फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Namvar Singh life introduction of a great critic of Hindi literature

नामवर सिंह : 'सुलूक जिससे किया मैंने आशिकाना किया'

Wed, 20 Feb 2019 07:50 PM IST
तिवारी अभिषेक भाषा,नई दिल्ली
भाषा,नई दिल्ली Published by: तिवारी अभिषेक Updated Wed, 20 Feb 2019 07:50 PM IST
विज्ञापन
Namvar Singh life introduction of a great critic of Hindi literature
नामवर सिंह - फोटो : अमर उजाला

हिंदी साहित्य में नामवर सिंह का व्यक्तित्व एक विशाल वटवृक्ष की तरह था जिसकी हर शाखा से मानों एक नया वृक्ष ही पनपता था और उन्होंने आलोचना जैसे 'खुश्क' कर्म को इतना सरस बना दिया कि वह लगभग 'आशिकाना' हो गया। कविता से अपनी साहित्यिक यात्रा का प्रारंभ करने वाले नामवर सिंह के अवचेतन में उनके साहित्यिक गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आलोचना के बीज इतने गहरे बोये थे कि आलोचना के क्षेत्र में आना तनिक भी अस्वाभाविक नहीं था ।

विज्ञापन


 'दूसरी परंपरा की खोज' के माध्यम से उन्होंने अपने गुरु द्विवेदी की दृष्टि को न केवल आलोचना के आधुनिक प्रतिमानों पर कसा बल्कि हिंदी आलोचना को 'शुक्ल पक्ष' से इतर की व्यापकता की ओर बढ़ाया । नामवर सिंह वेष-भूषा, बेबाकी और अपने दृष्टिकोण में उसी बनारस का प्रतिनिधित्व करते थे जो कबीर से लेकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य में बिखरा था । 28 जुलाई, 1926 में बनारस जिले का जीयनपुर नामक गांव में जन्मे नामवर सिंह का जीवन भले ही राजधानी में बीता हो किंतु दिल्ली सदा उनके 'दिमाग में रही, न कि दिल में ।' 
विज्ञापन


नामवर सिंह की प्राथमिक शिक्षा उनके पैतृक गांव के समीप वाले गांव आवाजापुर में हुई और उन्होंने कमालपुर से मिडिल कक्षा पास की। इसके बाद उन्होंने बनारस के हीवेट क्षत्रिय स्कूल से मैट्रिक और उदयप्रताप कालेज से इंटरमीडिएट किया । 1941 में कविता से उनके लेखक जीवन की शुरुआत हुई। पहली कविता इसी साल 'क्षत्रियमित्र’पत्रिका (बनारस) में प्रकाशित हुई। उन्होंने 1949 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से बी.ए. और 1951 में वहीं से हिंदी  में एम.ए. किया। 

विज्ञापन
विज्ञापन

'घर का जोगी जोगड़'

1953 में उसी विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में अस्थायी पद पर उनकी नियुक्ति हुई। वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडेय के अनुसार, नामवर सिंह हिन्दी के जितने प्रसिद्ध आलोचक थे, उतने ही प्रसिद्ध अध्यापक भी थे। साथ ही वह उतने ही प्रसिद्ध वक्ता भी थे। उन्होंने हिंदी आलोचना को समकालीन बनाया। पांडेय के अनुसार, नामवर सिंह की एक अन्य बड़ी विशेषता थी कि वह युवा लेखकों के साथ बहुत जल्द अपना तारतम्य स्थापित कर लेते थे ।

पुस्तकों से उनका नाता सदा से ही रहा। 'घर का जोगी जोगड़' चाहे घर में रहे या बाहर, उनके दिमाग में साहित्य और किताबें सदा तैरती रहती थीं । नामवर कहते थे कि वह यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि उनसे 'कलम और किताब छीनकर उन्हें किसी निर्जन टापू पर भेज दिया जाए। साहित्य के अलावा, नामवर कुछ समय के लिए राजनीति में भी उतरे । उन्होंने 1959 में चकिया, चन्दौली के लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार रूप में अपनी चुनावी किस्मत आजमायी। चुनाव में सफलता तो नहीं मिली। साथ ही विश्वविद्यालय की नौकरी से भी वह मुक्त हो गये ।

उनके छोटे भाई और प्रसिद्ध कहानीकार काशीनाथ सिंह के शब्दों में, यह दौर नामवर सिंह का सबसे संघर्ष भरा दौर रहा। लेकिन इस दौर में उनका पुस्तकों से नाता छूटने के बजाय और गहरा गया। उस दौर में नामवर बनारस के लोलार्क कुंड इलाके में रहते थे। एक साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके सपनों का कोई घर था भी या नहीं। उन्होंने बेबाकी से उत्तर दिया था, 'वही लोलार्क कुंड वाला पुराना घर, जिसमें किसी समय सभी अपने साथ थे । वैसे सचमुच का घर तो अब भी सपना है और सपना ही रहेगा।'

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed