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SC: याचिकाकर्ताओं की अपील, समलैंगिक विवाहों की स्वीकृति के लिए अपनी पूरी शक्ति और नैतिक अधिकार का करें उपयोग

Wed, 19 Apr 2023 02:59 PM IST
देव कश्यप पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Wed, 19 Apr 2023 02:59 PM IST
सार

एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को बताया कि देश को आगे आना चाहिए और समलैंगिक विवाह को मान्यता देनी चाहिए।

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Petitioners seeking legal validation of same-sex marriage urged SC to use its plenary power
समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई। - फोटो : PTI

विस्तार

देश में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग जोर पकड़ने लगी है। इसी बीच अपनी मांग को लेकर याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। समलैंगिक विवाह की कानूनी मान्यता की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से अपनी पूरी शक्ति, प्रतिष्ठा और नैतिक अधिकार का उपयोग करने और समाज को ऐसे संघ को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम LGBTQIA व्यक्तियों को विषमलैंगिकों (Heterosexuals) की तरह "गरिमापूर्ण" जीवन जीने में मदद करेगा। LGBTQIA का मतलब लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर, क्वीर, क्वेश्चन, इंटरसेक्स और एसेक्सुअल है।

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एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को बताया कि देश को आगे आना चाहिए और समलैंगिक विवाह को मान्यता देनी चाहिए। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह पर कानून का उल्लेख किया और कहा कि समाज ने तब इसे स्वीकार किया था और कानून ने तत्परता से काम किया और सामाजिक स्वीकृति का पालन किया। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के अलावा जस्टिस एसके कौल, एसआर भट, हेमा कोहली और पीएस नरसिम्हा शामिल हैं।

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मुकुल रोहतगी ने पीठ को बताया कि इस अदालत को भी समलैंगिक विवाह को स्वीकार करने के लिए समाज को आगे लाने की जरूरत है। अदालत के पास संविधान के अनुच्छेद 142 (जो सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक किसी भी आदेश को पारित करने की पूर्ण शक्ति प्रदान करता है) के तहत शक्ति के अलावा नैतिक अधिकार है और इसे जनता का विश्वास प्राप्त है। ये अपना अधिकार सुनिश्चित करने के लिए इस अदालत की प्रतिष्ठा और नैतिक अधिकार पर भरोसा करते हैं। उन्होंने कहा कि देश को आगे आना चाहिए और समलैंगिक विवाह को मान्यता प्रदान करनी चाहिए, जो इन्हें विषमलैंगिकों की तरह एक गरिमापूर्ण जीवन जीने में मदद करेगा। 
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केंद्र का सुनवाई में राज्यों को पक्ष बनाए जाने का आग्रह
दूसरे दिन की कार्यवाही की शुरुआत में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर एक नई याचिका दायर की जिसमें शीर्ष अदालत से आग्रह किया गया कि समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता देने के अनुरोध वाली याचिकाओं पर सुनवाई में सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को पक्ष बनाया जाए। शीर्ष अदालत में दायर नए हलफनामे में केंद्र ने कहा कि उसने 18 अप्रैल को सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को पत्र लिखकर इन याचिकाओं में उठाए गए ‘मौलिक मुद्दों’ पर उनकी टिप्पणियां और विचार आमंत्रित किए हैं।



केंद्र की ओर से दायर हलफनामे में कहा गया है, इसलिए, विनम्रतापूर्वक अनुरोध किया जाता है कि सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को मौजूदा कार्यवाही में पक्षकार बनाया जाए और उनके संबंधित रुख को रिकॉर्ड में लिया जाए। साथ ही भारत संघ को राज्यों के साथ परामर्श प्रक्रिया को समाप्त करने, उनके विचार/आशंकाएं प्राप्त करने, उन्हें संकलित करने और इस अदालत के समक्ष रिकॉर्ड पर रखने की अनुमति दी जाए और उसके बाद ही वर्तमान मुद्दे पर कोई निर्णय लिया जाए।

हलफनामे में कहा गया है, यह सूचित किया जाता है कि भारत संघ ने 18 अप्रैल 2023 को सभी राज्यों को पत्र जारी कर याचिकाओं में उठाए गए मौलिक मुद्दों पर उनकी टिप्पणियां और विचार आमंत्रित किए हैं। इसमें कहा गया है कि याचिकाओं पर सुनवाई और फैसले का देश पर महत्वपूर्ण प्रभाव होगा, क्योंकि आम लोग और राजनीतिक दल इस विषय पर अलग-अलग विचार रखते हैं।

सरकार की नई याचिका का विरोध करते हुए रोहतगी ने कहा कि इन याचिकाओं में केंद्रीय कानून और विशेष विवाह अधिनियम को चुनौती दी गई है और सिर्फ इसलिए कि यह विषय संविधान की समवर्ती सूची में है, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी करने की जरूरत नहीं है। इसपर सीजेआई ने कहा, आपको इस बिंदु पर मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है।


रोहतगी ने दलील के दौरान अदालत के निर्णयों का उल्लेख किया, जिसमें सहमति से समलैंगिक यौन संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर करना शामिल है। उन्होंने कहा कि अदालत कुछ ऐसा कर रही है, जो पहले ही तय हो चुका है। उन्होंने कहा, ये विषमलैंगिक समूहों के बराबर हैं और ऐसा नहीं हो सकता कि उनका यौन अभिविन्यास (लिंग के संबंध में एक व्यक्ति की पहचान जिससे वे यौन रूप से आकर्षित होते हैं) सही हो और बाकी सभी गलत हों। 

बता दें कि शीर्ष अदालत ने पिछले साल 25 नवंबर को दो समलैंगिक जोड़ों द्वारा दायर अलग-अलग याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था। इन याचिकाओं में दोनों जोड़ों ने शादी के अपने अधिकार को लागू करने और संबंधित अधिकारियों को विशेष विवाह अधिनियम के तहत अपने विवाह को पंजीकृत करने का निर्देश देने की अपील की थी।

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