One year of Russia-Ukraine war: जो कभी थे रेस्टोरेंट चेन और बेकरी के मालिक, आज कर रहे शेफ और असिस्टेंट की जॉब
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विस्तार
मुझे याद है कीव का मेरा वह रेस्टोरेंट, जिसे बरसों की कड़ी मेहनत और खून पसीने की कमाई से खड़ा किया था। लेकिन कैसे एक झटके में अपना बसा बसाया पूरा संसार मुझे यूक्रेन से छोड़ना पड़ा था। इंडिया से हमारे साथ यूक्रेन आए दोस्तों का भी अब साथ नहीं रहा। मैं नीदरलैंड में इंडियन रेस्टोरेंट का शेफ हो गया हूं। यहां तक आने और जिंदगी को फिर से जीरो से शुरू करने का बड़ा कठिन और मुफलिसी भरा दौर रहा है। बाकी मेरे कुछ दोस्त दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चले गए। कीव में रहने वाले मेरे पड़ोसी पता नहीं जिंदा भी हैं या नहीं। नीदरलैंड से फोन पर अमर उजाला डॉट कॉम से बात करते-करते हैदराबाद के पिताली श्रीकांत भावुक हो गए। यूक्रेन और रूस के युद्ध में एक साल गुजरने के बाद अमर उजाला डॉट कॉम से उन सभी लोगों से एक बार फिर से बात की, जो पिछले साल युद्ध के दौरान अपना सब कुछ छोड़कर यूक्रेन से जा रहे थे और हमसे अपना दर्द साझा किया था।
पड़ोसियों को सौंपा रेस्टोरेंट
हैदराबाद के रहने वाले पिताली श्रीकांत कहते हैं कि यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध को तो एक साल हो गया, लेकिन उनकी जिंदगी कई दशक पीछे चली गई। अपनी कहानी बताते हुए वह कहते हैं कि पिछले साल आज के दिन ही यूक्रेन और पोलैंड के बॉर्डर पर फंसे हुए थे। कीव में अपना चलता हुआ पूरा रेस्टोरेंट्स ऐसे ही छोड़ आए थे। भावुक होते हुए श्रीकांत कहते हैं कि मैंने अपने पड़ोसियों से कहा था अब यह पूरा रेस्टोरेंट्स तुम्हारे हवाले है। उसकी चाबी भी मैं उन्हें ही दे आया था। वादा तो यही किया था कि अगर सब कुछ सामान्य हुआ, तो फिर वापस यूक्रेन आऊंगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। पता चला कि मेरे जो पड़ोसी थे वह भी युद्ध में मारे गए। मैं भी दर-दर भटकता रहा। जैसे-तैसे पोलैंड पहुंचा। कुछ दिन मुझे शरण मिली, लेकिन कुछ ऐसा नहीं जमा कि मैं अपनी रोजी-रोटी चला सकता। वहां से मैं दोस्तों से पैसा उधार लेकर पेरिस पहुंचा। कुछ दिन नौकरी की तलाश की लेकिन कुछ नहीं मिला।
पिताली श्रीकांत कहते हैं कि युद्ध ने पूरी जिंदगी तबाह कर दी। आखिरकार दर-दर भटकते हुए नीदरलैंड आ गया। कभी यूक्रेन की राजधानी कीव में सबसे बड़े इंडियन रेस्टोरेंट में से एक का मैं मालिक हुआ करता था, आज मैं नीदरलैंड में एक इंडियन रेस्टोरेंट का शेफ हूं। फिर से जिंदगी एकदम जीरो से शुरू की है। इस उम्मीद के साथ कि शायद एक बार फिर से मैं वही सब कुछ हासिल कर सकूंगा, जिसे मैं यूक्रेन में खो आया हूं। श्रीकांत कहते हैं कि जिंदगी कभी भी रुकती नहीं है। लेकिन युद्ध जिंदगियों को नेस्तनाबूद कर देता है। पिताली को दुख इस बात का है, कि आपने जिन दोस्तों के साथ मिलकर उसने यूक्रेन की सड़कों पर सपने संजोए थे। लेकिन जब यूक्रेन मलबों के ढेर में तब्दील हो रहा था, तो सारे दोस्त अलग-अलग हो गए। अब उनके साथ काम करने वाला कोई भी दोस्त एक साथ नहीं बल्कि दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में रहकर जिंदगी को फिर से जीने का संघर्ष कर रहा है।
बिछड़ गए यार-दोस्त भी
मुंबई के अभिनव से पिछले साल आज के ही दिन अमर उजाला डॉट कॉम ने यूक्रेन के हालातों पर बात की थी। फिलहाल बड़ी मुश्किल से अभिनव का नंबर मिल सका। अभिनव यूक्रेन युद्ध की त्रासदी में पूरी तरह से बर्बाद हो गए। बातचीत करते हुए अभिनव कहते हैं कि वह भी सबसे पहले पोलैंड पहुंचे। वहां पर उन्हें बहुत ज्यादा दिनों तक शरण नहीं मिल सकी। सरकारी मदद से वह अपने एक दोस्त के साथ नीदरलैंड गए। अभिनव कहते हैं पोलैंड तक उनके साथ दोस्त जो कीव में उनके साथ बिजनेस करते थे, सब साथ में थे। लेकिन जैसे-जैसे पोलैंड से बिछड़ने की बारी आती गई सभी दोस्त ऐसे बिछड़ रहे थे कि पता नहीं दोबारा उनसे मुलाकात होगी पाएगी या नहीं। कुछ दिन नीदरलैंड में रहने के बाद अभिनव कनाडा के विनिपेग पहुंच गए। फिलहाल वहां पर एक प्राइवेट फर्म में काम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि बड़े अरमानों से यूक्रेन गए थे। खूब मेहनत की। दौलत कमाई। घर खरीदा। गाड़ियां खरीदी। तीन रेस्तरां की चेन शुरू की। युद्ध ने सब बर्बाद कर दिया। जमी जमाई गृहस्थी उसी कीव शहर में छोड़ आए। भावुक होते हुए अभिनव कहते हैं अपने पड़ोसियों से यह कह कर आए थे कि अगर हम लोग फिर कभी वापस आए तो ठीक...वरना यह सब घर और कारोबार आप लोग संभालिएगा। वह कहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं कि उनका घर और कारोबार वह पड़ोसी देख भी पाए होंगे या वह भी युद्ध में खत्म हो गए होंगे।
डिपार्टमेंटल स्टोर पर असिस्टेंट की नौकरी
इसी तरह विजयवाड़ा के श्रीकांत भी पिछले साल यूक्रेन में अपना सब कुछ छोड़ कर जब पोलैंड बॉर्डर पर जा रहे थे तो अमर उजाला डॉट कॉम ने उनसे बात की थी। ठीक एक साल बाद दोबारा श्रीकांत से जब संपर्क कर अब उनकी जिंदगी के बारे में जानने की कोशिश की तो उनका नया कॉन्टैक्ट नंबर नहीं मिल सका। जैसे तैसे उनके दोस्तों से बात होती गई, तो संपर्क मिलता गया। फिलहाल श्रीकांत भी कनाडा के विनिपेग में अब अभिनव के साथ ही हैं। श्रीकांत कीव में एक बड़ी बेकरी के मालिक थे, वह विनिपेग में डिपार्टमेंटल स्टोर में असिस्टेंट की नौकरी कर रहे हैं। श्रीकांत कहते हैं कि यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध को एक साल हो गया है। जो बर्बादी दिख रही है उसकी तह में आप जब जाएंगे तो पता चलेगा कि इस युद्ध की जद में तो पीढ़ियां बर्बाद हो गई। श्रीकांत अपना उदाहरण देते हुए कहते हैं कि क्या कमी थी मेरे पास कीव में। कनाडा, अमेरिका, यूके और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हम छुट्टियां मनाने जाया करते थे। जिस कनाडा में वह सिर्फ छुट्टियां मनाने आते थे। आज उसी देश में एक डिपार्टमेंटल स्टोर पर असिस्टेंट की नौकरी कर रहे हैं। अपना सब कुछ छोड़कर वह दर-दर की ठोकर खाने पर मजबूर हो गए थे। वह कहते हैं कि ईश्वर ने उन्हें नई जिंदगी दी है। वह कहते हैं कि मैं दोबारा फिर से खुद को एक बार जिंदगी में साबित करने के लिए संघर्ष कर रहा हूं। लेकिन वह दुआ करते हैं कि जितनी जल्दी हो सके उसका युद्ध खत्म हो जाए।