भाजपा की चुनाव प्रबंधन कला के आगे पस्त हैं विरोधी राजनीतिक दल
चुनाव के लिए भाजपा काफी पहले से तैयारियां करती है। सबसे बड़ी बात है कि पूरा संगठन प्रधानमंत्री मोदी के बाद शाह को काफी बड़ा चेहरा मानकर चल रहा है...
चुनाव के लिए भाजपा काफी पहले से तैयारियां करती है। सबसे बड़ी बात है कि पूरा संगठन प्रधानमंत्री मोदी के बाद शाह को काफी बड़ा चेहरा मानकर चल रहा है...
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विधानसभा चुनावों का नतीजा चाहे जो आए, लेकिन पश्चिम बंगाल भाजपा के उपाध्यक्ष राजकमल पाठक का कहना है कि पार्टी ने चुनाव का एजेंडा खड़ा कर दिया है। जनता बदलाव का मन बनाती दिखने लगी है। तृणमूल कांग्रेस के नेता और राज्य सरकार में मंत्री पार्थो चटर्जी भी मानते हैं कि मुख्य मुकाबले में भाजपा है।
कांग्रेस की एक तेज तर्रार नेता का कहना है कि जैसे असम में भाजपा को पूरे राज्य में ध्रुवीकरण करने में सफलता मिल चुकी है। भाजपा ने असम सरकार के साथ मिलकर संसाधन, योजना और प्रबंधन के बूते हालात को अनुकूल बना रखा है। कांग्रेस को भी कुछ सामानांतर सोचना होगा, नहीं तो विधानसभा चुनाव की लड़ाई कठिन होगी।
क्या है भाजपा की सफलता का राज?
भाजपा हर राज्य विधानसभा चुनाव में हिंदुत्व, राष्ट्रवाद के एजेंडे को प्रमुखता से बनाए रखती है। राज्यसभा सांसद विनय सहस्रबुद्धे की टीम के एक सदस्य का कहना है कि मुद्दों के साथ-साथ भाजपा के पास प्रधानमंत्री मोदी और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह का चेहरा है। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता है और अमित शाह की राजनीतिक शैली।
चुनाव प्रबंधन, प्रचार अभियान, राजनीतिक सर्वे पर काम कई चुनाव में कर रहे सुमित भाष्कर का कहना है कि चुनाव के लिए भाजपा काफी पहले से तैयारियां करती है। सबसे बड़ी बात है कि पूरा संगठन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद अमित शाह को काफी बड़ा चेहरा मानकर चल रहा है।
जेपी नड्डा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी भाजपा की कार्यशैली में कोई फर्क नहीं आया है। अभी भी अमित शाह पार्टी और संगठन को मजबूत बनाने की मुख्य कड़ी बने हुए हैं। सुमित कहते हैं कि इससे भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं को जमीनी स्तर पर अपना अभियान चलाने के लिए भरपूर उत्साह मिल जाता है।
इसके साथ-साथ पार्टी के पास पन्ना प्रमुख, बूथ प्रबंधन और जमीनी स्तर पर झंडा उठाने वाले कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है। सुमित के मुताबिक भाजपा को छोड़ दें तो दूसरे किसी भी दल के पास न तो इस तरह से संसाधन हैं और न ही प्लानिंग और प्रबंधन से राजनीतिक अभियान चल रहा है।
राजनीतिक हितों से समझौता नहीं करती भाजपा
हाल में भाजपा की राजस्थान में सहयोगी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) ने साथ छोड़ा। इस पार्टी को बनाने से पहले इसके नेता हुनमंत बेनीवाल भाजपा में ही थे। इससे पहले किसान आंदोलन शुरू होते ही अकाली दल (बादल) ने भाजपा का साथ छोड़ दिया था। महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने भी उसका साथ छोड़ा और 2014-19 के दौरान भाजपा के 16 सहयोगी दलों ने उसका साथ छोड़ा।
भाजपा के सहयोगी दल के नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहते हैं कि बिहार विधानसभा का चुनाव देख लीजिए। भाजपा ने कैसे अपने सहयोगी दल लोजपा और जद(यू) के बीच तिलिस्मी समीकरण बनाकर अपना हित साथ लिया।
इतना ही नहीं अरुणाचल के जद(यू) विधायकों को भी साथ ले आए। जद(यू) महासचिव और प्रवक्ता केसी त्यागी ने भी इसे लेकर भाजपा को आईना दिखाया। इसमें सबसे दिलचस्प प्रकरण अमित शाह से जुड़ा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पहले कार्यकाल के चार साल पूरा होने पर भाजपा मुख्यालय में पत्रकारों से चर्चा के दौरान शाह ने स्पष्ट किया था।
उनका यह स्पष्टीकरण बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर था। नीतीश लोकसभा चुनाव में सीटों को लेकर अपनी राजनीतिक कसरत कर रहे थे। इस पर अमित शाह ने कहा कि उन्हें जहां (जिस दल के साथ) ज्यादा ठीक लगेगा, उसके साथ रहेंगे। हम इसमें क्या कर सकते हैं। पार्टी अध्यक्ष के नाते हमारा प्रयास सहयोगियों के साथ उचित व्यवहार करते हुए भाजपा को मजबूत बनाना है।