{"_id":"61d539dd6702da3e746c6ba5","slug":"multi-agency-centre-a-nodal-establishment-for-sharing-intelligence-inputs-among-various-agencies-state-hesitated-to-share-intelligence-inputs-amit-shah-asks-dgps-to-share-adequate-information-and-actionable-inputs-through-multi-agency-centre","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Multi Agency Centre: क्या है मल्टी एजेंसी सेंटर जिससे जरिए केंद्र राज्यों से लेती है खुफिया जानकारी, इसका गठन क्यों हुआ था?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Multi Agency Centre: क्या है मल्टी एजेंसी सेंटर जिससे जरिए केंद्र राज्यों से लेती है खुफिया जानकारी, इसका गठन क्यों हुआ था?
Wed, 05 Jan 2022 01:05 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Wed, 05 Jan 2022 01:05 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
गृह मंत्रालय
- फोटो :
ANI
विस्तार
बढ़ते आतंकवादी खतरों और देश की सुरक्षा के मद्देनजर केंद्र सरकार चाहती है कि राज्य मल्टी एजेंसी सेंटर (एमएसी) के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा खुफिया जानकारी साझा करें। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को एक उच्च स्तरीय बैठक की जिसमें उन्होंने पुलिस महानिदेशकों से कहा है कि एमएसी के जरिए पर्याप्त जानकारी और कार्रवाई करने योग्य इनपुट साझा करें। गृह मंत्रालय मैक का नोडल मंत्रालय है।दरअसल कई बार समन्वय की कमी और खुफिया एजेंसियों के बीच अविश्वास के कारण आतंकवादी घटनाओं को रोकने के लिए समय पर कार्रवाई नहीं की जा सकी है। इसलिए सरकार चाहती है कि खतरों को समय पर भांप लेने और खतरों को टालने के लिए खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय बना रहे ताकि जमीनी स्तर पर आवश्यक कार्रवाई करने में किसी भी प्रकार की देरी नहीं हो।
क्या है मैक
यह इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के तहत करने वाला एक आम आतंकवाद विरोधी ग्रिड है, जिसे 2001 में कारगिल युद्ध के बाद शुरू किया गया था। लेकिन 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद दिसंबर 2008 में इसे और मजबूत किया गया। कारगिल युद्ध के दौरान देश की टॉप खुफिया एजेंसियों के फेल होने की बात सामने आई थी और उन्हें पाकिस्तानी सेना के मूवमेंट की खबर भी नहीं लगी थी। बताया यह भी जाता है कि उस समय विभिन्न एजेंसिंयो के बीच समन्वय की भी बहुत कमी देखी गई थी। इस युद्ध के बाद ही मैक जैसे एक नोडल प्रणाली को विकसित करने की जरूरत महसूस की गई।
सुरक्षा समीक्षा बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (फाइल फोटो)
- फोटो :
Agency
यह रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ), सशस्त्र बल और राज्य पुलिस सहित 28 संगठनों का हिस्सा हैं और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियां मैक से कानून व्यवस्था या आतंकवादी गतिविधियों से जुड़ी रीयल-टाइम इंटेलिजेंस इनपुट साझा करती हैं। सिस्टम को जिला स्तर तक जोड़ने की योजना भी एक दशक से भी ज्यादा समय से चल रही है।
अमित शाह ने बैठक क्यों की?
गृह मंत्रालय की ओर से सोमवार को जारी एक बयान में कहा गया है कि यह बैठक देश में मौजूदा खतरे के परिदृश्य और उभरती सुरक्षा चुनौतियों की समीक्षा करने के लिए बुलाई गई थी। बयान के मुताबिक ‘आतंकवाद और वैश्विक आतंकवादी समूहों के निरंतर खतरों, आतंक वित्तपोषण, नार्को-आतंकवाद, संगठित अपराध-आतंकवाद, साइबर स्पेस के अवैध उपयोग और विदेशी आतंकवादी लड़ाकों की आवाजाही के मद्देनजर गृह मंत्री ने बेहतर समन्वय और तालमेल की आवश्यकता पर जोर दिया।
अमित शाह ने बैठक क्यों की?
गृह मंत्रालय की ओर से सोमवार को जारी एक बयान में कहा गया है कि यह बैठक देश में मौजूदा खतरे के परिदृश्य और उभरती सुरक्षा चुनौतियों की समीक्षा करने के लिए बुलाई गई थी। बयान के मुताबिक ‘आतंकवाद और वैश्विक आतंकवादी समूहों के निरंतर खतरों, आतंक वित्तपोषण, नार्को-आतंकवाद, संगठित अपराध-आतंकवाद, साइबर स्पेस के अवैध उपयोग और विदेशी आतंकवादी लड़ाकों की आवाजाही के मद्देनजर गृह मंत्री ने बेहतर समन्वय और तालमेल की आवश्यकता पर जोर दिया।
खुफिया विभाग
- फोटो :
सोशल मीडिया
क्या राज्य सरकारें जानकारी देने में हिचकती हैं?
बताया जा रहा है कि हालांकि विभिन्न एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने के लिए यह प्रणाली बनी हुई , लेकिन इसे प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है। राज्य सरकारें अक्सर इस प्रणाली के जरिए जानकारी साझा करने से हिचकती हैं। महत्वपूर्ण जानकारी को सही समय पर साझा करने में कई कमियां हैं। इसलिए गृह मंत्री ने यह बैठक की ताकि राज्य सरकारें इस प्रणाली को अपना पूरा सहयोग दें और किसी भी आपत स्थिति में केंद्र और राज्य सरकारें त्वरित ढंग से काम कर सकें।
संसदीय समिति ने भी किया था इस पर गौर
राज्यों के असहयोग की बात 2020 में एक संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में भी कही गई थी। तब इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक अरविंद कुमार ने संसदीय समिति को बताया था कि मैक भारत के आतंकवाद विरोधी ग्रिड का एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक है और यह अच्छी तरह से काम कर रहा है, लेकिन जब उनसे यह पूछा गया कि क्या राज्य सरकारें इसमें सहयोग करती हैं तो उन्होंने कहा था अधिकांश राज्य मैक के साथ अपनी खुफिया जानकारी साझा करते हैं लेकिन ऐसे कुछ उदाहरण हैं जहां राज्य सरकारें जानकारी देने में हिचकती है। तब संसदीय समिति ने इस पर टिप्पणी कि, ‘सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इनपुट लेने के मामले में समन्वय कैसे करें।’
बताया जा रहा है कि हालांकि विभिन्न एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने के लिए यह प्रणाली बनी हुई , लेकिन इसे प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है। राज्य सरकारें अक्सर इस प्रणाली के जरिए जानकारी साझा करने से हिचकती हैं। महत्वपूर्ण जानकारी को सही समय पर साझा करने में कई कमियां हैं। इसलिए गृह मंत्री ने यह बैठक की ताकि राज्य सरकारें इस प्रणाली को अपना पूरा सहयोग दें और किसी भी आपत स्थिति में केंद्र और राज्य सरकारें त्वरित ढंग से काम कर सकें।
संसदीय समिति ने भी किया था इस पर गौर
राज्यों के असहयोग की बात 2020 में एक संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में भी कही गई थी। तब इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक अरविंद कुमार ने संसदीय समिति को बताया था कि मैक भारत के आतंकवाद विरोधी ग्रिड का एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक है और यह अच्छी तरह से काम कर रहा है, लेकिन जब उनसे यह पूछा गया कि क्या राज्य सरकारें इसमें सहयोग करती हैं तो उन्होंने कहा था अधिकांश राज्य मैक के साथ अपनी खुफिया जानकारी साझा करते हैं लेकिन ऐसे कुछ उदाहरण हैं जहां राज्य सरकारें जानकारी देने में हिचकती है। तब संसदीय समिति ने इस पर टिप्पणी कि, ‘सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इनपुट लेने के मामले में समन्वय कैसे करें।’
फोन टैपिंग (फाइल फोटो)
- फोटो :
Social Media
तकनीकी खुफिया पर ज्यादा निर्भर
देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली मल्टी-एजेंसी सेंटर के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ समय से भारत की खुफिया एजेंसियां और पुलिस ‘मानव खुफिया’ के बजाय ‘तकनीकी खुफिया’ पर ज्यादा निर्भर रहने लगी हैं। मैक के डेटा से पता चलता है कि 2019 में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद पर साझा किए गए 8,800 तकनीक पर आधारित थे। केवल 1,079 सूचनाएं मानव संसाधनों के माध्यम से एकत्र की गई थी। 2020 में भी, जम्मू-कश्मीर के लिए यह संख्या लगभग समान थी।
तकनीक पर निर्भरता ज्यादा क्यों हैं?
इसके दो प्रमुख कारण बताए जाते हैं। पुलिस अधिकारियों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से डेटा एकत्र करना त्वरित और आसान लगता है। जो जानकारी तकनीक की सहायता से तुरंत हासिल हो जाती है उसे मानव संसाधनों के जरिए हासिल करने में समय लगता है। दूसरी समस्या यह आती है कि मानव स्रोत से हासिल की गई जानकारी या सूचना को डबल-क्रॉस करना पड़ता है, जबकि तकनीक की सहायता से हासिल की गई जानकारी पुख्ता होती है और यह सबूत की तरह होता है।
देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली मल्टी-एजेंसी सेंटर के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ समय से भारत की खुफिया एजेंसियां और पुलिस ‘मानव खुफिया’ के बजाय ‘तकनीकी खुफिया’ पर ज्यादा निर्भर रहने लगी हैं। मैक के डेटा से पता चलता है कि 2019 में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद पर साझा किए गए 8,800 तकनीक पर आधारित थे। केवल 1,079 सूचनाएं मानव संसाधनों के माध्यम से एकत्र की गई थी। 2020 में भी, जम्मू-कश्मीर के लिए यह संख्या लगभग समान थी।
तकनीक पर निर्भरता ज्यादा क्यों हैं?
इसके दो प्रमुख कारण बताए जाते हैं। पुलिस अधिकारियों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से डेटा एकत्र करना त्वरित और आसान लगता है। जो जानकारी तकनीक की सहायता से तुरंत हासिल हो जाती है उसे मानव संसाधनों के जरिए हासिल करने में समय लगता है। दूसरी समस्या यह आती है कि मानव स्रोत से हासिल की गई जानकारी या सूचना को डबल-क्रॉस करना पड़ता है, जबकि तकनीक की सहायता से हासिल की गई जानकारी पुख्ता होती है और यह सबूत की तरह होता है।