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नगालैंड हिंसा: हॉर्नबिल महोत्सव पर पड़ा इसका साया, क्या शांति वार्ता पर भी लगेगा सवालिया निशान
Mon, 06 Dec 2021 05:57 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Mon, 06 Dec 2021 05:57 PM IST
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नगालैंड का हॉर्नबिल महोत्सव
- फोटो :
Twitter : @jagdishmukhi
विस्तार
शनिवार को नगालैंड के मोन जिले में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में कई नागरिकों की हत्या को लेकर सियासत गरमा गई है। विपक्ष इसे लेकर सरकार पर हमलावर है। गृह मंत्री अमित शाह ने इस पर संसद में बयान भी दिया और इस घटना पर खेद भी जताया है। दूसरी तरफ इस घटना से वार्षिक हॉर्नबिल महोत्सव में विघ्न पड़ गया है। इस हत्या के विरोध में नगालैंड में 17 जनजातियों में से आठ ने वार्षिक हॉर्नबिल महोत्सव से अपनी वापसी की घोषणा की है। वहीं पूर्वी नागालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन ने सभी छह जनजातियों को तत्काल प्रभाव से इस महोत्सव में भाग लेने से परहेज करने के लिए कहा है। साथ ही उन्हें कार्यक्रम स्थल पर काले झंडे फहराने के लिए भी कहा गया है।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस बीच, लोथा होहो और सुमी होहो ने भी इन हत्याओं की निंदा की है और अगली सूचना तक किसी भी त्योहार से दूर रहने का फैसला किया है। यह महोत्सव अभी महोत्सव कोहिमा से लगभग 12 किमी दूर किसामा के नागा विरासत गांव में आयोजित किया जा रहा है। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस घटना का नागा शांति वार्ता पर असर पड़ सकता है?
क्या है हॉर्नबिल महोत्सव
इसे "त्योहारों का त्योहार" भी कहा जाता है। 10 दिनों तक चलने वाले इस वार्षिक कार्यक्रम में राज्य की सभी 17 जनजातियां एक मंच पर आती हैं और सोशल मीडिया और प्रचार के अन्य तंत्रों के जरिए दुनिया के बाकी हिस्सों में उनकी संस्कृति का प्रचार किया जाता है। इस त्योहार का मकसद नागा संस्कृति को संरक्षित करना है। इसका आयोजन राज्य पर्यटन और कला और संस्कृति विभाग करता है।
हॉर्नबिल महोत्सव के उद्घाटन समारोह में राज्यपाल जगदीश मुखी
- फोटो :
Twitter : @jagdishmukhi
एक दिसंबर से यह महोत्सव काफी उत्साह के साथ शुरू हुआ था। हर साल इसका आयोजन एक दिसंबर से दस दिसंबर तक किया जाता है। इस महोत्सव की शुरुआत साल 2000 से हुई थी। कोरोना के कारण इसका आयोजन पिछले साल नहीं हुआ था। इस साल पहले ही दिन इस महोत्सव में 12,000 से अधिक लोग शामिल हुए।
हॉर्नबिल पक्षी के नाम पर पड़ा महोत्सव का नाम
महोत्सव का नाम हॉर्नबिल पक्षी के नाम पर रखा गया है जो नागालैंड के जंगलों में आम तौर पर देखा जा सकता है। इस वन पक्षी के बारे में राज्य की अधिकांश जनजातियों की लोककथाओं में बताया गया है। पिछले कुछ सालों में, हॉर्नबिल महोत्सव ने राज्य के पर्यटन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 2016 में हॉर्नबिल उत्सव के दौरान एक लाख से ज्यादा पर्यटक नागालैंड आए थे जबकि 2019 में यह आंकड़ा करीब पौने तीन लाख को पार कर गया।
बीते एक दिसंबर को उत्सव का उद्घाटन करते हुए, नागालैंड के राज्यपाल जगदीश मुखी ने कहा था, “वह दिन दूर नहीं जब नगा विद्रोही समूहों के साथ बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। शांतिपूर्ण और प्रगतिशील नागालैंड की नई सुबह का स्वागत करने के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए सभी को अपना मन बना लेना चाहिए। लेकिन अब यह माना जा रहा है कि शनिवार की घटना के बाद स्थिति प्रतिकूल हो गई है जिससे सबसे ज्यादा शांति वार्ता के अटकने का खतरा मंडराने लगा है।
हॉर्नबिल पक्षी के नाम पर पड़ा महोत्सव का नाम
महोत्सव का नाम हॉर्नबिल पक्षी के नाम पर रखा गया है जो नागालैंड के जंगलों में आम तौर पर देखा जा सकता है। इस वन पक्षी के बारे में राज्य की अधिकांश जनजातियों की लोककथाओं में बताया गया है। पिछले कुछ सालों में, हॉर्नबिल महोत्सव ने राज्य के पर्यटन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 2016 में हॉर्नबिल उत्सव के दौरान एक लाख से ज्यादा पर्यटक नागालैंड आए थे जबकि 2019 में यह आंकड़ा करीब पौने तीन लाख को पार कर गया।
बीते एक दिसंबर को उत्सव का उद्घाटन करते हुए, नागालैंड के राज्यपाल जगदीश मुखी ने कहा था, “वह दिन दूर नहीं जब नगा विद्रोही समूहों के साथ बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। शांतिपूर्ण और प्रगतिशील नागालैंड की नई सुबह का स्वागत करने के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए सभी को अपना मन बना लेना चाहिए। लेकिन अब यह माना जा रहा है कि शनिवार की घटना के बाद स्थिति प्रतिकूल हो गई है जिससे सबसे ज्यादा शांति वार्ता के अटकने का खतरा मंडराने लगा है।
nagaland
क्या शांति वार्ता पर पड़ेगा असर
हालांकि इस घटना को लेकर केंद्र सरकार तुरंत सतर्क और सक्रिय हुई। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इस पर लोकसभा में बयान भी दिया पर सूत्रों का कहना है कि इस घटनाक्रम के कारण केंद्र के साथ बातचीत करने वाले समूहों पर जनता के गुस्से को जाहिर करने का दबाव पड़ सकता है। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि यह मौतें नागालैंड पुलिस के ऑपरेशन की वजह से नहीं हुई है जिसके लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा सके या स्थानीय पुलिस कर्मी के शामिल होने की बात कही जाए। यह एक भारतीय सेना का ऑपरेशन है जो गलत निशाने पर लग गया। इससे शांति वार्ता की विश्वसनीयता कम हो सकती है।
केंद्र लंबे समय से नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड यानी एनएससीएन (राज्य के सबसे बड़े उग्रवादी संगठन) के विभिन्न गुटों से बातचीत करने की कोशिश कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार कुछ समूहों को बातचीत की मेज पर लाने में कामयाब रही है। इनमें खांगो कोन्याक और निकी सुमी के नेतृत्व वाले समूह शामिल हैं, जो कभी एनएससीएन, एनएससीएन-के वार्ता विरोधी गुट का हिस्सा थे। सुमी वास्तव में एनएससीएन-के का सैन्य कमांडर था, जिसके बारे में कहा जाता है कि म्यांमार की सीमा से लगे नागालैंड के जिलों में उसका काफी प्रभाव है।
हालांकि इस घटना को लेकर केंद्र सरकार तुरंत सतर्क और सक्रिय हुई। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इस पर लोकसभा में बयान भी दिया पर सूत्रों का कहना है कि इस घटनाक्रम के कारण केंद्र के साथ बातचीत करने वाले समूहों पर जनता के गुस्से को जाहिर करने का दबाव पड़ सकता है। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि यह मौतें नागालैंड पुलिस के ऑपरेशन की वजह से नहीं हुई है जिसके लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा सके या स्थानीय पुलिस कर्मी के शामिल होने की बात कही जाए। यह एक भारतीय सेना का ऑपरेशन है जो गलत निशाने पर लग गया। इससे शांति वार्ता की विश्वसनीयता कम हो सकती है।
केंद्र लंबे समय से नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड यानी एनएससीएन (राज्य के सबसे बड़े उग्रवादी संगठन) के विभिन्न गुटों से बातचीत करने की कोशिश कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार कुछ समूहों को बातचीत की मेज पर लाने में कामयाब रही है। इनमें खांगो कोन्याक और निकी सुमी के नेतृत्व वाले समूह शामिल हैं, जो कभी एनएससीएन, एनएससीएन-के वार्ता विरोधी गुट का हिस्सा थे। सुमी वास्तव में एनएससीएन-के का सैन्य कमांडर था, जिसके बारे में कहा जाता है कि म्यांमार की सीमा से लगे नागालैंड के जिलों में उसका काफी प्रभाव है।
भारत-नागा शांति वार्ता के सकारात्मक परिणाम के लिए प्रार्थना करते लोग (फाइल फोटो)
- फोटो :
Twitter : @WeTheNagas
अलग संविधान और झंडे की मांग पर अड़ा एनएससीएन (आइएम)
दूसरी तरफ शांति को लेकर केंद्र सरकार एनएससीएन (के) निकी ग्रुप के साथ संघर्ष विराम समझौता किया है। जबकि एनएससीएन (आइएम) ने केंद्र सरकार के साथ 2015 में समझौते के मसौदे पर हस्ताक्षर किया था लेकिन चार साल तक बातचीत के बाद फाइनल समझौते के समय इसके महासचिव टी मुइवा अलग संविधान और झंडे की मांग पर अड़ गए।
अब तक, केवल एनएससीएन (आइएम) ही नगा शांति समझौते को अंतिम रूप दिए जाने में सबसे बड़ी बाधा रही है। अन्य सभी नागा समूह, जो नागा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों (एनएनपीजी) का हिस्सा हैं वे चाहते हैं कि यह समझौत सौदा जल्द से जल्द हो जाए। हालांकि माना जा रहा है कि इस यह घटना से बाकी समूह भी कुछ समय के लिए वार्ता से पीछे हट सकते हैं।
दूसरी तरफ शांति को लेकर केंद्र सरकार एनएससीएन (के) निकी ग्रुप के साथ संघर्ष विराम समझौता किया है। जबकि एनएससीएन (आइएम) ने केंद्र सरकार के साथ 2015 में समझौते के मसौदे पर हस्ताक्षर किया था लेकिन चार साल तक बातचीत के बाद फाइनल समझौते के समय इसके महासचिव टी मुइवा अलग संविधान और झंडे की मांग पर अड़ गए।
अब तक, केवल एनएससीएन (आइएम) ही नगा शांति समझौते को अंतिम रूप दिए जाने में सबसे बड़ी बाधा रही है। अन्य सभी नागा समूह, जो नागा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों (एनएनपीजी) का हिस्सा हैं वे चाहते हैं कि यह समझौत सौदा जल्द से जल्द हो जाए। हालांकि माना जा रहा है कि इस यह घटना से बाकी समूह भी कुछ समय के लिए वार्ता से पीछे हट सकते हैं।