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निर्भया केस में 'आरोप साबित नहीं' लिखे जाने के बाद भी प्रताड़ित हुए दिल्ली पुलिस के ये तीन अफसर

Wed, 08 Jan 2020 02:42 AM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 08 Jan 2020 02:42 AM IST
सार

  • निर्भया केस में तीन साल बाद भी दिल्ली पुलिस के तीन अफसरों को नहीं मिल सकी थी राहत
  • एसीआर में सौ फीसदी अंक लेने वाले ज्वाइंट सीपी को समय पर नहीं मिली पदोन्नति
  • जांच के दायरे में स्पेशल सीपी और डीसीपी सहित करीब दर्जनभर पुलिस अफसरों को क्लीन चिट 
  • घटना में इस्तेमाल बस का आठ बार चालान और छह बार जब्त करने वाले अफसरों को अभी तक राहत नहीं

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Nirbhaya case : three senior officers of delhi police Tortured even after Accusations not proved
Nirbhaya case - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

निर्भया केस में विभिन्न जांच आयोगों की क्लीन चिट मिलने के बावजूद ट्रैफिक पुलिस के तीन अफसरों को गृह मंत्रालय से लंबे समय तक राहत नहीं मिली। नतीजा, एसीआर (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) में सौ फीसदी अंक लेने वाले एक ज्वाइंट सीपी की तीन साल तक पदोन्नति अटक गई। बाकी बचे दो अफसर, जिनमें एक डीसीपी और तत्कालीन एसीपी शामिल थे, उन्हें भी सेवाकाल के दौरान मिलने वाले लाभ खत्म होने का भय सताता रहा।
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बता दें कि 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली के वसंत विहार में हुए निर्भया कांड के बाद ट्रैफिक पुलिस के तत्कालीन ज्वाइंट सीपी सत्येंद्र गर्ग, डीसीपी प्रेमनाथ और उस समय एसीपी रही अनिता राय के खिलाफ जांच शुरू हुई थी। इनके अलावा तत्कालीन स्पेशल सीपी (पीसीआर) दीपक मिश्रा को भी जांच के दायरे में लिया गया था। हालांकि यूपीए सरकार के अंतिम सप्ताह यानी 2014 में उन्हें क्लीन देकर डीजी रैंक में पदोन्नत कर दिया गया।

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सरकार ने इस मामले की जांच दो संयुक्त संसदीय समितियों (जेपीसी), जस्टिस वर्मा कमीशन, ऊषा मेहरा आयोग और संयुक्त सचिव (पी एंड एम गृह मंत्रालय) को सौंपी थी। महिला आयोग ने भी इस मामले में संज्ञान लिया था। मेहरा आयोग की रिपोर्ट में इन अफसरों पर सीधा कोई आरोप नहीं लगाया गया था। आयोग का केवल इतना कहना था कि परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस के बीच तालमेल का अभाव है। संयुक्त सचिव (पी एंड एम गृह मंत्रालय) ने भी अपनी रिपोर्ट में कुछ ऐसा ही लिखा था।

ट्रैफिक पुलिस ने अपनी दलील में कहा था कि जिस बस में निर्भया कांड हुआ, उसका आठ बार चालान किया था। छह बार उसे जब्त भी किया गया। बस का परमिट रद्द करने का अधिकार ट्रैफिक पुलिस के पास नहीं था। सूत्रों का कहना है कि इन अफसरों को इस वजह से क्लीन चिट नहीं दी गई, क्योंकि इसके बाद गृह मंत्रालय के पास इस मामले में कार्रवाई या जांच के नाम पर कुछ नहीं बचेगा। विपक्षी पार्टियां इसे मुद्दा बना सकती हैं।

अंतिम जांच रिपोर्ट में भी दी गई क्लीन चिट

गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव रहे राजीव शर्मा ने इस मामले की फाइनल जांच रिपोर्ट तैयार की थी। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में ‘आरोप साबित नहीं’ होने की बात कही थी। इस जांच रिपोर्ट के बाद तीनों अफसरों को यह उम्मीद बंधी थी कि अब उनकी पदोन्नति और सेवाकाल के दौरान मिलने वाले दूसरे लाभ में हो रही अनावश्यक देरी से राहत मिलेगी। उधर, ज्वाइंट सीपी सत्येंद्र गर्ग को इस मामले में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। उनके जूनियर रहे अफसर स्पेशल सीपी या एडीशनल डीजी रैंक में पदोन्नति पा चुके थे, लेकिन तब तक वे ज्वाइंट सीपी ही रहे।

राहत न मिलने के पीछे दिए गए कई तर्क

उस वक्त दिल्ली पुलिस के कई दूसरे अफसरों का कहना था कि गृह मंत्रालय ने जानबूझ कर इन अफसरों को राहत नहीं दी। इसके पीछे तर्क दिया गया कि अभी उस मामले में छोटे कर्मियों की जांच पूरी नहीं हुई है, इसलिए बड़े अफसरों को राहत नहीं दी जा सकती। कुछ ऐसी बातें भी सामने आईं कि सरकार ने सब कुछ जानते हुए भी इन अफसरों को इस केस में उलझाए रखा। इसके पीछे कई कारण थे।

सबसे अहम वजह यही रही कि अगर पहले साल में ही इन्हें क्लीन चिट मिल जाती, तो विपक्ष के पास सरकार को घेरने का मुद्दा आ जाता। इसी के चलते केस की जांच को लंबे समय तक खींचा गया। ज्वाइंट सीपी सत्येंद्र गर्ग अपनी पदोन्नति में दो-तीन साल पीछे रह गए। डीसीपी प्रेमनाथ एवं एडीशनल डीसीपी अनिता राय को भी करियर में नुकसान हुआ।

गृह मंत्रालय ने गठित की थी एक समिति

किसी भी घटना के लिए प्रारंभिक तौर पर बतौर सुपरवाइजर एसएचओ, टीआई, इंस्पेक्टर पीसीआर और खुफिया इकाई की जवाबदेही बनती है। खास बात है कि निर्भया केस की जांच रिपोर्ट में सबसे पहले इन्हीं कर्मियों को क्लीन चिट दे दी गई। दिल्ली पुलिस के सूत्र बताते हैं कि गैंगरेप की घटना के बाद स्पेशल सीपी (पीसीआर) ने वैन के कंडम होने बाबत एक बयान जारी किया था। इसी तरह से ज्वाइंट सीपी (ट्रैफिक) ने भी परिवहन विभाग को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया था।



उनका कहना था कि ट्रैफिक पुलिस ने आठ बार उस बस का चालान किया था। बस का परमिट रद्द करने की अधिकार ट्रैफिक पुलिस के पास नहीं है। उनके यही बयान गृह मंत्रालय के कुछ अफसरों को रास नहीं आए। इस मामले की जांच के लिए गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव वीणा कुमारी मीणा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। इस समिति ने एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश की थी।

मामले से जुड़े अन्य तथ्यों की जांच के अलावा इस कमेटी ने यह भी पता लगाया कि जब इस बस का कई बार चालान हो चुका था तो वह दिल्ली की सड़कों पर किस तरह चलती रही। अगर बस का परमिट रद्द हो सकता है तो फिर क्यों नहीं किया गया। इसके पीछे अफसरों का हाथ है या कोई कानूनी बाधा, इस बाबत गहराई से जांच की गई। इसमें भी ट्रैफिक पुलिस के तीनों अफसरों के खिलाफ कुछ नहीं निकला।

 

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