सिर्फ आईआईटी की मुहर नहीं चाहिए, सही कोर्स का चुनाव कर रहे हैं विद्यार्थीः प्रो. शलभ
जागरुकता के चलते अब युवा इंजीनियरिंग के साथ उच्च शिक्षा के अन्य विकल्पों पर भी फोकस कर रहे हैं। यही कारण है कि बोर्ड, जेईई मेन टॉपर भी आईआईटी की बजाय अन्य कोर्स में दाखिला ले रहे हैं। यह समाज के लिए बेहतर संदेश है कि अब युवाओं को 12वीं कक्षा के बाद जानकारी रहती है कि उसे किस क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना है। यह मानना है आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर और जेईई एडवांस 2018 के चेयरमेन प्रो. शलभ का। वे कहते हैं कि इसे नकरात्मक की बजाय सकारात्मक नजरिये से देखने की जरूरत है।
प्रश्न: जेईई मेन के लिए छात्रों की संख्या 2014 के मुकाबले 2020 में 4.21 लाख कम हुई है। इंजीनियरिंग में छात्रों की संख्या घटने की क्या वजह हो सकती है?
जवाब: जेईई मेन की परीक्षा देने का अब एक साल में दो बार मौका है। इसलिए यह कहना मुश्किल होगा कि जेईई मेन में छात्रों की संख्या कम हो रही है। अब छात्र जेईई मेन की तैयारी कोचिंग से करते हैं। कोचिंग में जाकर छात्रों को जानकारी मिल जाती है कि उन्हें परीक्षा में किस प्रकार का स्कोर मिल सकता है। क्योंकि कोचिंग सेंटर परीक्षा के आधार पर बेहतर स्कोर लेने वाले छात्रों के अलग ग्रुप बना देते हैं। इसके अलावा जागरुकता के चलते छात्र को पता होता है कि जेईई मेन की मेरिट में यदि डेढ़ लाख से अधिक नंबर होगा तो कहां दाखिला मिलेगा। इसलिए वे जेईई मेन के साथ विदेश, लॉ, यूपीएससी के अलावा अन्य क्षेत्र में भविष्य बनाने पर फोकस कर लेते हैं।
प्रश्न: इंजीनियर कम होते हैं तो क्या नुकसान है? चिंता क्यों नहीं करनी चाहिए?
जवाब: आईआईटी, एनआईटी, आईआईआईटी समेत बड़े इंजीनियरिंग कॉलेजों में सीटें कम नहीं हुई हैं। इसके अलावा अब ऑनलाइन काउंसलिंग में सीट बेहद कम खाली रहती हैं। इसका अर्थ है कि इंजीनियर पास आउट करने वालों का आंकड़ा कम नहीं हुआ है। हां जो अचानक से रातोंरात इंजीनियरिंग कॉलेज खुल गए थे, वे अवश्य बंद हुए हैं। क्योंकि डिग्री देने के अलावा वे छात्रों को किसी प्रकार का तकनीकी ज्ञान नहीं दे पाते थे। इसलिए चिंता करने की जरुरत नहीं है। पारंपरिक इंजीनियरिंग कोर्स की बजाय अब नए जमाने के तकनीक व डिमांड वाले कोर्स को छात्र पसंद करते है।
प्रश्न: उद्योग संगठन लगातार कह रहे हैं कि अधिकतर इंजीनियर नौकरी योग्य नहीं है। इसके लिए क्या बदलाव करने होंगे?
जवाब: इंडस्ट्री की मांग बिल्कुल सही है। इसीलिए आईआईटी समेत बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज इंडस्ट्री की मांग व जरूरत के आधार पर कोर्स व पाठ्यक्रम और ट्रेनिंग करवाते हैं। आईआईटी कानपुर हर तीन से पांच साल में अपना पाठ्यक्रम में बदलाव करता है। इसके अलावा नई तकनीक को शामिल करता रहता है।
क्योंकि इंजीनियर का काम इंडस्ट्री के साथ मिलकर काम करना होता है। अच्छे इंजीनियरिंग संस्थान बदलाव कर रहे हैं और अच्छे परिणाम भी दिखते हैं। कैंपस प्लेसमेंट में यही इंडस्ट्री अधिकतर युवाओं को प्लेसमेंट अच्छे पैकेज के साथ दे रही हैं।
प्रश्न : मेडिकल शिक्षा के लिए प्रवेश परीक्षा में छात्रों की संख्या दोगुना से अधिक बढ़ी है। क्या इसे कैरियर विकल्प के प्रति एक पूरी पीढ़ी की सोच में परिवर्तन कहना सही होगा?
जवाब: इंजीनियरिंग पर तो जानकारी दे सकता हूं पर मेडिकल क्षेत्र में नहीं। क्योंकि उससे अधिक जुड़ाव नहीं रहा है।
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