Nitish Kumar: नीतीश के आरक्षण दांव को कितना घायल करेगा BJP का 'राम बाण', जनता के हित की किसे है चिंता
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विस्तार
नीतीश कुमार ने बिहार में पिछड़ों-दलितों के आरक्षण का दायरा बढ़ाने का प्रस्ताव पास कर दिया है। राहुल गांधी पहले ही आरक्षण के दायरे को बढ़ाकर दलितों-पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में ज्यादा भागीदारी देने की वकालत कर चुके हैं। कांग्रेस ने चुनावी राज्यों में जातिगत जनगणना कराने का वादा कर भी दिया है। संभावना है कि जल्द ही कुछ कांग्रेस शासित राज्यों में भी बिहार की ही तरह आरक्षण के दायरे को बढ़ाने का प्रस्ताव पास कर दिया जाए। यह 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष का सबसे बड़ा दांव होगा।
भाजपा विपक्ष के इस दांव का बखूबी समझ भी रही है और इसकी काट खोजने की कोशिश भी कर रही है। यदि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी कैबिनेट की बैठक भगवान राम के दरबार अयोध्या में लगाते हैं, तो इसका संबंध चुनावों से जोड़कर ही देखा जा रहा है। लोकसभा चुनावों के ठीक पहले 22 जनवरी को राम मंदिर का उद्घाटन करना और इसके पहले विहिप द्वारा पूरे देश में इसके लिए विभिन्न कार्यक्रमों के जरिये माहौल बनाने को भी 2024 के लोकसभा चुनाव से ही जोड़कर देखा जा रहा है। बड़ा सवाल है कि इस लड़ाई में किसकी जीत होगी? और अंततः जनता का हित किसमें है?
जातिगत आरक्षण ने बिहार को क्या दिया?
पिछले तीन दशक से ज्यादा समय से बिहार में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार यादव, राबड़ी देवी और जीतनराम मांझी की सरकार रही है। ये सभी नेता पिछड़े और दलित समुदाय से ही हैं। यदि ये नेता चाहते तो विभिन्न योजनाओं के सहारे दलितों, पिछड़ों और महादलितों के कल्याण के लिए बड़ा काम करते और इनके जीवन में बड़ा परिवर्तन कर सकते थे। लेकिन स्वयं नीतीश सरकार के जातिगत आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि इन वर्गों में गरीबी के आंकड़े भयावह हैं।
बिहार सरकार की रिपोर्ट के अनुसार पिछड़े वर्ग के 33.16 फीसदी, अति पिछड़ा में 33.58 फीसदी, अनुसूचित जाति में 42.93 फीसदी और अनुसूचित जनजाति में 42.70 फीसदी परिवार गरीब हैं। ये आंकड़े ये बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सरकार की योजनाएं गरीबों का आर्थिक और सामाजिक स्तर ऊपर उठाने में सफल नहीं रही हैं। आज भी इन परिवारों के युवकों को दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में बेहद निम्न आय वर्ग की नौकरी करनी पड़ रही हैं।
अपनी असफलता छिपाना चाहती है सरकार
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडे ने अमर उजाला से कहा कि यदि इन्हीं वर्गों के नेताओं के होते हुए भी इन्हीं वर्गों की समस्याएं दूर नहीं हुई हैं, तो इसके लिए वे लंबे समय से सत्ता से दूर रही उच्च जातियों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। ये आंकड़े स्वयं इन सरकारों की असफलता के प्रमाणिक दस्तावेज हैं। केवल आरक्षण देकर और जातिवाद का दांव चलकर सरकार अपनी इस असफलता को छुपाना चाहती है।
लेकिन उत्तर भारत के राज्यों में जातिवाद की गंभीरता से इस बात पर संदेह नहीं किया जा सकता कि विपक्ष का यह वार भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होने वाला है। केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं और राम मंदिर के भावनात्मक मुद्दे वे वह लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश अवश्य कर रही है, लेकिन इससे उसे कितनी सफलता मिल पाएगी, यह अभी से नहीं कहा जा सकता।
विकास के सहारे जीतेंगे जनता का दिल- भाजपा
भाजपा प्रवक्ता जयराम विप्लव ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा समाज के हर वर्ग के विकास के लिए समर्पित रही है। उनकी पार्टी ने जातिगत जनगणना का भी कभी विरोध नहीं किया है। लेकिन नीतीश कुमार जनता को केवल जातिगत राजनीति में उलझाकर अपनी नाकामियां छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि समाज के हर वर्ग का विकास करने के लिए औद्योगिक विकास का कोई खाका सरकार ने खींचने की कोशिश की होती, तो उसे इस तरह की कोशिश कर अपनी असफलता को छिपाने की आवश्यकता न पड़ती।
क्या राम मंदिर के बहाने भाजपा धार्मिक आधार पर राजनीति नहीं कर रही है? अमर उजाला के इस प्रश्न के उत्तर में भाजपा नेता जयराम विप्लव ने कहा कि आर्थिक क्षेत्र के विद्वान मानते हैं कि पर्यटन के क्षेत्र में कम लागत लगाकर भी अधिक से अधिक युवाओं को रोजगार दिया जा सकता है। यही कारण है कि अयोध्या, काशी, महाकाल और अन्य धार्मिक केंद्रों का लगातार विकास किया जा रहा है।
आंकड़े बता रहे हैं कि काशी क्षेत्र का विकास करने के बाद वाराणसी में लोगों की आय में भारी वृद्धि हुई है। इसी तरह का विकास सरदार पटेल की एकता मूर्ति को बनाकर गुजरात के केवड़िया क्षेत्र की तस्वीर बदल गई है। उन्होंने कहा कि भाजपा के लिए राम केवल आस्था के प्रतीक मात्र नहीं हैं, वह इनसे जुड़े धार्मिक केंद्रों का विकास करके जनता की आर्थिक स्थिति बेहतर करने की योजना पर काम कर रही है। इसे चुनावी राजनीति की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।