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खात्मे के कगार पर नक्सलवाद: दस साल में 10,000 से ज्यादा माओवादियों का आत्मसमर्पण, अर्बन नक्सल पर भी नकेल
Sun, 29 Mar 2026 12:18 PM IST
अमन तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमन तिवारी
Updated Sun, 29 Mar 2026 12:18 PM IST
सार
देश में पिछले दस वर्षों में 10,000 से अधिक माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। सुरक्षा बलों की सख्ती और सरकार की पुनर्वास व विकास योजनाओं के चलते हिंसा में भारी गिरावट आई है, जिसने माओवादियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित किया है।
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दस साल में 10,000 से ज्यादा माओवादियों ने डाले हथियार
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
भारत में नक्सलवाद अब अपने अंत की ओर है। पिछले 10 साल में 10,000 से ज्यादा माओवादियों ने हथियार डाल दिए हैं। अधिकारियों ने बताया कि सुरक्षा बलों के दबाव और सरकार की पुनर्वास नीतियों ने इस उग्रवाद को करारा झटका दिया है। केंद्र सरकार ने देश से नक्सलवाद खत्म करने के लिए 31 मार्च की समयसीमा तय की थी।
हर साल सैकड़ों नक्सली कर रहे आत्मसमर्पण
आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में 2,300 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया। वहीं, 2026 के पहले तीन महीनों में ही 630 से ज्यादा कैडरों ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया। सरकार ने अब पुरानी और बिखरी हुई नीतियों की जगह एक मजबूत और एकजुट रणनीति अपनाई है।
ये भी पढ़ें: एलपीजी संकट का असर: मुंबई में चोरी हो गए 27 गैस सिलेंडर, पुलिस ने शुरू की जांच
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पहले 'लाल गलियारे' (बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश) में ठेकेदार काम करने से डरते थे। अब केंद्र सरकार ने सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को मुख्य इलाकों में सड़कें बनाने का काम दिया। इसमें विद्रोह के इन गढ़ों में पांच मुख्य सड़कों और छह ज़रूरी पुलों का निर्माण शामिल था। माओवादी से प्रभावित इलाकों में 15,000 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें बनाई गई हैं, जिनमें से 12,250 किलोमीटर सड़कें अकेले पिछले 10 वर्षों में पूरी की गई हैं।
सुरक्षा के मोर्चे पर बड़े बदलाव
सुरक्षा के मोर्चे पर भी बड़े बदलाव हुए हैं। साल 2014 में केवल 66 मजबूत पुलिस स्टेशन थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 586 हो गई है। पिछले 6 साल में 361 नए सुरक्षा कैंप बने हैं। ऑपरेशन की ताकत बढ़ाने के लिए 68 नाइट-लैंडिंग हेलीपैड भी बनाए गए हैं। इसका असर यह हुआ कि नक्सली घटनाओं वाले पुलिस स्टेशनों की संख्या 330 से घटकर सिर्फ 52 रह गई है। छत्तीसगढ़ में पहली बार माओवादी आंदोलन बिना किसी बड़े नेता के रह गया है।
आम लोगों तक पहुंच रहीं योजनाएं
इसका असर है कि सरकार की योजनाओं का लाभ अब आम लोगों तक पहुंच रहा है। पीएम-आवास योजना के तहत घरों की संख्या 92,847 से बढ़कर 2.54 लाख से ज्यादा हो गई है। आधार नामांकन और आयुष्मान कार्डों की संख्या में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। शिक्षा के लिए 250 एकलव्य स्कूल मंजूर हुए हैं, जिनमें से 179 चल रहे हैं। इनके अलावा, 11 केंद्रीय विद्यालय और 6 नवोदय विद्यालय भी संचालित हो रहे हैं।
युवाओं को रोजगार देने के लिए 48 जिलों में आईटीआई और कौशल विकास केंद्र बनाए गए हैं। इससे नक्सलियों की नई भर्ती रुकी है। संचार के लिए 9,000 मोबाइल टावर लगाए गए हैं। रेलवे ने भी बस्तर से छत्तीसगढ़ के बीच रेल लाइन बिछाई है। दंतेवाड़ा से मुनुगुरु तक नई रेल लाइन का सर्वे भी पूरा हो गया है।
ये भी पढ़ें: Great Indian Bustard: 10 साल बाद कच्छ में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का जन्म, तकनीक-संयुक्त प्रयासों से मिली सफलता
अर्बन नक्सलियों पर नकेल
नक्सलियों की फंडिंग रोकने के लिए एनआईए और ईडी ने करोड़ों रुपये की संपत्ति जब्त की है। इससे शहरी नक्सलियों और उनके सूचना तंत्र को गहरा नुकसान पहुंचा है। सरकार की नई पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक मदद, ट्रेनिंग और घर भी दिया जा रहा है।
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हर साल सैकड़ों नक्सली कर रहे आत्मसमर्पण
आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में 2,300 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया। वहीं, 2026 के पहले तीन महीनों में ही 630 से ज्यादा कैडरों ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया। सरकार ने अब पुरानी और बिखरी हुई नीतियों की जगह एक मजबूत और एकजुट रणनीति अपनाई है।
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पहले 'लाल गलियारे' (बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश) में ठेकेदार काम करने से डरते थे। अब केंद्र सरकार ने सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को मुख्य इलाकों में सड़कें बनाने का काम दिया। इसमें विद्रोह के इन गढ़ों में पांच मुख्य सड़कों और छह ज़रूरी पुलों का निर्माण शामिल था। माओवादी से प्रभावित इलाकों में 15,000 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें बनाई गई हैं, जिनमें से 12,250 किलोमीटर सड़कें अकेले पिछले 10 वर्षों में पूरी की गई हैं।
सुरक्षा के मोर्चे पर बड़े बदलाव
सुरक्षा के मोर्चे पर भी बड़े बदलाव हुए हैं। साल 2014 में केवल 66 मजबूत पुलिस स्टेशन थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 586 हो गई है। पिछले 6 साल में 361 नए सुरक्षा कैंप बने हैं। ऑपरेशन की ताकत बढ़ाने के लिए 68 नाइट-लैंडिंग हेलीपैड भी बनाए गए हैं। इसका असर यह हुआ कि नक्सली घटनाओं वाले पुलिस स्टेशनों की संख्या 330 से घटकर सिर्फ 52 रह गई है। छत्तीसगढ़ में पहली बार माओवादी आंदोलन बिना किसी बड़े नेता के रह गया है।
आम लोगों तक पहुंच रहीं योजनाएं
इसका असर है कि सरकार की योजनाओं का लाभ अब आम लोगों तक पहुंच रहा है। पीएम-आवास योजना के तहत घरों की संख्या 92,847 से बढ़कर 2.54 लाख से ज्यादा हो गई है। आधार नामांकन और आयुष्मान कार्डों की संख्या में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। शिक्षा के लिए 250 एकलव्य स्कूल मंजूर हुए हैं, जिनमें से 179 चल रहे हैं। इनके अलावा, 11 केंद्रीय विद्यालय और 6 नवोदय विद्यालय भी संचालित हो रहे हैं।
युवाओं को रोजगार देने के लिए 48 जिलों में आईटीआई और कौशल विकास केंद्र बनाए गए हैं। इससे नक्सलियों की नई भर्ती रुकी है। संचार के लिए 9,000 मोबाइल टावर लगाए गए हैं। रेलवे ने भी बस्तर से छत्तीसगढ़ के बीच रेल लाइन बिछाई है। दंतेवाड़ा से मुनुगुरु तक नई रेल लाइन का सर्वे भी पूरा हो गया है।
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अर्बन नक्सलियों पर नकेल
नक्सलियों की फंडिंग रोकने के लिए एनआईए और ईडी ने करोड़ों रुपये की संपत्ति जब्त की है। इससे शहरी नक्सलियों और उनके सूचना तंत्र को गहरा नुकसान पहुंचा है। सरकार की नई पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक मदद, ट्रेनिंग और घर भी दिया जा रहा है।
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