चुनावी हो-हल्ला: नेताओं के लिए सफल होने का शॉर्टकट तरीका हैं चुनाव प्रबंधक, तमाशा बन गई हैं रैलियां और रोड-शो
'आज प्रधानमंत्री मोदी के मंच पर मिथुन चक्रवर्ती खुद को 'कोबरा' बताते हैं। इससे रैली या रोड शो मनोरंजन बन गया है, गंभीर चुनाव प्रचार खत्म हो चुका है।'
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देश में कई हिस्सों में चुनावी माहौल है, ऐसे में वहां जमकर रैलियां और रोड शो आयोजित किए जा रहे हैं। ये भारतीय चुनावी परंपरा का खास हिस्सा रहे हैं। यह अलग बात है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में जब ऐसे रोड शो होते हैं तो वहां 'नेताजी' को जनता से संवाद करना पड़ता है। छोटी जनसभा होती है तो वहां भी जनता सवाल पूछती है और उम्मीदवार उनका जवाब देता है।
रोड-शो में सेलिब्रिटी हावी
जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और राजनीतिक एवं सामाजिक मामलों के जानकार डॉ. आनंद कुमार बताते हैं, भारत में कभी रोड शो और रैलियां 'राजनीतिक कार्यक्रम' का हिस्सा होती थीं। सिद्धांतों के आधार पर बातचीत होती थी और भावी नेता वहीं पर अपना एक वृहद दृष्टिकोण तैयार कर लेते थे। आज के दौर में रोड शो और रैलियां, राजनीतिक कार्यक्रम का प्लेटफॉर्म नहीं रहे। ये तमाशा और मनोरंजन का साधन बन गए हैं। रोड शो में नेताओं के साथ सिनेमा जगत के कलाकार, क्रिकेटर या अन्य कोई सेलिब्रिटी देखने को मिलती है। क्या सिद्धांतों का पलड़ा इतना कमजोर हो गया है कि नेताजी को रोड शो में अपनी सफलता तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ा है। पार्टी संगठन और चुनाव, जब ये दोनों अलग हुए तो प्रशांत किशोर जैसे लोगों का कारोबार चल पड़ा।
रैली-रोड-शो से वोटर पर प्रभावित करने की कोशिश
डॉ. आनंद कुमार ने अमर उजाला डॉट कॉम के साथ 'रोड शो और रैलियां' विषय पर विस्तृत बातचीत की है। वे कहते हैं, पहले ये रोड शो और रैलियां, राजनीतिक एवं लोक शिक्षण का एक जरिया होते थे। प्रचार का साधारण एवं आकर्षक तरीका रहता था। 'नेताजी' लोगों के साथ संवाद कर लेते थे। अब वह सब नहीं रहा। हर नेता चाहता है कि उसकी रैली में कुछ ऐसा हो कि वह देश ही नहीं, बल्कि दुनिया में भी चर्चित हो जाए। दूसरी पार्टियों के लोगों को भी उनके तौर तरीकों का पता चले।
नेताओं की सोच रहती है कि इन सबका वोटरों पर असर पड़ता है। वैसे भी हमारे देश में चुनाव किसी उत्सव से कम नहीं होते। मेले जैसा माहौल रहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव होता है तो राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ट्रेन यात्रा कर लोगों के बीच पहुंचते हैं। रास्ते में छोटी-मोटी वार्ता हो जाती है। जब वे लोगों के बीच पहुंचते हैं तो वहां संवाद होता है। लोग सवाल पूछते हैं और नेता को जवाब देना पड़ता है। भारत में संवाद प्रक्रिया अब पूरी तरह खत्म हो गई है। यहां रैली और रोड शो में नेताजी हाथ जोड़ते हैं या जनता का अभिवादन करते हैं, इसके बाद सड़कों पर उनका शक्ति प्रदर्शन शुरू हो जाता है।
पहले चेहरों पर होता था भरोसा
प्रो. आनंद कुमार, अतीत को ध्यान में रखते हुए कहते हैं, पहले चुनाव में चेहरा बड़ा होता था। लोग जानते थे कि उनके बीच में जो शख्स आ रहा है, वह 'करनी और कथनी' में पास हो चुका है। नेहरु, पटेल, नम्बूदरीपाद और वाजपेयी जैसे कई नेता ऐसे थे, जिनका चेहरा और नाम विश्वास के साथ लिया जाता था। वे लोगों के संपर्क में रहते थे। उनकी रैलियों में लोग अपना पैसा खर्च कर पहुंचते थे। आज हालत ये है कि रैली या रोड शो के लिए लोगों को घर से गाड़ी लेकर जाती है और लौटते वक्त पांच सौ रुपये का नोट जेब में डाल दिया जाता है।
बीच में वह दौर भी आया, जब नेताओं ने अभिनेताओं का साथ लेना शुरू किया। यानी उनकी अपनी छवि कहीं न कहीं धूमिल हो रही थी। मुलायम सिंह ने जया बच्चन को आगे किया तो राजीव गांधी ने अमिताभ बच्चन को राजनीतिक मंच देने का प्रयास किया था। विनोद खन्ना, जयाप्रदा, चेतन चौहान हेमामालिनी और गौतम गंभीर जैसे अनेक सिने और क्रिकेट स्टार राजनीतिक मंच पर आते रहे। आज पीएम मोदी के मंच पर मिथुन चक्रवर्ती खुद को 'कोबरा' बताते हैं। इससे रैली या रोड शो मनोरंजन बन गया है, गंभीर चुनाव प्रचार खत्म।
सिद्धांत का पलड़ा अब कमजोर होता जा रहा है। अधिकांश नेता दूसरे साधनों की बदौलत सफलता की तलाश में हैं। रोड शो और रैली में कितने लोग हैं जो अपनी मर्जी से पहुंचते हैं। दोनों जगहों पर भीड़ में असामाजिक तत्वों को मौका मिलता है। बाहरी लोग चुनाव प्रचार में आ जाते हैं। बंगाल चुनाव में यह उदाहरण सामने है। दबंगई और सामंतवादी दृष्टिकोण का बोलबाला है। इतिहास गवाह है कि उचित साधनों के अभाव में जब सत्ता मिलती है तो उसका जवाब पीढ़ियों को देना पड़ता है।
गांधी आज भी पूजे जाते हैं, जिन्ना नहीं
मोहम्मद अली जिन्ना की आलोचना बंद नहीं हुई है और गांधी जी हर देश में पूजे जाते हैं। प्रो. आनंद ने कहा, आज चुनाव व्यवसाय बन चुका है। पहले पार्टी और संगठन मिलकर चुनाव लड़ते थे। अब चुनाव में ये दोनों अलग हो जाते हैं। चुनाव में बाजारवाद हावी होने लगता है। प्रशांत किशोर जैसे लोगों को मौका मिलता है। वे कभी ममता दीदी के साथ हैं तो कभी नीतीश कुमार के पास पहुंच जाते हैं। अब कांग्रेस के पास चले गए हैं। इनकी जरूरत इसलिए पड़ी है क्योंकि नेता बिना किसी सिद्धांत के और शॉर्टकट तरीके से सफल होना चाहते हैं। चुनावी पोस्टर पर मुद्दों की बजाए चेहरों की भरमार रहती है। पेड न्यूज जैसे आइटम यहीं से निकले हैं। नव मध्यम वर्ग, नव दलित वर्ग और युवा, रैली या रोड शो से ज्यादा सरोकार नहीं रखते।