फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   patna dm cleark

'बाबू ही सिस्टम का सबसे ताकतवर आदमी है'

Wed, 24 Aug 2016 03:01 PM IST
सीटू तिवारी/ बीबीसी,पटना
सीटू तिवारी/ बीबीसी,पटना Updated Wed, 24 Aug 2016 03:01 PM IST
विज्ञापन
patna dm cleark
बाबू की कुर्सी पर डीएम - फोटो : BBC
बीते आठ महीने से पटना के जिलाधिकारी संजय कुमार अग्रवाल ‘बाबूगिरी’ की उलझनों को सुलझाने में लगे है। दरअसल जिलाधिकारी संजय अग्रवाल ने इस साल की शुरुआत में एक प्रयोग किया है। उन्होंने तय किया कि वो खुद भी कभी- कभार बाबू की कुर्सी का काम संभालेंगें। सिर्फ वही नहीं, बल्कि जिले के सभी बीडीओ, एसडीओ, डीडीसी और एसडीसी को अपने मातहतों की सीट पर बैठने और काम निपटाने का आदेश है।
विज्ञापन


अपने अनुभवों को साझा करते हुए जिलाधिकारी संजय अग्रवाल कहते हैं,'फाइल की जिंदगी तो बाबू पर ही निर्भर है। क्लर्क चाहे तो उस फाइल को मार दे या फिर जिंदा रखकर उसे अंजाम तक पहुंचाए। बाबू हमारे भारतीय सिस्टम का सबसे पावरफुल आदमी है।”
विज्ञापन


ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर ये नौबत क्यों आई? संजय अग्रवाल कहते है,'किसी भी आदमी को काम कराना है, तो उसका सबसे पहले क्लर्क से सामना होता है। लेकिन आप देखें तो क्लास तीन के स्तर पर ट्रेनिंग, मोटिवेशन, मॉनिटरिंग की कमी है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


वहां लोग काम नहीं कर रहे, क्योंकि उनकी जवाबदेही नहीं तय की गई है। ऐसे में जब कोई बड़ा अधिकारी उस जगह बैठता है, तो वो एक गाइडिंग फोर्स की तरह काम करता है। साथ ही उन पर एक तरह का दबाव भी बनता है।'

सबकी जवाबदेही तय हो

patna dm cleark
बाबू की कुर्सी पर डीएम - फोटो : BBC

2008 में दरभंगा से रिटायर हुए जिलाधिकारी उपेन्द्र शर्मा के मुताबिक,'सिस्टम में सबका काम बंटा हुआ है। सबकी जवाबदेही तय हो और सख्ती से, ट्रेनिंग के जरिए काम कराया जाए तो फिर काम लंबित होने का सवाल ही नहीं है और यही ज्यादा कारगर तरीका है।' संजय अग्रवाल भी मानते हैं कि सिस्टम में अगर बाबुओं को ज्यादा जवाबदेह बना दिया जाए, काम निपटाने के लिए समय सीमा बांध दी जाए और लोगों को इस बात की जानकारी दे दी जाए कि उनका काम किस डेस्क पर होगा, तो आम आदमी की मुश्किलें बहुत आसान हो जाएंगी।

हालांकि संजय अग्रवाल का यह प्रयोग बहुत सफल हो रहा है, ऐसा फिलहाल तो नहीं लगता। 55 साल के बैजनाथ चौधरी दानापुर से आए हैं, वो गोताखोर हैं, 15 साल की उम्र से ही उन्होंने गोताखोरी करनी शुरू कर दी थी। त्यौहारों या किसी खास मौके पर प्रशासन उनकी मदद लेता है, ताकि पानी में डूबने वालों को बचाया जा सके।

अपनी अर्जी लेकर आए बैजनाथ चौधरी कहते हैं,'पानी से आदमी निकालना आसान है, लेकिन सरकार की जेब से पैसा नहीं।' छह बच्चों के पिता बैजनाथ ने साल 2014 के दुर्गा पूजा, छठ और कार्तिक पूर्णिमा में 29 नाव और गोताखोरों के साथ टीम लीडर के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। इसके लिए सरकार को करीब एक लाख 38 हजार रुपए देने हैं, लेकिन अभी तक ये राशि बैजनाथ को नहीं मिल पाई है।

निराश बैजनाथ कहते हैं,'दानापुर में भागते भागते परेशान हो गए हैं। बाबू भगा देता है पैसा जारी नहीं करता। कोई सरकार आपने देखी है, जो गरीब का ही पैसा रख ले। सरकार और ये बाबू तो गरीब की सेवा करने के लिए बने हैं ना?' अनपढ़ बैजनाथ जो सवाल पूछ रहे हैं, शायद उससा जवाब ही पटना के जिलाधिकारी और भारत की ब्यूरोक्रेसी दोनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed