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No Confidence Motion: राहुल के बाद इस जोड़ी ने संसद में संभाला मोर्चा, अविश्वास प्रस्ताव पर सोनिया हुईं सक्रिय

Wed, 26 Jul 2023 06:10 PM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Wed, 26 Jul 2023 06:10 PM IST
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सार
No Confidence Motion: 15 अगस्त के बाद मुंबई में होने वाली इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इंक्लूसिव एलायंस (इंडिया) की बैठक कई मायनों में अहम साबित होगी। यह बैठक विपक्षी गठबंधन की भविष्य की दिशा और दशा दोनों तय करेगी। इस बैठक में गठबंधन के संयोजक के साथ अध्यक्ष पद पर भी चर्चा होगी...
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No Confidence Motion: Sonia gandhi became active on no-confidence motion
No Confidence Motion - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार

विपक्षी दलों की बेंगलुरु में हुई बैठक के बाद अब संसद के मानसूत्र सत्र में भी विपक्षी एकता मजबूत नजर आ रही है। चाहे कांग्रेस हो या आप या फिर इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दल सभी एक दूसरे का सदन में पूरा समर्थन कर रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द होने के बाद संसद में कांग्रेस की तरफ से पूरी कमान पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने संभाल ली है। खरगे दोनों सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले रोज विपक्षी दलों के सदस्यों की बैठक कर मोदी सरकार को घेरने की रणनीति तैयार कर रहे हैं। खरगे राज्यसभा में भी सरकार को आक्रामक तरीके से घेर रहे हैं। जबकि कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी लोकसभा में ज्यादा सक्रिय नजर आ रही हैं। मंगलवार को सोनिया जैसे ही संसद पहुंचीं, तो उन्होंने सबसे पहले धरने पर बैठे आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह से मुलाकात की। सोनिया ने संजय सिंह से हालचाल जाना और तबियत का ध्यान रखने की सलाह देते हुए कहा कि आपको हमारा पूरा समर्थन है। इसी बीच ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि लोकसभा में सरकार के खिलाफ आ रहे अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा में कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी भी हिस्सा ले सकती हैं।  

बेंगलुरु की बैठक से ही सक्रिय हैं सोनिया गांधी

इन दिनों सोनिया गांधी ठीक उसी तरह से विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास कर रही हैं जिस तरह वे 2004 में यूपीए को एक प्लेटफार्म पर ले आईं थीं, तब उन्हें सफलता भी मिली थी। कुछ वैसा ही प्रयास वे '2024' के लिए कर रही हैं। कर्नाटक में हुई विपक्षी एकता की बैठक में सोनिया गांधी के डिनर में न केवल सभी नेता शामिल हुए, बल्कि बैठक में उनके द्वारा दिए गए सुझावों पर भी विपक्षी गठबंधन सहमत नजर आया। संसद सत्र के पहले दिन उनकी पीएम मोदी से लोकसभा में मुलाकात भी हुई थी। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच करीब एक मिनट तक बातचीत भी हुई। इस दौरान सोनिया ने पीएम मोदी से मणिपुर की घटना पर बयान की बात भी रखी। पीएम मोदी ने सोनिया की बात सुनने के बाद कहा कि ठीक है, हम इसे देखेंगे।

कांग्रेस पार्टी की राजनीति को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक रशीद किदवई कहते हैं, ये बात ठीक है कि सोनिया गांधी ने पहले भी विपक्ष को एक साथ लेकर चलने की कोशिश की है। वे इसी प्रयास में लगी रहीं कि एक समान विचारधारा वाले सभी दल साथ आ जाएं। साल 2004 की राजनीतिक परिस्थितियों में विपक्ष पूरी तरह बिखरा हुआ था। उस वक्त भी सोनिया गांधी ने विपक्ष को एकजुट किया था। उसके बाद लगातार दस साल केंद्र में यूपीए की सरकार रही।

किदवई कहते हैं कि साल 2014 के बाद राजनीतिक स्थितियां बदल गईं। अब सियासत में नए खिलाड़ी आ गए। हालांकि अब सोनिया गांधी का वैसा राजनीतिक प्रभाव भी नहीं रहा। फिर भी वे प्रयासों में लगी हैं। उनकी रणनीति सटीक है। उन्होंने मल्लिकार्जुन खरगे को पार्टी अध्यक्ष बनाकर न केवल अपनी पार्टी के भीतर के असंतोष को शांत किया, बल्कि विपक्ष को भी एक संदेश दे दिया। विपक्ष के जो नेता किसी वजह से राहुल गांधी को पसंद नहीं करते, वे खरगे के साथ बातचीत करने में सहजता महसूस करते हैं। कुछ ऐसे भी नेता हैं, जिन्हें खरगे या राहुल की बजाए, सोनिया गांधी पर भरोसा है, वे वहां जाकर अपनी बात रख सकते हैं। मतलब, अब विपक्षी दलों को आपसी एकता के लिए कई विकल्प दे दिए गए हैं।

इंडिया गठबंधन की अध्यक्ष हो सकती हैं सोनिया गांधी

15 अगस्त के बाद मुंबई में होने वाली इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इंक्लूसिव एलायंस (इंडिया) की बैठक कई मायनों में अहम साबित होगी। यह बैठक विपक्षी गठबंधन की भविष्य की दिशा और दशा दोनों तय करेगी। इस बैठक में गठबंधन के संयोजक के साथ अध्यक्ष पद पर भी चर्चा होगी। इसी बीच यह मांग जोर पकड़ रही है कि कांग्रेस को इंडिया गठबंधन की अध्यक्षता की दावेदारी करनी चाहिए। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस इंडिया गठबंधन के अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी पेश कर सकती है। पार्टी का मानना है कि सबसे बड़ा विपक्षी दल होने के नाते इंडिया का अध्यक्ष कांग्रेस से ही होना चाहिए। इस पद के लिए कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी पहली पसंद हैं। सूत्रों का कहना है कि बेंगलुरु बैठक में कई वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया गांधी से अध्यक्ष पद संभालने का आग्रह भी किया था लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं हुई।

विपक्षी कुनबे के लिए इसलिए अहम हैं सोनिया

  • सोनिया गांधी देश की सबसे सीनियर नेताओं में से एक हैं। ममता बनर्जी हों या मायावती या फिर शरद पवार, क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ सोनिया की अच्छी बनती है।
  • 2004 में जब यूपीए का गठन हुआ तब सोनिया ही थीं, जो रामविलास पासवान और एम करुणानिधि को एक साथ ले आई थीं।
  • पटना की बैठक में राहुल गांधी मुख्य भूमिका में थे। बेंगलुरु में बातचीत की मेज पर सोनिया के होने से कहानी बदल गई। अगर बैठक में क्षेत्रीय दलों ने अपनी ओर से किसी का नाम गठबंधन की अध्यक्षता के लिए नहीं दिया तो उसकी वजह सोनिया को ही माना गया।
  • कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बैठक में साफ किया कि पार्टी की दिलचस्पी पीएम पद में नहीं है। सोनिया की मौजूदगी से उस मैसेज को मजबूती मिली। वह 2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकरा चुकी हैं।
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