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Research: किडनी के इलाज में पारंपरिक फॉर्मूला प्रभावी, कुछ हफ्ते में असर, परीक्षण के बाद निकला निष्कर्ष

Wed, 13 Mar 2024 06:28 AM IST
यशोधन शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: यशोधन शर्मा Updated Wed, 13 Mar 2024 06:28 AM IST
सार

बंगलूरू स्थित राष्ट्रीय यूनानी चिकित्सा संस्थान के शोधकर्ताओं ने किडनी बीमारी से ग्रस्त रोगियों पर एक चिकित्सा अध्ययन किया है। इसमें शोधकर्ताओं ने नीरी केएफटी दवा को शामिल कर परीक्षण शुरू किया।

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National Institute of Unani Medicine Research Traditional formula effective kidney treatment
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : iStock

विस्तार

भारतीय शोधकर्ताओं ने किडनी के इलाज में पारंपरिक फॉर्मूला को असरदार पाया है। एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कहा है कि पारंपरिक फॉर्मूला से बनी नीरी केएफटी दवा का मरीजों में कुछ ही सप्ताह बाद असर दिखाई देने लगता है। 14 मार्च को विश्व किडनी दिवस के अवसर पर भारतीय शोधकर्ताओं का यह अध्ययन ईरान के मेडिकल जर्नल एविसेना जर्नल ऑफ मेडिकल बायोकेमिस्ट्री ने प्रकाशित किया है, जिसका संचालन चर्चित हमादान यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसिन साइंसेज कर रहा है।

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बंगलूरू स्थित राष्ट्रीय यूनानी चिकित्सा संस्थान के शोधकर्ताओं ने किडनी बीमारी से ग्रस्त रोगियों पर एक चिकित्सा अध्ययन किया है। इसमें शोधकर्ताओं ने नीरी केएफटी दवा को शामिल कर परीक्षण शुरू किया। करीब 42 दिन तक रोजाना खुराक देने के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि मरीजों में सीरम क्रिएटिनिन का स्तर काबू में आने लगा है जो बताता है कि किडनी रक्त को कितनी अच्छी तरह से फिल्टर कर रही है।
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गोखरू, वरुण, कासनी, मकोय, पलाश का मिश्रण फायदेमंद
शोधकर्ताओं ने बताया कि पुनर्नवा, गोखरू, वरुण, कासनी, मकोय, पलाश, गिलोय औषधियों का मिश्रण किडनी रोगियों के लिए फायदेमंद हैं। इस पारंपरिक फॉर्मूले को लेकर हाल ही में भारतीय शोधकर्ताओं ने नीरी केएफटी की खोज की, जिसे इस अध्ययन में शामिल किया। अध्ययन में पाया कि 15-15 मरीजों के दोनों समूह में अनेक सकारात्मक प्रभाव हैं। दोनों समूहों के मरीजों के सीरम क्रिएटिनिन में कमी दर्ज की गई। दूसरे ईजीएफआर यानी ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन दर में भी सुधार पाया गया। इसमें बढ़ोतरी सुधार का संकेत है। यह दोनों पैरामीटर किडनी की कार्य प्रणाली में सुधार के संकेत हैं।
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भारत में लगातार बढ़ रहा बोझ
शोधकर्ताओं के अनुसार, समय पर पहचान न होने से क्रोनिक किडनी डिजीज यानी सीकेडी का बोझ लगातार बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर यह करीब 13 फीसदी तक है। भारत में 10 में से नौ सीकेडी रोगी महंगे उपचार का भार नहीं उठा सकते। इसलिए सस्ते विकल्प के तौर पर पारंपरिक चिकित्सा के वैज्ञानिक तथ्यों का पता लगाने के लिए यह अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन औषधियों के सेवन से मरीजों में अरुचि और थकान में भी कमी पाई गई।

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