Supreme Court: राजस्थान में REET परीक्षा के दौरान इंटरनेट शटडाउन का मामला पहुंचा शीर्ष अदालत, की गई यह मांग
राजस्थान डायरेक्ट स्कूल टीचर भर्ती परीक्षा आयोजित करने के लिए जयपुर और अन्य स्थानों पर इंटरनेट सेवाओं के हालिया निलंबन के मद्देनजर इंटरनेट बंद के व्यावहारिक कार्यान्वयन पर दिशा-निर्देशों की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है।
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राजस्थान में सफलतापूर्वक REET परीक्षा कराना गहलोत सरकार और पुलिस के लिए गंभीर समस्या बनी हुई है। इस परीक्षा में करीब 9 लाख परिक्षार्थी पेपर देंगे। वहीं दूसरी ओर पेपर लीक कराने वाले गिरोह भी सक्रिय हैं। ऐसे में पेपर लीक से बचने के लिए 11 जिलों में इंटरनेट बंद करने का आदेश दिया गया था। जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। गौरतलब है कि इस परीक्षा के पेपर 2021-22 में भी लीक हो चुके हैं।
राजस्थान डायरेक्ट स्कूल टीचर भर्ती परीक्षा आयोजित करने के लिए जयपुर और अन्य स्थानों पर इंटरनेट सेवाओं के हालिया निलंबन के मद्देनजर इंटरनेट बंद के व्यावहारिक कार्यान्वयन पर दिशा-निर्देशों की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है।
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में शीर्ष कोर्ट को राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड के नियमानुसार राजस्थान डायरेक्ट स्कूल शिक्षक भर्ती परीक्षा (आरईईटी 2023) कराने के लिए संभागीय आयुक्त, भरतपुर मंडल कार्यालय द्वारा जारी 24 फरवरी के आदेश के बारे में बताया है। इस आदेश के जरिए जयपुर, भरतपुर और कई अन्य जिलों में इंटरनेट सेवाओं को निलंबन किया गया है।
याचिका में कहा गया है कि इस तरह की कार्रवाई अधिकारियों की इस तरह की परीक्षा आयोजित करने की अक्षमता को दर्शाता है।
याचिका में मांग की गई है कि ऐसी स्तिथि में मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से जीवन, स्वतंत्रता और सम्मान के अधिकार को लागू करने के लिए, राज्य सरकार अनुराधा भसीन मामले में दिए गए अदालत के फैसले के मुताबिक काम करे।
अनुराधा भसीन मामले मे जम्मू कश्मीर में सन 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाने के साथ साथ इंटरनेट सेवा बंद किए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। 2020 में अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि राज्य को इस तरह का प्रतिबंध तभी लगाना चाहिए जब स्थिति 'आवश्यक' और 'अपरिहार्य' हो।
याचिकाकर्ता ने इंटरनेट शटडाउन के व्यावहारिक कार्यान्वयन के लिए अदालत के आदेश के अनुसार निर्देश और दिशानिर्देश लागू करने की भी मांग की।
‘लिव-इन’ संबंधों के पंजीकरण के लिए नियम बनाने की मांग
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर केंद्र को ‘लिव-इन’ संबंधों के पंजीकरण के लिए नियम बनाने का निर्देश देने का आग्रह किया गया है। याचिका में ऐसे संबंधों में दुष्कर्मों और हत्या जैसे अपराधों में वृद्धि का जिक्र किया गया है। याचिका में कथित तौर पर लिव-इन पार्टनर आफताब अमीन पूनावाला द्वारा श्रद्धा वाल्कर की हत्या किए जाने का हवाला देते हुए इस तरह के रिश्तों के पंजीकरण के लिए नियम और दिशानिर्देश तैयार करने का आग्रह किया गया है।
सीबीआई और विशेष एजेंसी को जांच स्थानांतरित करने की शक्ति का बहुत कम होना चाहिए इस्तेमाल
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि सीबीआई या ऐसी अन्य विशेष जांच एजेंसी को जांच स्थानांतरित करने की शक्ति का इस्तेमाल “बहुत कम” और असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हालांकि कोई लचीला दिशानिर्देश या फॉर्मूला निर्धारित नहीं है, जांच को स्थानांतरित करने की शक्ति एक “असाधारण शक्ति” है। जस्टिस ए एस बोपन्ना और जस्टिस ए अमानुल्लाह की पीठ ने कहा, जहां अदालत तथ्यों और परिस्थितियों पर गौर करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि सीबीआई या इस तरह की अन्य विशेष जांच एजेंसी के हस्तक्षेप के बिना निष्पक्ष सुनवाई हासिल करने का कोई अन्य विकल्प नहीं है। जिनके पास जांच की विशेषज्ञता है।
नोएडा- ग्रेटर नोएडा के बिल्डरों की आठ फीसदी ब्याज दर बहाल करने की याचिका खारिज
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बिल्डरों को एक बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पिछले वर्ष सात नवंबर के आदेश के खिलाफ दायर हस्तक्षेप आवेदनों को खारिज कर दिया। उस आदेश में शीर्ष अदालत ने अपने 2020 के उस आदेश को वापस ले लिया था जिसमें बिल्डरों द्वारा अथॉरिटी को भूमि की लागत के भुगतान में देरी के लिए ब्याज दर को आठ प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया था। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि ऐस ग्रुप ऑफ कंपनीज सहित कंपनियों के विभिन्न समूहों द्वारा हस्तक्षेप आवेदन दायर किए गए हैं लेकिन वे किसी भी तरह से आम्रपाली ग्रुप ऑफ कंपनीज के घर खरीदारों की दुर्दशा से संबंधित नहीं हैं, जिन पर इस न्यायालय द्वारा न्यायिक संज्ञान लिया गया था। इस मामले में अजनबी कंपनियों के अन्य समूह द्वारा हस्तक्षेप याचिकाओं पर गौर नहीं किया जा सकता। नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता रवींद्र कुमार ने तर्क दिया कि आम्रपाली समूह की कंपनियों के साथ समानता का दावा करने के लिए ऐस ग्रुप ऑफ कंपनीज और अन्य बिल्डरों की ओर से रिकॉर्ड पर कोई सामग्री उपलब्ध नहीं है। कुमार ने तर्क दिया कि 10 जून, 2020 का आदेश मूल आदेश था।
कमजोर संवैधानिक लोकतंत्र का संकेत है पुरोहित और मान के बीच के विवाद का न्यायालय पहुंचना
पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने मंगलवार को कहा कि पंजाब के राज्यपाल द्वारा मार्च में बजट सत्र बुलाने से राज भवन और प्रदेश की आम आदमी पार्टी सरकार के बीच झगड़े का ऐसा समाधान हुआ है जो स्वागत योग्य है। उन्होंने कहा कि विधानसभा का सत्र बुलाने को लेकर राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच के विवाद का प्रश्न उच्चतम न्यायालय तक पहुंच गया था जो संवैधानिक लोकतंत्र के कमजोर होने का संकेत है। उनका कहना था कि अब राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित द्वारा विधानसभा सत्र को तीन मार्च को बुलाए जाने से विवाद का समाधान हुआ है। उन्होंने कहा कि यह कदम स्वागत योग्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी मामले में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह और अन्य के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई मंगलवार को फरीदकोट से चंडीगढ़ स्थानांतरित कर दी। न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने इस मामले में सुनवाई की। इस दौरान पीठ ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को स्वीकार किया कि उनकी जान को खतरा है।
शीर्ष अदालत डेरा अनुयायियों सुखजिंदर सिंह, शक्ति सिंह, रंजीत सिंह, निशान सिंह, बलजीत सिंह, रणदीप सिंह और नरिंदर कुमार शर्मा द्वारा दायर स्थानांतरण याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। दरअसल, 2015 के फरीदकोट बेअदबी मामले में आरोपी प्रदीप सिंह की नवंबर 2022 में पंजाब के कोटकपुरा में बाइक सवार पांच अज्ञात लोगों ने हत्या कर दी थी।
असाधारण मामलों में संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए: SC
भारत के संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत उसके अधिकार बहुत व्यापक और असाधारण हैं और दुर्लभ एवं असाधारण मामलों में इसका प्रयोग किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने जम्मू-कश्मीर के मूल निवासी इम्तियाज अहमद मल्ला की अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। मल्ला ने जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी थी।
उच्च न्यायालय ने राज्य पुलिस में एक कांस्टेबल के रूप में उनकी नियुक्ति को रद्द करने के आदेश के खिलाफ उनकी अपील को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि उनके खिलाफ एक आपराधिक शिकायत दर्ज की गई थी।
साझा हाईकोर्ट एक राज्य से दूसरे में भेज सकते हैं दीवानी मामले
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि एक हाईकोर्ट किसी दीवानी मुकदमे को एक राज्य से दूसरे में तभी स्थानांतरित कर सकता है जब दोनों राज्यों पर उसका अधिकार क्षेत्र हो। शीर्ष अदालत इस मुद्दे पर सुनवाई कर रही थी कि क्या सीपीसी की धारा 25 के तहत सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही मुकदमे, अपील या अन्य कार्यवाही को एक राज्य के सिविल कोर्ट से दूसरे में स्थानांतरित करने की शक्ति रखता है?
जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने फैसले में सीपीसी के प्रासंगिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा, सुप्रीम कोर्ट दीवानी मामलों को एक राज्य से दूसरे में स्थानांतरित करने का एकमात्र अधिकारी तभी होता है जब न्यायिक हाईकोर्ट अलग हों। पीठ ने कहा, गौहाटी हाईकोर्ट जिसके अधिकार क्षेत्र में असम, नगालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश सभी आते हैं, उसे इनमें से किसी एक से दूसरे राज्य में दीवानी मामले स्थानांतरित करने के अधिकार से नहीं रोक सकते। जस्टिस रॉय ने कहा, हाईकोर्ट सीपीसी की धारा 24 के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल करते हुए मुकदमों, अपीलों या अन्य कार्यवाही को संविधन के अनुच्छेद 231 के तहत अपने अधिकारक्षेत्र वाले राज्य में स्थानांतरित करने का हकदार है। इसमें जरूरी है कि दोनों दीवानी अदालतें उसकी अधीनस्थ होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, क्या शिंदे गुट का सदन में अनुशासन का पालन नहीं करना अयोग्यता है
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले धड़े से पूछा कि क्या महा विकास अघाड़ी (एमवीए) में गठबंधन को जारी रखने की शिवसेना पार्टी की इच्छा के खिलाफ जाने का कदम अनुशासनहीनता के कारण अयोग्यता है।
अपने रुख का बचाव करते हुए शिंदे गुट ने कहा कि विधायक दल मूल राजनीतिक दल का एक अभिन्न अंग है और पार्टी द्वारा पिछले साल जून में दो व्हिप नियुक्त किए गए थे।
प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल से कहा, यदि आप गठबंधन के साथ नहीं जाना चाहते हैं, तो यह तय करें कि सदन (राज्य विधानसभा) के बाहर। सदन के अंदर आप पार्टी के अनुशासन से बंधे हैं। फ्लोर टेस्ट की आवश्यकता उत्पन्न होती है क्योंकि पार्टी में विभाजन के कारण विधायकों का एक समूह अयोग्य हो सकता है। यदि विभाजन की वैधता स्वयं प्रश्न में है, तो फ्लोर टेस्ट आयोजित करके क्या आप अयोग्यता कार्यवाही पर प्रीमियम नहीं लगा रहे हैं ? इस पर कौल ने जवाब दिया कि शिंदे गुट में फूट का मामला ही नहीं है। उनका मामला यह है कि वे स्वयं ‘शिवसेना’ हैं और वे पार्टी के भीतर ही एक प्रतिद्वंद्वी गुट हैं, जिसमें पार्टी के सदस्यों का बहुमत है।