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भगवान न करे लॉकडाउन में पड़े किसी को खून की जरूरत, खाली हुए ब्लडबैंक!

Wed, 22 Apr 2020 04:56 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 22 Apr 2020 04:56 PM IST
सार

  • संक्रामक रोगों से लड़ने की क्षमता प्रभावित होने का डर रक्तदान में कमी का बड़ा कारण
  • रक्त की आवश्यकता हो तो ई-रक्त कोश से ले सकते हैं मदद

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no blood in blood bank during lockdown, thalassemia patients are suffering with severe scarcity of blood
blood donation - फोटो : File

विस्तार

लॉकडाउन में जब पूरे देश का ध्यान कोरोना मरीजों पर टिका हुआ है, अन्य रोगों से बीमार लोगों की परेशानी बढ़ गई है। एम्स सहित कई अस्पतालों में मरीजों को खून मिलने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है तो मरीजों के सेवादारों को अपना डोनर लाने के लिए कहा जा रहा है।
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इस स्थिति में थैलेसीमिया पीड़ितों के लिए समस्या गंभीर हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना के समय में संक्रमण के डर से लोग खून देने से भी डर रहे हैं। रक्तदाताओं की कमी के कारण ब्लड बैंक में भी रक्त की कमी हो रही है जिससे समस्या गंभीर हो रही है।

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इसे देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने ई=ब्लड कोश की स्थापना कर रक्त की कमी दूर करने का प्रयास किया है। किसी को भी रक्त की आवश्यकता हो तो वह ऑनलाइन पोर्टल ई-रक्त कोश (eraktkosh.in) पर मदद ले सकता है। इस पर सभी राज्यों के ब्लड बैंक की जानकारी दी गई है।

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कोरोना के कारण लोगों में डर

रक्तदान के मामले में अग्रणी संस्था रेडक्रॉस इंडिया की निदेशक डॉक्टर वनश्री सिंह ने अमर उजाला को बताया कि कोरोना के संक्रमण के हालात देखकर लोगों में डर समाया हुआ है। लोग डर रहे हैं कि अगर वे रक्तदान के लिए कैंप में आते हैं तो अन्य लोगों के संपर्क में आने से उन्हें भी कोरोना हो सकता है।


रेडक्रॉस अकेले दिल्ली में ही रोज कई कैंप लगाता था, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर एक या दो रह गई है। कैंप में पहले जहां भारी संख्या में लोग आते थे, अब उनकी संख्या 20 से 25 रह गई है।

इसका सीधा असर रक्तदान की क्षमता और लोगों को रक्त उपलब्ध कराने पर हुआ है। जबकि कैंपों में रक्तदान के दौरान संक्रमण इत्यादि से बचने की पूरी सावधानी बरती जाती है।

रेडक्रॉस औसतन सौ से 125 यूनिट ब्लड रोजाना विभिन्न मरीजों को उपलब्ध करवाता था, लेकिन इस समय इसकी संख्या 20 के आसपास रह गई है। ऐसा रक्त की उपलब्धता के कारण भी हुआ है, साथ ही विभिन्न अस्तालों में अनावश्यक सर्जरी को बाद के लिए टाल दिया गया है।

सड़कों पर वाहनों के चलने पर भी प्रतिबंध लगा हुआ है। लिहाजा सड़क दुर्घटनाएं नहीं हो रही हैं। इस कारण भी रक्त की आवश्यकता कम हुई है।

संक्रामक रोगों से लड़ने की क्षमता कमजोर होने का डर

लॉयन्स ब्ल़ड बैंक के शीर्ष अधिकारी हीरेंद्र शहरावत ने बताया कि कोरोना काल में संक्रामक रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित पर काफी चर्चा हो रही है।

स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन भी आयुर्वेद के उपाय अपनाकर लोगों से संक्रामक रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित करने की अपील कर रहे हैं। रक्त में उपस्थित सफेद रक्त कणिकाएं (WBC) बाहरी रोगाणुओं-विषाणुओं से हमारे शरीर की सुरक्षा करती हैं।

ऐसे में लोगों को भ्रम है कि अगर वे रक्तदान करते हैं तो इससे रोगों के प्रति लड़ने की उनकी क्षमता कमजोर हो सकती है। लेकिन यह एक भ्रम है। रक्तदाताओं के शरीर से आवश्यक मात्रा में ही रक्त निकाला जाता है और जल्दी ही शरीर इसकी भरपाई कर लेता है।

अगर व्यक्ति के शरीर से केवल प्लाज्मा (रुधिर का एक महत्वपूर्ण भाग) निकाला जाता है तो इसकी तेज वापसी होती है। व्यक्ति एक हफ्ते में दो बार तक प्लाज्मा का दान कर सकता है, जबकि लाल रुधिर कणिकाओं की भरपाई के मामले अस्थिमज्जा 36 दिन तक का समय ले सकती है। दो पूर्ण रक्तदान के मामले में अंतर रखना आवश्यक होता है।

लॉयन्स ब्लड बैंक भी रोजाना लगभग 100 यूनिट तक रक्त लोगों को दान करता है, लेकिन रक्तदाताओं की कमी के कारण वह 15 से 20 यूनिट ब्लड ही दे पा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण रक्तदाताओं की कमी है। वे जागjtकता फैलाकर रक्तदाताओं को रक्तदान के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

एम्स के डॉक्टरों ने किया रक्तदान

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) के डॉक्टर विजय कुमार ने बताया कि लोगों में रक्तदान को लेकर काफी भ्रम है। इसे दूर करने के लिए उन्होंने स्वयं अपने कुछ साथियों के साथ रक्तदान किया।

उन्होंने बताया कि रक्त के लिए इस समय लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि लोग रक्त देने के लिए सामने कम आ रहे हैं। मरीजों को अपने साथ किसी डोनर को लाना पड़ रहा है लेकिन कई मामले में यह मुश्किल हो जाता है।

थैलेसीमिया के मरीजों की मुश्किल बढ़ी

थैलेसीमिया के मरीजों को रक्त की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। उनके शरीर में बनने वाला रक्त ऑक्सीजन की आवश्यकता पूरा नहीं कर पाता। अनुमानतः इस समय थैलेसीमिया के देशभर में 2.25 लाख मरीज हैं। अकेले दिल्ली में इनकी संख्या लगभग 2400 है। प्रतिवर्ष थैलेसीमिया के सात से दस हजार नए मरीज जुड़ जाते हैं।

थैलेसीमिया पीड़ित आठ वर्ष के बच्चे को दस से बारह दिन के बीच एक यूनिट ब्लड की आवश्यकता होती है, जबकि दस से बारह वर्ष के बच्चे को लगभग 25 दिन में दुबारा रक्त देने की आवश्यकता पड़ सकती है।

हालांकि, मरीज की स्थिति देखते हुए डॉक्टर इसका अंतिम निर्णय करता है। अगर शरीर में हीमोग्लोबीन की मात्रा 9.5 तक होती है, तब रक्त नहीं दिया जाता, लेकिन हीमोग्लोबीन की मात्रा इससे कम होने पर दुबारा रक्त चढ़ाया जाता है।

कितने दिन तक रखा जा सकता है सुरक्षित

एक बार रक्त लेने के बाद विशेष पैकिंग में उसे 35 दिन से लेकर एक वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। रुधिर को सुरक्षित रखने के लिए बने फैगम बैग में लाल रुधिर कणिकाओं को 42 दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जबकि प्लेटलेट्स को केवल पांच दिनों तक ही सुरक्षित रखा जा सकता है।



वहीं रक्त का विशेष भाग फ्रेश फ्रोजेन प्लाज्मा सही तरीके से रखा जाए तो इसका एक साल तक इस्तेमाल करना सुरक्षित होता है।

ई-रक्त कोश से ब्लड की जरूरतों पर नजर

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने कहा कि किसी भी मरीज को रक्त की कमी नहीं होने दी जाएगी। ऑनलाइन पोर्टल ई-रक्त कोश के जरिए देश भर के ब्लड बैंकों की स्थिति पर नजर रखी जा रही है। किसी को भी रक्त की आवश्यकता हो तो वह इससे संपर्क कर सकता है।

इंडियन रेडक्रॉस ने भी अपने यहां एक कंट्रोल रूम स्थापित कर ब्लड की आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिश की है। कोई भी व्यक्ति रक्त के लिए 011-23359379, 9319982104 और 9319982105 नंबरों पर फोन कर सकता है। जो लोग रक्तदान के इच्छुक हों वे भी इन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं।

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