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कोर्ट को गुमराह कर रहा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, नहीं दी ट्रिपल तलाक से जुड़ी सही जानकारी

Wed, 17 May 2017 12:34 PM IST
amarujala.com- Presented by: हर्षित गौतम
amarujala.com- Presented by: हर्षित गौतम Updated Wed, 17 May 2017 12:34 PM IST
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Muslim law board hiding talaq facts

कई महीनों पहले केंद्र सरकार ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उस हलफनामे को सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के प्रति द्वेष वाला बताया जिसमें कहा गया है कि शरीयत में पुरषों को तीन तलाक कहने की आजादी दी गई है क्योंकि उनके पास फैसले लेने की ज्यादा क्षमता है। वहीं एक प्रभावशाली मुस्लिम संगठन ने पर्सनल लॉ बोर्ड के इस स्टैंड पर आपत्ति जताई है।

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14 मुस्लिम संगठनों वाले ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत ने AIMPLB पर आरोप लगाया है कि उन्होंने अपने हलफनामे में मुस्लिम समुदाय के दो प्रमुख वर्गों अहले हदीस और जाफरी (शिया) संप्रदायों द्वारा दिए जा रहे तलाक के बारे में जानकारी नहीं दी है।
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इन दो वर्गों में ऐसी प्रथा है कि वो कुरान द्वारा दी गई अनुमति के तहत पहले जोड़े के बीच सुलह की कोशिश करते हैं और ऐसा न होने पर एक बार में तीन बार तलाक बोलकर इस प्रक्रिया को खत्म कर देते हैं।

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जाफरी और अहले हदीस तीन तलाक की इजाजत नहीं देते

Muslim law board hiding talaq facts

मुशावरत ने बताया कि बोर्ड केवल हनीफी वर्ग के विचार का ही प्रतिनिधित्व कर रहा है। मुशावरत ने 4 अक्टूबर 2016 को AIMPLB के प्रमुख मौलाना सईद राबे नदवी को लिखे गए पत्र में इस प्रक्रिया की कड़ी आलोचना करते हुए कहा बोर्ड के इस स्टैंड की वजह से सिर्फ उन आरोपों कों मजबूती मिलेगी जिसमें कहा गया है कि इस्लाम में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले निचले स्तर पर रखा गया है।

मुशावरत ने ये भी कहा कि जाफरी (शिया) और अहले हदीस जैसे वर्ग तीन तलाक की इजाजत नहीं देते और पहले मध्यस्तता पर जोर देते हैं। बोर्ड मुस्लिमों के किसी एक वर्ग का प्लेटफॉर्म नहीं है। बल्कि ये उन लोगों का बी प्रतिनिध्व करता है जो कि अहले हदीस और जाफरी समुदायों का हिस्सा हैं।

ऐसे में बोर्ड को कोर्ट के भीतर सिर्फ हनाफी सुन्नी समुदायों में प्रचलित तीन तलाकों के बारे में ही प्रतिनिधित्व नहीं करना चाहिए।  मुशावरत ने कहा कि बोर्ड ने हमारे द्वारा लिखे गए दोनों खतों का कोई जवाब नहीं दिया और न ही हमारे द्वारा उठाए गए सवालों का हलफनामे में जिक्र नहीं किया। वो मुस्लिमों के केस को कोर्ट के भीतर मजबूती से नहीं रख रहे हैं। 

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