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जेल सुधार: 'जेल में पैदा हुए बच्चों को 12 साल की उम्र तक मां के साथ रहने दिया जाए', संसदीय समिति ने की सिफारिश
Thu, 21 Sep 2023 06:40 PM IST
शिव शरण शुक्ला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Thu, 21 Sep 2023 06:40 PM IST
सार
गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने यह सिफारिश भी की है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के हिसाब से गर्भवती महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जेल में भीड़भाड़ और न्याय में देरी का मुद्दा एक गंभीर चिंता का विषय बन गया।
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जेल में बंद कैदी (प्रतीकात्मक)
- फोटो : social media
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विस्तार
जेलों में बढ़ती कैदियों की संख्या और न्याय मिलने में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के बाद एक संसदीय दल ने भी चिंता जाहिर की है। भाजपा सांसद बृजलाल की अध्यक्षता वाली गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने कहा है कि जेलों में भीड़भाड़ और न्याय में देरी एक गंभीर चिंता बन गई है। इसके कारण न केवल कैदियों बल्कि पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली दोनों के लिए विभिन तरह के परिणाम देखने को मिल रहे हैं। गौरतलब है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट भी जेलों में बढ़ती कैदियों की संख्या को लेकर चिंता जाहिर कर चुका है।
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दूसरी जेलों में कैदियों को भेजने की सिफारिश
समिति ने अधिक भीड़भाड़ वाली जेलों से कैदियों को उसी राज्य या दूसरे राज्यों में खाली जेलों में भेजने की सिफारिश की है। यह भी कहा है कि इस तरह की व्यवस्था पारस्परिक होनी चाहिए और संबंधित राज्यों के बीच एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर भी किया जाना चाहिए।
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बच्चों को मां के साथ रहने दिया जाए
समिति ने कहा है कि जेल में पैदा होने वाले बच्चों को 12 वर्ष की उम्र तक उनकी मां के साथ ही रहने दिया जाना चाहिए। इससे बच्चों को पालन-पोषण का बेहतर माहौल भी मिलेगा और शुरुआती वर्ष में उनकी भलाई और विकास भी सुनिश्चित हो सकेगा। समिति ने कहा है कि बच्चों के खान-पान, रहने के स्थान, शिक्षा और शारीरिक विकास का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। इसके अलावा उनके लिए खेलकूद और मनोरंजन के साधन भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। समिति ने ट्रांसजेंडर कैदियों के लिए भी पर्याप्त सुविधाएं मुहैया कराने की सिफारिश की है।
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बता दें कि दिशानिर्देशों के अनुसार, भोजन, आश्रय, चिकित्सा देखभाल, शिक्षा और शारीरिक विकास को देखते हुए बच्चों की उचित देखभाल पर जोर दिया जाना चाहिए। इसके अलावा इन बच्चों को खेल और मनोरंजन की सुविधाएं भी मुहैया कराई जानी हैं।
ट्रांसजेंडर कैदियों के लिए की ये सिफारिश
इसके अलावा समिति ने यह भी कहा है कि ट्रांसजेंडर कैदियों के लिए अन्य कैदियों को दी जाने वाली स्वास्थ्य सुविधाएं दी जानी चाहिए। साथ ही उनकी लिंग पहचान के आधार पर भेदभाव किए बिना आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच होनी चाहिए।
देश की जेलों में इतने कैदी
गौरतलब है कि जेलों में कैदियों की संख्या कम करने के लिए सरकार द्वारा उठाए जा रहे विभिन्न कदमों के बावजूद, इस समय भारत की जेलों 5.54 लाख कैदी हैं जबकि जेलों की क्षमता की 4.25 लाख है। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब और हरियाणा के कैदी देश में कुल कैदी आबादी का 50 प्रतिशत से ज्यादा हैं। इन छह राज्यों में से चार में जेलों में बंदी दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इसके अलावा, उत्तराखंड राज्य ने 185 प्रतिशत की उच्चतम अधिभोग दर दर्ज की है। देश में सबसे अधिक अपराध दर 1479.9 वाली दिल्ली में अधिभोग दर 182 प्रतिशत है। देश के सभी कैदियों में से 50 प्रतिशत से अधिक विचाराधीन कैदी हैं।
पुरुष कैदियों की तुलना में महिला कैदी ज्यादा असुरक्षित
NCRB द्वारा तैयार की गई प्रिज़न स्टैटिस्टिक्स इंडिया 2021 रिपोर्ट के अनुसार, देश में 22,918 महिला कैदी हैं। कुल महिला कैदियों में से 1,650 महिला कैदियों के साथ 1,867 बच्चे हैं। पैनल ने पाया कि महिला कैदी पुरुष कैदियों की तुलना में अधिक असुरक्षित हैं। उनमें से कई को सामान्य जेलों में कैद किया गया है क्योंकि भारत में महिला जेलें कम हैं।