अजित डोभाल के पुराने मंत्र ने फिर बदल दिया भारत-चीन में संबंधों का खेल

शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 07 Jul 2020 04:43 PM IST
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india china border disputes
india china border disputes - फोटो : पीटीआई (फाइल)

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सार

  • दोनों देश बफर जोन बनाने पर हुए राजी, दोनों देशों ने हटाई सेना
  • राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल और विदेश मंत्री वांग यी के बीच बनी सहमति
  • लेकिन पैंगोंग त्सो क्षेत्र को लेकर अभी साफ नहीं है तस्वीर
  • अजित डोभाल का पुराना मूलमंत्र- भिन्नता वाले मसले पर नहीं टकराएं, मित्रता की राह पर बढ़ें आगे

विस्तार

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का पुराना मूल मंत्र है - भिन्नता वाले मुद्दे पर आपस में न टकराएं। इसी मंत्र से डोकलाम विवाद के दौरान भी भारत ने चीन को महत्वपूर्ण संदेश दिया था। यही मंत्र पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में भारत और चीन की सेना के बीच में बनी तनातनी में भी काम आया है।
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अजित डोभाल ने चीन के विदेश मंत्री यांग यी से हॉटलाइन पर रविवार शाम पांच जुलाई को बात की। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने के लिए नियुक्त विशेष प्रतिनिधियों में यह वार्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लेह-लद्दाख की यात्रा के ठीक अगले दिन हुई है।
वार्ता के ठीक बाद भारत और चीन ने 30 जून को सैन्य कमांडरों के बीच बनी सहमति को जमीन पर आकार देना शुरू किया है।

गलवां घाटी क्षेत्र में हटे पीछे, बना बफर जोन

सैन्य सूत्र बताते हैं कि गलवां नदी क्षेत्र में चीन की फौज कोई 1.5 किमी से अधिक पीछे हटी है। भारत ने भी अपनी फौज पीछे हटाई है। चीन ने अपने स्थाई टेंटों आदि को खुद हटाया और पीछे की तरफ गए हैं।
यह वही क्षेत्र है, जहां 15 जून को दोनों देशों के सैनिकों में हिंसक झड़प हो गई थी और दोनों देशों को नुकसान उठाना पड़ा था। भारत के 20 से अधिक सैनिक शहीद हो गए थे। बताते हैं भारत और चीन के बीच में विवादित क्षेत्र को छोड़कर दोनों देशों की सेनाएं अपने-अपने क्षेत्र में पेट्रोलिंग करने पर सहमत हो रही हैं। सूत्र बताते हैं कि विवादित क्षेत्र को बफर जोन की तरह से व्यवहार में लाए जाने की योजना है।

असहमति न बने टकराव की वजह

अजित डोभाल और यांग यी के बीच में सहमति बनी है कि भारत और चीन सीमा क्षेत्र मामले में जहां भी असहमति (भिन्नता, विवाद) है, उसे टकराव का रूप नहीं लेने देंगे।

दोनों देश सहमत हैं कि इस आधार पर सीमा क्षेत्र में शांति बनाए रखेंगे। इसके लिए यथासंभव और यथाशीघ्र कुछ चरणों में विवादित क्षेत्र से दोनों देश अपनी सेना को हटाकर पहले की स्थिति में ले जाएंगे।

दोनों शीर्ष स्तर के विशेष प्रतिनिधियों ने सहमति जताई है कि दोनों देश इस सहमति का पालन करेंगे और एक दूसरे को इस सहमति के प्रति आश्वस्त करेंगे।

भारत और चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का सम्मान करेंगे और कोई भी देश सीमा क्षेत्र में एकतरफा कार्रवाई जैसा कदम नहीं उठाएगा।

इतना ही नहीं सहमति का आधार यह भी है कि दोनों देशों के संबंधित अधिकारी इस पर कार्य करते रहेंगे, ताकि इस तरह के टकराव का दोहराव न होने पाए।

इसके लिए दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के निपटारे में सहयोग और समन्वय के लिए बना सैन्य अधिकारियों, राजनयिकों का समूह तय प्रोटोकॉल के आधार पर अपना काम करता रहेगा।

चीन का बयान उलझा रहा है

भारत का दावा पैंगोंग त्सो के इलाके में फिंगर आठ तक का है। अभी चीन के सैनिक गलवां के पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 से पीछे हट रहे हैं, लेकिन पैंगोंग क्षेत्र को लेकर अभी कोई स्पष्टता नहीं है।

भारत और चीन के बयान में कहीं यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों देशों के सैनिक अप्रैल 2020 से पहले वाली यथास्थिति में लौट जाएंगे। चीन के बयान में कहा गया है कि भारत और चीन की सेना के बीच में अग्रिम टुकड़ियों को पीछे हटाने पर सहमति बनी है। अग्रिम टुकड़ियों का जिक्र केवल चीन के वक्तव्य में है। भारत के बयान में नहीं है।

चीन की तरफ से पूरी तरह से सेना को पीछे हटाने और पुरानी स्थिति को बहाल करने का कोई जिक्र नहीं है। ऐसे में अभी स्थिति साफ नहीं है कि आगे पूर्वी लद्दाख में चीन का रुख क्या रहेगा? पैंगोंग क्षेत्र का क्या रहेगा?

चीन के बयान में भारत को दी है नसीहत

चीन के विदेश मंत्री ने अपने वक्तव्य में भारत-चीन के बीच में तनाव के कई और पक्षों पर राय दी है। वांग यी के वक्तव्य में कहा गया है कि भारत और चीन अपने व्यापक हितों को देखते हुए विकास और रिश्तों में जीवंतता को प्राथमिकता देंगे।

दोनों देश एक-दूसरे को विकास के अवसर देंगे। अपने यहां लोगों में बन रही एक दूसरे के प्रति विरोध की राय को भी सही दिशा देंगे। वांग यी के इस वक्तव्य से साफ है कि भारत सरकार द्वारा चीन के 59 एप्स, चीनी कंपनियों के व्यापार पर लगाई जा रही रोक का चीन पर गहरा असर पड़ा है।

चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से बातचीत में इस पर प्रतिवाद किया है और इस तरह की स्थितियों को दूर करने के लिए कहा है। चीन यहां एक तरह से भारतीय पक्ष को नसीहत देता हुआ दिखाई दे रहा है कि रिश्तों को लेकर एकतरफा बनाया जा रहा वातावरण ठीक नहीं है।

इसे लेकर दोनों देश अपने यहां सही दिशा में काम करेंगे।

वक्तव्य में एक लाइन गलवां नदी घाटी क्षेत्र में हुई हिंसक झड़प पर भी है। यहां वांग यी के हवाले से कहा जा रहा है कि हाल में चीन-भारत पश्चिमी सीमा क्षेत्र के गलवां घाटी में गलत या सही, जो भी हुआ उससे बहुत स्पष्ट है कि चीन सीमा क्षेत्र में शांति और अमन के साथ-साथ अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता की सुरक्षा को जारी रखेगा।

एनएसए डोभाल का पुराना मंत्र आया काम

याद कीजिए 73 दिन की डोकलाम में भारत-चीन फौज की तनातनी। तब भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की यही ट्रिक काम आई थी। उन्होंने चीन के शिखर नेता के पास संदेश भिजवाया था कि भारत-चीन सीमा पर तनाव से ज्यादा बड़े द्विपक्षीय हित हैं। दोनों देश एशिया में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और दोनों को आपसी तालमेल, सहयोग तथा समन्वय से अर्थव्यवस्था समेत अन्य रणनीतिक साझेदारी की तरफ देखना चाहिए।

इसके बाद डोकलाम में दोनों देशों के बीच सहमति बन गई थी।

मई 2020 में दोनों देशों की सेनाओं के बीच में लद्दाख क्षेत्र में बनी टकराव की स्थिति के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने एक बार फिर अपने इसी मंत्र को आजमाया।

पहले चीन के मोबाइल एप पर प्रतिबंध, फिर प्रधानमंत्री मोदी का चीनी सोशल मीडिया वीबो से अपना प्रोफाइल हटाना, कई मंत्रालयों का चीन की कंपनियों के ठेके रद्द करना और चीनी सामानों के बहिष्कार की देशभर में अपील ने चीन पर सही असर डाला।

माना जा रहा है कि एनएसए की यह रणनीति काम कर गई। इसी रणनीति के तहत शुक्रवार को प्रधानमंत्री ने भी लेह का दौरा भी किया था।

सुधरेंगे रिश्ते

दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के बाद अच्छी खबर आई है। चीन और भारत दोनों ने अमल किया। अपनी जगह से पीछे हटे, सेना भी शांति, सहयोग और समन्वय की स्थापना के लिए पीछे हटाई गई है।

आगे सैन्य कमांडर्स और स्थापित अधिकारी समूह के बीच में चर्चा चलती रहेगी। उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही चीन और भारत के सैनिक अप्रैल 2020 की स्थिति में आते हुए बैरक में चले जाएंगे।

देखना ये होगा कि क्या पैंगोंग त्सो इलाके से चीन के सैनिक अपने बंकर, टेंट, सैन्य संरचना को हटाकर पीछे लौट जाएंगे?
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