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'व्यवस्था महिलाओं तक पहुंचे': एनसीडब्ल्यू प्रमुख ने सिस्टम पर उठाए सवाल, सुरक्षा अधिकारियों को क्या दी सलाह?

Wed, 07 Oct 2026 02:34 PM IST
अमन मौर्या पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: अमन मौर्या Updated Wed, 07 Oct 2026 02:34 PM IST
सार

एनसीडब्ल्यू प्रमुख विजया राहतकर ने कहा कि व्यवस्था को पीड़ित महिलाओं तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने कालिदास के 'अभिज्ञान शाकुंतलम' में माता गौतमी का उदाहरण देकर सुरक्षा अधिकारियों को संवेदनशील बनने की सलाह दी।

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राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रमुख विजया राहतकर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की प्रमुख विजया राहतकर ने बुधवार को एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि व्यवस्था को मुश्किल में फंसी महिलाओं तक पहुंचना चाहिए, न कि उन्हें व्यवस्था के पीछे भागने के लिए मजबूर किया जाए। घरेलू हिंसा के मामलों में सुरक्षा और न्याय को मजबूत करने के लिए प्रोटेक्शन ऑफिसर्स (सुरक्षा अधिकारियों) के एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सुरक्षा की जरूरत वाली महिला को यह बताने की जरूरत है कि आप अकेली नहीं हैं, सिस्टम आपके साथ है।
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उन्होंने कहा कि प्रोटेक्शन ऑफिसर्स वे अधिकारी होते हैं जिन्हें राज्य सरकारों द्वारा 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' के तहत नियुक्त किया जाता है। वे मुश्किल में फंसी महिलाओं के लिए शुरुआती मदद के तौर पर काम करते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि व्यवस्था महिला तक पहुंचे, महिला को व्यवस्था के पीछे नहीं भागना पड़े। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रोटेक्शन ऑफिसर्स और अन्य एजेंसियों के लिए तकनीक एक शक्तिशाली साधन है, जिससे वे डिजिटल प्लेटफॉर्म, हेल्पलाइन, डेटा और ऑनलाइन सिस्टम के जरिए अपनी प्रतिक्रिया देने के तरीकों को तेज और ज्यादा कुशल बना सकते हैं।
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तकनीक और व्यवस्था पर क्या कहा?
उन्होंने कहा, 'हमें यह याद रखना चाहिए कि तकनीक व्यवस्था को तेज तो बना सकती है, लेकिन यह अपने-आप संवेदनशीलता नहीं ला सकती। इसलिए हमें तकनीक के साथ-साथ मानवीय दृष्टिकोण, सहानुभूति और डेटा-आधारित दृष्टिकोण को भी अपनाना होगा।' उन्होंने कहा कि हमारा देश ऐसी दिशा की ओर बढ़ रहा है जहां किसी महिला को अपनी सुरक्षा के लिए अपनी ताकत साबित न करनी पड़े, बल्कि व्यवस्था ही उसकी ताकत बन जाए। जहां सुरक्षा सिर्फ कानून की किताबों में न हो, बल्कि हर जरूरतमंद महिला के जीवन में भी दिखे। उन्होंने कहा कि देश ऐसे दौर की ओर बढ़ रहा है जहां न्याय सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि हर महिला का वास्तविक अनुभव है। उन्होंने कहा कि और महिलाओं के लिए सरकार सिर्फ एक दफ्तर या व्यवस्था नहीं है, बल्कि मुश्किल समय में एक भरोसेमंद सहारा है।


'महिला सुरक्षा और गरिमा से न हो कोई समझौता'
राहतकर ने कहा कि किसी महिला को सुरक्षा देने का मतलब सिर्फ आज उसे सुरक्षित करना नहीं है, बल्कि उसकी गरिमा की रक्षा करना और उसके भविष्य को सुरक्षित करना भी है। उन्होंने कहा, 'हमें ऐसे सिस्टम की ओर बढ़ना होगा जहां कोई भी महिला अकेली न हो, किसी की आवाज अनसुनी न रहे और किसी भी महिला की गरिमा से कोई समझौता न हो।' उन्होंने कहा कि प्रोटेक्शन अधिकारी का पद सिर्फ सरकारी पद या प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसके लिए कानून की जानकारी के साथ-साथ संवेदनशीलता की भी जरूरत होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की संस्कृति ने हमेशा हमें सिखाया है कि संकट के समय किसी भी महिला को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।

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'अभिज्ञान शाकुंतलम' का क्यों किया जिक्र?
कवि कालिदास की रचना 'अभिज्ञान शाकुंतलम्' का जिक्र करते हुए राहतकर ने कहा कि जब शकुंतला अपने अधिकार और न्याय पाने के लिए राजा दुष्यंत के दरबार में जाना चाहती थीं, तो उन्हें चिंता थी कि वह अपना पक्ष किसके सामने रखें। उन्होंने कहा कि उस समय शकुंतला अकेली नहीं थीं। माता गौतमी उनके साथ खड़ी थीं और शाही दरबार तक उनके साथ गईं। माता गौतमी ने उस समय एक प्रोटेक्शन ऑफिसर की भूमिका निभाई थी, एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका जो मुसीबत में फंसी महिला को अकेला नहीं छोड़ता और उसे न्याय के दरवाजे तक पहुंचने में मदद करता है। वहां मौजूद प्रोटेक्शन ऑफिसरों से उन्होंने कहा, 'अक्सर महिलाओं के लिए प्रोटेक्शन ऑफिसर ही सरकार का सबसे जाना-पहचाना चेहरा होता है। संसद कानून बनाती है, सरकार नीतियां बनाती है और संस्थाएं ढांचा तैयार करती हैं, लेकिन महिलाएं उस पूरे सिस्टम का अनुभव आपके दफ्तर में ही करती हैं।'
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