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Nari Shakti: महिलाओं के सहारे जातिगत राजनीति को ध्वस्त करने की तैयारी में भाजपा, टीम मोदी ने बनाया यह प्लान

Mon, 23 Oct 2023 05:58 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Mon, 23 Oct 2023 05:58 PM IST
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सार
Nari Shakti: भाजपा की असली परेशानी यह है कि राहुल गांधी ने जातिगत आंकड़ों को नौकरियों से जोड़ना शुरू कर दिया है। वे बार-बार जातिगत संख्या के आधार पर सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी की बात उठा रहे हैं। विपक्ष के कई दल इसके लिए आरक्षण की ऊपरी सीमा को तोड़ने की बात भी कर रहे हैं...
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Nari Shakti: BJP will destroy caste politics with the help of women, Team Modi made this plan
Nari Shakti - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार

इस समय चल रहे पांच विधानसभा चुनावों और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को घेरने के लिए विपक्ष ने ओबीसी आरक्षण का दांव चलने का प्लान बनाया है। विपक्ष के इस प्लान को ध्वस्त करने के लिए भाजपा ने महिला मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की योजना बनाई है। पार्टी का मानना है कि यदि महिलाओं को छूने वाले मुद्दे उनके सामने रखे जाएं, तो महिला मतदाता जातिगत-धर्मगत सोच से ऊपर उठकर वोट देती हैं। पार्टी इसके पहले भी तीन तलाक, प्रधानमंत्री आवास योजना और राशन योजनाओं के सहारे महिलाओं को अपने साथ सफलतापूर्वक जोड़ चुकी है। अब इसी सोच को ज्यादा मजबूती के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी है।

भाजपा की समस्या

भाजपा की असली परेशानी यह है कि राहुल गांधी ने जातिगत आंकड़ों को नौकरियों से जोड़ना शुरू कर दिया है। वे बार-बार जातिगत संख्या के आधार पर सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी की बात उठा रहे हैं। विपक्ष के कई दल इसके लिए आरक्षण की ऊपरी सीमा को तोड़ने की बात भी कर रहे हैं। सरकारी नौकरियों के प्रति लोगों के आकर्षण को देखते हुए यह दांव बहुत कारगर साबित हो सकता है। विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा सहित उन राज्यों में जहां गरीबी-पिछड़ापन ज्यादा है, और सरकारी नौकरी लोगों की आजीविका के एक बड़े साधन के तौर पर देखी जाती है, वहां यह मुद्दा पिछड़े-दलित जाति के लोगों को विशेष तौर पर आकर्षित कर सकता है।

भाजपा ने इन राज्यों में विकास योजनाओं, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दों के सहारे अच्छी पैठ बनाई है। उसका यह समीकरण इतना कारगर रहा है कि जातिगत राजनीति करने वाले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों का परंपरागत वोट बैंक भी टूट गया है और भाजपा को इस वोट बैंक में सेंध लगाने में सफलता मिली है। लेकिन भाजपा की चिंता है कि जातिगत आंकड़ों के सहारे पूरा मामला एक बार फिर नब्बे के उस दौर की ओर लौट सकता है जहां मंडलवादी राजनीति ने उसकी बढ़ती राहों को रोक लिया था।      

समाधान क्या है

पार्टी को लगता है कि महिला मतदाता ही उसकी इस समस्या का समाधान हो सकती हैं। महिलाएं ज्यादा संवेदनशील होती हैं। कल्याणकारी योजनाओं, महिला आत्मसम्मान से जुड़े मुद्दों, नारी शक्ति वंदन एक्ट और सरकार-संगठन में ज्यादा महिलाओं को भागीदारी देकर वह महिला मतदाताओं के बीच यह संदेश दे सकती है कि यदि महिलाओं को आगे बढ़ाना है तो इसके लिए भाजपा ही बेहतर विकल्प हो सकती है। पार्टी इसी रणनीति पर आगे बढ़ रही है।    

इसके पहले भी भाजपा ने इन्हीं मुद्दों के सहारे विपक्षी दलों की तुलना में महिलाओं के ज्यादा वोट लेने में सफलता हासिल की थी। सीएसडीएस के आंकड़ों के अनुसार, 2014 के लोकसभा चुनाव में 29 फीसदी महिलाओं ने भाजपा को वोट दिया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 36 फीसदी हो गया था। यूपी के विधानसभा चुनाव में, जहां भाजपा ने महिला सुरक्षा को अपना सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था, वहां 46 फीसदी महिलाओं ने भाजपा को वोट दिया। यह काम जातिगत राजनीति करने वाली पार्टियों सपा-बसपा के रहते हुआ था। भाजपा को लगता है कि यदि वह महिलाओं को साथ ले सके, तो इस आंकड़े को राष्ट्रीय स्तर पर और ज्यादा बढ़ाया जा सकता है।   

क्या करेगी पार्टी

राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडे ने अमर उजाला से कहा कि केंद्र सरकार ने बेहद चतुराई के साथ पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित कराकर महिलाओं को यह संदेश दे दिया है कि वह उन्हें आगे बढ़ाने के लिए एतिहासिक निर्णय ले रही है। चुनावी राज्यों में महिला केंद्रित सभाएं कर वह उन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनावों के पहले केंद्र सरकार महिला केंद्रित कुछ अन्य लोकप्रिय घोषणाएं कर भी महिलाओं को अपने साथ जोड़ने की योजना पर काम कर सकती है।  

महिलाएं ज्यादा बड़ी वोटर

जिन पांच राज्यों में इस समय विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, इन्हीं राज्यों के पिछले चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि यहां पुरुषों की तुलना में ज्यादा महिलाओं ने वोट किया। यह आंकड़ा एक प्रतिशत से लेकर 2.5 फीसदी तक रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर 0.17 प्रतिशत ज्यादा महिलाओं ने वोट दिया।

पिछले वर्ष यानी 2022 में भी पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे। इनमें उत्तराखंड में 62.6 फीसदी पुरुषों ने वोट दिया था, जबकि 67.2 फीसदी महिलाएं वोट करने के लिए घरों से बाहर निकलीं। गोवा में 78.19 फीसदी पुरुषों ने वोट दिया था, जबकि इसी चुनाव में 80.96 फीसदी महिलाओं ने वोट दिया। मणिपुर में 88 फीसदी पुरुषों के मुकाबले 90 फीसदी महिला मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया।    

यह मामला गोवा-मणिपुर और उत्तराखंड जैसे छोटे राज्यों तक सीमित नहीं था। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी इन राज्यों के साथ चुनाव हुए थे। यहां केवल 51.03 फीसदी पुरुषों ने मतदान किया था, जबकि 62.62 फीसदी महिलाओं ने मताधिकार का उपयोग किया। यह आंकड़ा राजनीतिक दलों के लिए हैरान करने वाला था। भाजपा इसी वोट बैंक को साधने के लिए जुगत भिड़ा रही है। जातिगत मुद्दों की तुलना में यह रणनीति कितनी कारगर रहेगी, यह देखने वाली बात होगी।

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