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Supreme Court: 'गुरु का सम्मान सिर्फ मंच पर नहीं, वेतन में भी दिखे', अदालत ने कहा- ऐसा करना ज्ञान का अपमान

Fri, 22 Aug 2025 09:58 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पवन पांडेय Updated Fri, 22 Aug 2025 09:58 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि अगर देश को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नवाचार और उज्ज्वल भविष्य चाहिए तो शिक्षकों को गरिमा और न्यायसंगत वेतन देना ही होगा। तभी शिक्षा प्रणाली मजबूत होगी और देश सच्चे अर्थों में ज्ञान का आदर कर पाएगा।

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Not offering teachers respectable emoluments lowers value country places on knowledge: SC
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन और सुविधाएं न देना इस बात को दर्शाता है कि देश ज्ञान को कितनी कम अहमियत देता है। अदालत ने कहा कि ऐसा करने से उन लोगों का उत्साह भी टूटता है, जिन पर आने वाली पीढ़ियों का बौद्धिक और नैतिक निर्माण करने की जिम्मेदारी है।
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शिक्षक देश की रीढ़- सुप्रीम कोर्ट
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने शिक्षकों, प्राध्यापकों और व्याख्याताओं को राष्ट्र की 'बौद्धिक रीढ़' बताया। अदालत ने कहा कि ये लोग अपने जीवन को आने वाली पीढ़ियों के मस्तिष्क और चरित्र गढ़ने में समर्पित कर देते हैं।
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समान काम, समान वेतन
गुजरात में अनुबंध पर नियुक्त कुछ सहायक प्राध्यापकों के मामले में अदालत ने 'समान काम के लिए समान वेतन' के सिद्धांत को लागू किया। पीठ ने कहा कि ऐसे शिक्षकों को नियमित सहायक प्राध्यापकों के बराबर न्यूनतम वेतनमान मिलना चाहिए। यह फैसला गुजरात हाई कोर्ट के दो अलग-अलग आदेशों के खिलाफ दाखिल अपीलों पर आया था। इन मामलों में शिक्षकों ने समान काम करने के बावजूद वेतन में भारी असमानता को चुनौती दी थी।

सम्मान केवल नारों से नहीं- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि शिक्षकों के सम्मान का जिक्र केवल मंचों पर मंत्र पढ़ने से पूरा नहीं होता। अदालत ने याद दिलाया कि हम अक्सर सार्वजनिक समारोहों में संस्कृत मंत्र 'गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः' का उच्चारण करते हैं। लेकिन अगर सचमुच इस पर विश्वास है, तो यह शिक्षकों के साथ व्यवहार और वेतनमान में भी झलकना चाहिए।


शिक्षकों की हालत चिंताजनक- कोर्ट
पीठ ने शिक्षकों की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि यह और भी चिंताजनक है कि व्याख्याताओं को, जो सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत थे, लगभग दो दशक तक बहुत ही कम वेतन पर गुजारा करना पड़ा। अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि गुजरात में कुल 2720 स्वीकृत पदों में से केवल 923 पद ही नियमित शिक्षकों से भरे गए हैं। बाकी जगह राज्य सरकार ने अस्थायी और संविदा नियुक्तियां कर रखी हैं ताकि पढ़ाई का सिलसिला जारी रहे।

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मात्र 30 हजार पर गुजारा खेदजनक- कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बेहद खेदजनक है कि सहायक प्राध्यापक जैसे महत्वपूर्ण पद पर काम कर रहे शिक्षक मात्र 30000 रुपये मासिक वेतन पा रहे हैं। अदालत ने टिप्पणी की- 'अब समय आ गया है कि राज्य सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से उठाए और शिक्षकों के काम के आधार पर उनके वेतन ढांचे का पुनर्निर्धारण करे।'
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