक दुष्कर्म मामलों को सूचीबद्ध करने पर विचार करेंगे। इससे पहले, शीर्ष अदालत ने 16 जुलाई को इस मामले से जुड़ी याचिकाओं को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति व्यक्त की थी। उस समय सीजेआई ने संकेत दिया था कि मामलों की सुनवाई 18 जुलाई को हो सकती है।
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क्या है दुष्कर्म की धारा में अपवाद?
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375, जिसे अब निरस्त कर दिया गया है और भारतीय न्याय संहित द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है, दुष्कर्म (रेप) को परिभाषित करती है। इस धारा में वर्णित शर्तों में एक अपवाद भी दर्ज है जिसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। दरअसल, इस अपवाद में पति को अपनी बालिग पत्नी के साथ गैर-सहमति से यौन संबंध बनाने के लिए दुष्कर्म के तहत मुकदमा चलाने से छूट देता है। इसमें कहा गया है, 'पति अगर अपनी पत्नी के साथ, जिसकी उम्र 15 वर्ष से कम नहीं है, तो वह दुष्कर्म नहीं है।'
वहीं, नए कानून के तहत भी धारा 63 (रेप) का अपवाद 2 कहता है कि किसी शख्स द्वारा अपनी पत्नी के साथ गैर-सहमति से यौन संबंध बनाया जाता है, जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम नहीं है, तो वह दुष्कर्म नहीं है।'
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर केंद्र सरकार ने दिया था जवाब
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने 16 जनवरी 2023 को वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध के दायरे में लाने का अनुरोध करने वाली और आईपीसी के उस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था, जो पति को बालिग पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध को दुष्कर्म नहीं ठहराता है। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि इस मुद्दे के कानूनी तथा सामाजिक निहितार्थ हैं और सरकार इन याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करेगी।
बाद में, 17 मई को पीठ ने इसी तरह की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया, जिसमें इस मुद्दे पर बीएनएस प्रावधान को चुनौती दी गई थी। बता दें, आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम की जगह एक जुलाई से भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय सक्षम अधिनियम लागू किए गए हैं।
हमें वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी मामलों को निपटाना होगा: पीठ
पीठ ने कहा था, 'हमें वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी मामलों को निपटाना होगा।' इन याचिकाओं में से एक याचिका वैवाहिक दुष्कर्म के मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट के 11 मई, 2022 के खंडित फैसले के संबंध में दायर की गई है। यह अपील दिल्ली हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ताओं में से एक महिला ने दायर की थी।
दिल्ली हाईकोर्ट के दो जजों के बीच मतभेद
दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ में शामिल दो जजों, जस्टिस राजीव शकधर और जस्टिस सी हरिशंकर ने मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की अनुमति दी थी, क्योंकि इसमें कानून से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल शामिल हैं, जिनपर अदालत द्वारा गौर किए जाने की आवश्यकता है। खंडपीठ का नेतृत्व करने वाले जस्टिस शकधर ने वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद को 'असंवैधानिक' बताते हुए रद्द करने का समर्थन किया और कहा था कि यह दुखद होगा अगर आईपीसी के लागू होने के 162 साल बाद भी एक विवाहित महिला की न्याय के लिए गुहार नहीं सुनी गई। हालांकि, न्यायमूर्ति शंकर ने कहा था कि दुष्कर्म कानून के तहत पति को दी गई छूटअसंवैधानिक नहीं है और यह बोधगम्य अंतर (Comprehensible Difference) पर आधारित है। बोधगम्य अंतर की अवधारणा उन लोगों या चीजों के समूह से अलग करती है जो बाकियों से अलग हैं।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था- पति को छूट सही नहीं
एक व्यक्ति ने ऐसे ही मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। इस फैसले के चलते उस पर अपनी पत्नी से कथित तौर पर दुष्कर्म करने का मुकदमा चलाने का रास्ता साफ हो गया था। दरअसल, कर्नाटक हाईकोर्ट ने पिछले साल 23 मार्च को पारित आदेश में कहा था कि अपनी पत्नी के साथ दुष्कर्म तथा अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोप से पति को छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में कुछ अन्य याचिकाएं भी दायर की गई हैं। कुछ याचिकाकर्ताओं ने आईपीसी के सेक्शन 375 (रेप) के तहत वैवाहिक दुष्कर्म को मिली छूट की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी है कि यह उन विवाहित महिलाओं के खिलाफ भेदभाव है, जिनका उनके पति ही यौन शोषण करते हैं।