भारत सरकार ने पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज को मरणोपरांत देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण तथा पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर परिकर को मरणोपरांत पद्म भूषण से नवाजने का एलान किया है।
पद्म पुरस्कार: कौन हैं ये शख्सियत और समाज के लिए क्या किया इन्होंने खास, पढ़ें और जानें
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भोपाल गैस पीड़ितों के जब्बार भाई
अब्दुल जब्बार (63) मध्यप्रदेश के भोपाल के थे। इन्हें वॉइस ऑफ भोपाल के नाम से जाना जाता है। भोपाल गैस त्रासदी के बाद महिलाओं और पीड़ितों की आवाज को उठाते रहे। भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के बैनर तले दो हजार से ज्यादा महिलाओं आत्मनिर्भर बनाया। हैंडपंप फिटर के तौर पर करियर शुरू करने वाले जब्बार भाई ने गैस पीड़ितों के लिए 35 वर्षों तक संघर्ष किया। इन्होंने गैस त्रासदी में मारे गए लोगों की विधवाओं को प्रशिक्षण दिया और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया। भोपाल गैस त्रासदी में इन्होंने अपना परिवार खो दिया था। फेफड़ों में तकलीफ के साथ 50 फीसदी आंखों की रोशनी चली गई थी। पिछले साल इनका निधन हुआ।
जगदीश लाल आहूजा : रोजाना सैकड़ों लोगों भरते पेट
पंजाब के रहने वाले चौरासी वर्षीय जगदीश लाल आहूजा को सामाजिक कार्य के लिए पद्मश्री सम्मानित किया जाएगा। इन्हें ‘लंगर बाबा’ के नाम से जाना जाता है। साल 1980 से ये लगातार गरीब लोगों को मुफ्त में भोजन मुहैया करा रहे हैं। साल 2000 से पीजीआई के बाहर गरीब बीमार व उनके तीमारदारों रोजाना करीब 2000 से ज्यादा लोगों को ये भोजन के साथ ही उन्हें वित्तीय मदद के साथ ही कपड़े आदि भी देते हैं हैं। आपका जन्म पाकिस्तान के पेशावर में हुआ था, लेकिन विभाजन के चलते अपना सब कुछ वहीं छोड़कर खाली हाथ भारत आना पड़ा। लोगों की मदद को आपने जमीन-जायदाद बेच दी।
मोहम्मद शरीफ: धर्म-जाति से ऊपर, करते हैं लावारिस शवों का अंतिम संस्कार
चाचा शरीफ के नाम से विख्यात मोहम्मद शरीफ को सामाजिक कार्य के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा। उत्तर प्रदेश के रहने वाले 80 वर्षीय मो. शरीफ फैजाबाद व उसके आसपास मिली लावारिस शवों का दाह-संस्कार करते हैं। पेशे से साइकिल मकैनिक मो.शरीफ पिछले 25 साल के दौरान पच्चीस हजार से ज्यादा लावारिस शवों का दाह संस्कार करा चुके हैं। इस दौरान वह इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि मृतक का आखिरी संस्कार उसके धर्म के अनुरूप हो। हिंदू शव का वो जहां दाह संस्कार करते हैं तो मुस्लिम शव को सुपुर्द ए-खाक की रस्म निभाते हैं।
जावेद अहमद टाक : दिव्यांगता नहीं होने दी हावी
मन में अगर कुछ करने का जज्बा हो तो बड़ी से बड़ी बाधा भी छोटी मालूम पड़ती है। समाज सेवा के लिए पद्मश्री से सम्मानित होने वाले कश्मीर के अनंतनाग जिले के बिजबहाड़ा के 46 वर्षीय ‘अनंतनाग के अपने’ जावेद अहमद टाक 1997 में आतंकी गोली के चलते दिव्यांग हो गए और तब से व्हीलचेयर पर हैं। लेकिन उन्होंने अपनी दिव्यांगता को ही अपनी हिम्मत बना लिया। वे पिछले दो दशक से अपनी ह्यूमेनिटी वेलफेयर आर्गेनाइजेशन कश्मीर एवं जैबा आपा स्कूल के जरिए कश्मीर के विशेष बच्चों को मुख्य धारा में शामिल करने के लिए काम करते हैं। करीब 100 ऐसे विशेष बच्चों को वे निशुल्क शिक्षा व अन्य मदद दे रहे हैं। इसके साथ ही अनंतनाग और पुलवामा के 40 से अधिक गांवों के लिए बच्चों के लिए परियोजनाओं का कार्यान्वयन किया