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मुख्यमंत्री बिहार के: सबसे छोटे कार्यकाल वाले सीएम, जिसने अपने नेता के लिए छोड़ा पद, फिल्म में भी आजमाया हाथ
Wed, 30 Jul 2025 06:00 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 30 Jul 2025 06:00 AM IST
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सार
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'मुख्यमंत्री बिहार' के सीरीज की पांचवीं कड़ी में राज्य के छठवें सीएम सतीश प्रसाद सिन्हा की कहानी।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
बिहार के छठवें मुख्यमंत्री के नाम सबसे कम समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड है। 'मुख्यमंत्री बिहार के' सीरीज की पांचवीं कड़ी में आज बात चार दिन के सीएम रहे सतीश प्रसाद सिंह की। सियासत के साथ सतीश प्रसाद सिंह ने फिल्म निर्माण की दुनिया में भी हाथ आजमाया। यह बात अलग है कि फिल्मी दुनिया में उनका करियर राजनीति की तरह लंबा नहीं रहा, लेकिन उनकी खुद की कहानी कम फिल्मी नहीं है।शुरुआती जीवन में ही दिखाए बगावती तेवर
खगड़िया जिले के परबत्ता प्रखंड में स्थित कोरचक्का गांव से इस कहानी की शुरुआत हुई। 1 जनवरी 1936 को एक जमींदार परिवार में पैदा हुए सतीश प्रसाद के पिता विश्वनाथ सिंह के पास 400 बीघा के करीब जमीन थी। प्रारंभिक शिक्षा के बाद वे पढ़ाई करने मुंगेर चले गए। यहां उन्होंने मैट्रिक के बाद स्नातक तक की पढ़ाई पूरी। जब सतीश प्रसाद स्नातक की पढ़ाई कर ही रहे थे, तभी उनकी मुलाकात हुई ज्ञानकला नाम की लड़की से। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई। इसके बाद सतीश प्रसाद ने शादी की ठानी। उन्होंने इस सिलसिले में घरवालों को भी बताया। लेकिन एक जमींदार परिवार को अपने बेटे के किसी और जाति की लड़की से शादी का प्रस्ताव गंवारा न हुआ।
यहां पढ़ें 'मुख्यमंत्री बिहार के' सीरीज की पिछली कड़ियां
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सतीश प्रसाद भी कहां मानने वाले थे। कॉलेज के दिनों से ही समाजवाद की राजनीति में दिलचस्पी लेने वाले सतीश ने ज्ञानकला से शादी कर ली। चूंकि, परिवार पहले ही इस फैसले को लेकर नापसंदगी जता चुका था, इसलिए सतीश प्रसाद को पारिवारिक विरासत से अलग कर दिया। लेकिन उन्हें उनके हिस्से की जमीन देकर। उनके हक में आई इस जमीन का किस्सा भी ऐसा है कि इसके बल पर वे न सिर्फ चुनाव लड़े, बल्कि इसी की बदौलत मुख्यमंत्री पद तक भी पहुंचे।
हिस्से में आई जमीन ने कैसे बनाया विधायक?
विवाह के बाद सतीश प्रसाद सिंह के जीवनकाल का नया अध्याय शुरू हुआ। उन्होंने राजनीति में पूरी तरह उतरने की तैयारी कर ली। 1962 में उन्होंने अपने जिले में आने वाली परबत्ता विधानसभा सीट से विधायकी का चुनाव लड़ने की ठानी। हालांकि, चुनाव लड़ने के लिए जरूरत होती है पैसों की और परिवार से अलग होने के बाद सतीश प्रसाद के पास इसकी काफी कमी थी। आखिरकार उन्होंने विधायक का चुनाव लड़ने के लिए अपने हिस्से की जमीन का कुछ हिस्सा बेच दिया और स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा। इस राजनीतिक दल का गठन राजाजी के नाम से लोकप्रिय सी. राजागोपालाचारी ने कांग्रेस को चुनौती देने के लिए किया था। स्वतंत्र दल का मकसद उदार समाजवाद को बढ़ावा देना था और राजागोपालाचरी मानते थे कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू देश को वामपंथी समाजवाद की तरफ धकेल रहे हैं। सतीश प्रसाद सिंह भी उदार समाजवाद से मोहित होकर स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर उतर गए।
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विवाह के बाद सतीश प्रसाद सिंह के जीवनकाल का नया अध्याय शुरू हुआ। उन्होंने राजनीति में पूरी तरह उतरने की तैयारी कर ली। 1962 में उन्होंने अपने जिले में आने वाली परबत्ता विधानसभा सीट से विधायकी का चुनाव लड़ने की ठानी। हालांकि, चुनाव लड़ने के लिए जरूरत होती है पैसों की और परिवार से अलग होने के बाद सतीश प्रसाद के पास इसकी काफी कमी थी। आखिरकार उन्होंने विधायक का चुनाव लड़ने के लिए अपने हिस्से की जमीन का कुछ हिस्सा बेच दिया और स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा। इस राजनीतिक दल का गठन राजाजी के नाम से लोकप्रिय सी. राजागोपालाचारी ने कांग्रेस को चुनौती देने के लिए किया था। स्वतंत्र दल का मकसद उदार समाजवाद को बढ़ावा देना था और राजागोपालाचरी मानते थे कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू देश को वामपंथी समाजवाद की तरफ धकेल रहे हैं। सतीश प्रसाद सिंह भी उदार समाजवाद से मोहित होकर स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर उतर गए।
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हालांकि, पहली बार उन्हें चुनाव में कांग्रेस की लक्ष्मी देवी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इस सीट पर 1964 में लक्ष्मी देवी के निधन के बाद फिर उपचुनाव भी हुए। सतीश प्रसाद सिंह फिर जमीन का एक टुकड़ा बेचकर चुनाव लड़ा। इस बार निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर और फिर हारे। लेकिन दो हार ने उनके हौसले को नहीं तोड़ा। बताया जाता है कि वे अगले चुनाव तक परबत्ता में ही टिके रहे। आखिरकार 1967 में जब बिहार में विधानसभा चुनाव हुए तो सतीश प्रसाद सिंह को परबत्ता सीट से जवाहर लाल नेहरू की नीतियों के एक और विरोधी की तरफ से टिकट मिला। यह नेता थे डॉ. राम मनोहर लोहिया और उनकी पार्टी थी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा)। वही संसोपा, जो 1967 के चुनाव में कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने की अहम वजह बनी। राज्य में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद संसोपा ने 13 विधायकों वाले जन क्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा के मुख्यमंत्री बनाने पर सहमति दे दी। खुद संसोपा के उस वक्त के कद्दावर नेता कर्पूरी ठाकुर सीएम की जगह डिप्टी सीएम पद हासिल कर पाए थे।
खैर सतीश प्रसाद सिंह की कहानी पर लौटते हैं। सतीश प्रसाद ने एक बार फिर अपनी हिस्सेदारी वाली जमीन का एक टुकड़ा बेचा और उतर गए मैदान में। इस बार उन्होंने जीत हासिल की और विधानसभा पहुंचे। इसी चुनाव में पहली बार बिहार में गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ, भाकपा, जन क्रांति दल और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को मिलाकर सरकार बनी। जन क्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा बिहार के पांचवें मुख्यमंत्री बने।
यहां पढ़ें: मुख्यमंत्री बिहार के: बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी CM की कहानी, अपनी सरकार के खिलाफ आंदोलन कर बने ‘जायंट किलर’
खैर सतीश प्रसाद सिंह की कहानी पर लौटते हैं। सतीश प्रसाद ने एक बार फिर अपनी हिस्सेदारी वाली जमीन का एक टुकड़ा बेचा और उतर गए मैदान में। इस बार उन्होंने जीत हासिल की और विधानसभा पहुंचे। इसी चुनाव में पहली बार बिहार में गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ, भाकपा, जन क्रांति दल और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को मिलाकर सरकार बनी। जन क्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा बिहार के पांचवें मुख्यमंत्री बने।
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संविद गठबंधन में दरार और 'मंडल कमीशन' वाले बीपी मंडल का प्यार
संविद सरकार में शुरुआत में तो सब ठीक-ठाक दिख रहा था, लेकिन कई दलों की खिचड़ी से बने इस गठबंधन के कई नेता सरकार में अपना दबदबा चाहते थे। दूसरी तरफ जनसंघ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की विचारधारा एक-दूसरे के बिल्कुल उलट थी। जल्द ही संविद गठबंधन में दरार दिखने लगी। हालात ऐसे हो गए कि महामाया प्रसाद सिन्हा का कार्यकाल एक साल तक जाता भी नहीं दिख रहा था। हालांकि, बाकी वजहों के अलावा महामाया प्रसाद के सीएम पद से हटने की एक बड़ी वजह थे बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल, जो यादव समाज के प्रमुख नेता थे और संसोपा से सांसद होने के बावजूद बिहार की महामाया प्रसाद सरकार में अपने लिए मंत्री पद चाहते थे। हालांकि, लोहिया इसके सख्त खिलाफ रहे। आखिरकार बीपी मंडल संसोपा से अलग हुए और अपना अलग शोषित दल बना लिया।
संविद सरकार में शुरुआत में तो सब ठीक-ठाक दिख रहा था, लेकिन कई दलों की खिचड़ी से बने इस गठबंधन के कई नेता सरकार में अपना दबदबा चाहते थे। दूसरी तरफ जनसंघ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की विचारधारा एक-दूसरे के बिल्कुल उलट थी। जल्द ही संविद गठबंधन में दरार दिखने लगी। हालात ऐसे हो गए कि महामाया प्रसाद सिन्हा का कार्यकाल एक साल तक जाता भी नहीं दिख रहा था। हालांकि, बाकी वजहों के अलावा महामाया प्रसाद के सीएम पद से हटने की एक बड़ी वजह थे बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल, जो यादव समाज के प्रमुख नेता थे और संसोपा से सांसद होने के बावजूद बिहार की महामाया प्रसाद सरकार में अपने लिए मंत्री पद चाहते थे। हालांकि, लोहिया इसके सख्त खिलाफ रहे। आखिरकार बीपी मंडल संसोपा से अलग हुए और अपना अलग शोषित दल बना लिया।
दूसरी तरफ संसोपा से ही जीतकर पहली बार विधायक बने सतीश प्रसाद सिंह की सरकारी पदों पर कुछ नियुक्तियों को लेकर सीएम महामाया प्रसाद से कहासुनी हो गई। कहा जाने लगा कि जन क्रांति दल की मनमानी चल रही है और संसोपा के सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसके पिछड़े जाति के नेताओं की बात नहीं सुनी जा रही। बीपी मंडल ऐसे ही एक विवाद के इंतजार में थे। उन्होंने तुरंत ही इस पूरे विवाद में सतीश प्रसाद सिंह को समर्थन दे दिया। उधर बाहर से इस पूरे घटनाक्रम को देख रही कांग्रेस को आखिरकार सरकार में वापस लौटने का रास्ता दिखा। कांग्रेस की तरफ से लोहिया के विचारों वाली सरकार को गिराने की जिम्मा मिला बिहार के चौथे मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय को। वही केबी सहाय, जिनको हराकर महामाया प्रसाद सिन्हा जायंट किलर कहलाने लगे थे और मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे बड़े दावेदार के तौर पर उभरे थे।
ऐसे में केबी सहाय के लिए संविद सरकार को हटाना एक लक्ष्य की तरह था। सतीश प्रसाद सिंह और बीपी मंडल ने जोड़तोड़ के जरिए संयुक्त विधायक दल सरकार से करीब 20-30 नेताओं को तोड़ भी लिया। आखिरकार 1968 में विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ। सीएम महामाया गठबंधन को अपने साथ नहीं रख पाए और सरकार गिर गई।
ऐसे में केबी सहाय के लिए संविद सरकार को हटाना एक लक्ष्य की तरह था। सतीश प्रसाद सिंह और बीपी मंडल ने जोड़तोड़ के जरिए संयुक्त विधायक दल सरकार से करीब 20-30 नेताओं को तोड़ भी लिया। आखिरकार 1968 में विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ। सीएम महामाया गठबंधन को अपने साथ नहीं रख पाए और सरकार गिर गई।
बिहार में अगला मुख्यमंत्री तय, लेकिन व्यवस्था का भय
बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार तो जनवरी के अंतिम सप्ताह में गिर गई, लेकिन शोषित दल के बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल ने अपने करीबी सतीश प्रसाद सिंह का नाम अंतरिम तौर पर आगे कर दिया, ताकि जब बीपी मंडल कहें तब एसपी सिंह इस्तीफा दे दें और मंडल बिहार के सीएम बन सकें।
आखिरकार सतीश प्रसाद सिंह ने बिहार के छठे मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। वे ओबीसी समुदाय से आने वाले राज्य के पहले सीएम बने। 28 जनवरी 1968 की शाम उन्होंने शपथ ली। 30 जनवरी को उनके साथ शोषित दल के दो और मंत्रियों को शपथ ली। उधर मंडल जो सांसद थे उनके सीएम न बन पाने की समस्या का भी तोड़ निकाल लिया गया और कैबिनेट की बैठक में बीपी मंडल को विधान परिषद भेजने की अनुशंसा कर दी। 29 जनवरी को बीपी मंडल को विधान परिषद भेजा गया और 1 फरवरी 1968 को बिहार में बीपी मंडल के नेतृत्व में सरकार बन गई। सतीश प्रसाद सिंह इस सरकार में मंत्री बने। इस तरह बिहार में चार दिन के मुख्यमंत्री की कहानी का अंत हुआ।
बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार तो जनवरी के अंतिम सप्ताह में गिर गई, लेकिन शोषित दल के बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल ने अपने करीबी सतीश प्रसाद सिंह का नाम अंतरिम तौर पर आगे कर दिया, ताकि जब बीपी मंडल कहें तब एसपी सिंह इस्तीफा दे दें और मंडल बिहार के सीएम बन सकें।
आखिरकार सतीश प्रसाद सिंह ने बिहार के छठे मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। वे ओबीसी समुदाय से आने वाले राज्य के पहले सीएम बने। 28 जनवरी 1968 की शाम उन्होंने शपथ ली। 30 जनवरी को उनके साथ शोषित दल के दो और मंत्रियों को शपथ ली। उधर मंडल जो सांसद थे उनके सीएम न बन पाने की समस्या का भी तोड़ निकाल लिया गया और कैबिनेट की बैठक में बीपी मंडल को विधान परिषद भेजने की अनुशंसा कर दी। 29 जनवरी को बीपी मंडल को विधान परिषद भेजा गया और 1 फरवरी 1968 को बिहार में बीपी मंडल के नेतृत्व में सरकार बन गई। सतीश प्रसाद सिंह इस सरकार में मंत्री बने। इस तरह बिहार में चार दिन के मुख्यमंत्री की कहानी का अंत हुआ।
जब बीपी मंडल को लगा- शायद मुख्यमंत्री पद से न हटें सतीश प्रसाद
जब सतीश प्रसाद सिंह चार दिन के लिए मुख्यमंत्री थे, उस दौरान का एक वाकया काफी प्रचलित है। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि 30 जनवरी को बिहार के तत्कालीन राज्यपाल नित्यानंद कानूनगो महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित कर लौट रहे थे। इस दौरान बीएन कॉलेज के सामने कुछ आंदोलन कर रहे छात्रों ने उनकी गाड़ी को घेर लिया। इस दौरान एक पत्थर राज्यपाल की गाड़ी पर लगा और शीशा टूट गया। देखते ही देखते पुलिस और छात्रों के बीच झड़प हो गई। इस घटना के बाद बीपी मंडल ने मुख्य सचिव को आरोपी छात्रों की गिरफ्तारी करवाने का निर्देश दिया। लेकिन मुख्यमंत्री पद पर बैठे सतीश प्रसाद सिंह ने मुख्य सचिव को ऐसा करने से रोक दिया।
जब सतीश प्रसाद सिंह चार दिन के लिए मुख्यमंत्री थे, उस दौरान का एक वाकया काफी प्रचलित है। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि 30 जनवरी को बिहार के तत्कालीन राज्यपाल नित्यानंद कानूनगो महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित कर लौट रहे थे। इस दौरान बीएन कॉलेज के सामने कुछ आंदोलन कर रहे छात्रों ने उनकी गाड़ी को घेर लिया। इस दौरान एक पत्थर राज्यपाल की गाड़ी पर लगा और शीशा टूट गया। देखते ही देखते पुलिस और छात्रों के बीच झड़प हो गई। इस घटना के बाद बीपी मंडल ने मुख्य सचिव को आरोपी छात्रों की गिरफ्तारी करवाने का निर्देश दिया। लेकिन मुख्यमंत्री पद पर बैठे सतीश प्रसाद सिंह ने मुख्य सचिव को ऐसा करने से रोक दिया।
सतीश प्रसाद के इस तरह अपने आदेश को पलट देने से बीपी मंडल के मन में एक शंका घर कर गई कि सतीश प्रसाद सिंह शायद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न दें। इस बाबत उन्होंने कांग्रेस नेता राम लखन सिंह यादव से बात की। मुद्दा कांग्रेस विधायक दल के नेता महेश प्रसाद सिन्हा तक पहुंचा और उन्होंने सतीश प्रसाद सिंह से बात की। हालांकि, मुख्यमंत्री का साफ संकेत दिए कि बीपी मंडल की शंका बिल्कुल निराधार है। उन्होंने अगले ही दिन इस्तीफा दे दिया और बीपी मंडल को मुख्यमंत्री पद सौंप दिया।
अपने चार दिन के कार्यकाल में लिए कई अहम फैसले
बिहार में सतीश प्रसाद सिंह भले ही महज चार दिन के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन इस दौरान उन्होंने किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए एक अहम फैसला किया। दरअसल, उस दौर में बिहार में कुशवाहा जाति के अधिकतर किसान आलू उत्पादन में अग्रणी थे। हालांकि, बिहार में तब आलू को राज्य से बाहर बेचने की अनुमति नहीं थी। सतीश प्रसाद सिंह ने किसानों के आलू बिहार से बाहर भेजने की छूट का नियम बना दिया। यह फैसला बिहार के लिए खासा फायदे वाला साबित हुआ और सतीश प्रसाद सिंह की लोकप्रियता लगातार बनी रही।
बिहार में सतीश प्रसाद सिंह भले ही महज चार दिन के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन इस दौरान उन्होंने किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए एक अहम फैसला किया। दरअसल, उस दौर में बिहार में कुशवाहा जाति के अधिकतर किसान आलू उत्पादन में अग्रणी थे। हालांकि, बिहार में तब आलू को राज्य से बाहर बेचने की अनुमति नहीं थी। सतीश प्रसाद सिंह ने किसानों के आलू बिहार से बाहर भेजने की छूट का नियम बना दिया। यह फैसला बिहार के लिए खासा फायदे वाला साबित हुआ और सतीश प्रसाद सिंह की लोकप्रियता लगातार बनी रही।
चुनाव में फिर मिली हार तो राजनीति से बनाई दूरी, बने फिल्म डायरेक्टर
बिहार में जिस बीपी मंडल सरकार में सतीश प्रसाद सिंह मंत्री बने थे, वह भी दो महीने नहीं चल पाई। जोड़-तोड़ की राजनीति और बनती-बिगड़ती सरकारों के बीच बिहार में अगले चुनाव 1969 में हुए। यह मध्यावधि चुनाव थे और परबत्ता से सतीश प्रसाद ने शोषित दल के टिकट पर चुनाव लड़ा। लेकिन एक बार फिर वे चुनाव फिर हार गए। माना जाता है कि इस हार के बाद उन्होंने खुद को सियासत से दूर करने का फैसला कर लिया। 1972 के विधानसभा चुनाव में वे उतरे तक नहीं। इससे पहले खबरें आईं कि पूर्व मुख्यमंत्री अब फिल्म निर्माता और निर्देशक बन गए हैं।
सतीश प्रसाद सिंह ने इस दौर में एक फिल्म का भी निर्माण किया था। नाम था- जोगी और जवानी। वे इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक थे। साथ ही उन्होंने इसमें अभिनय भी किया। लेकिन यह फिल्म कभी रिलीज नहीं हो पाई। तहलका मैगजीन को दिए एक इंटरव्यू में तब उन्होंने बताया था ‘जोगी और जवानी’ फिल्म सुर्खियों में आने के लिए बनाई थी। मगर ये कभी रिलीज नहीं हुई।
बिहार में जिस बीपी मंडल सरकार में सतीश प्रसाद सिंह मंत्री बने थे, वह भी दो महीने नहीं चल पाई। जोड़-तोड़ की राजनीति और बनती-बिगड़ती सरकारों के बीच बिहार में अगले चुनाव 1969 में हुए। यह मध्यावधि चुनाव थे और परबत्ता से सतीश प्रसाद ने शोषित दल के टिकट पर चुनाव लड़ा। लेकिन एक बार फिर वे चुनाव फिर हार गए। माना जाता है कि इस हार के बाद उन्होंने खुद को सियासत से दूर करने का फैसला कर लिया। 1972 के विधानसभा चुनाव में वे उतरे तक नहीं। इससे पहले खबरें आईं कि पूर्व मुख्यमंत्री अब फिल्म निर्माता और निर्देशक बन गए हैं।
सतीश प्रसाद सिंह ने इस दौर में एक फिल्म का भी निर्माण किया था। नाम था- जोगी और जवानी। वे इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक थे। साथ ही उन्होंने इसमें अभिनय भी किया। लेकिन यह फिल्म कभी रिलीज नहीं हो पाई। तहलका मैगजीन को दिए एक इंटरव्यू में तब उन्होंने बताया था ‘जोगी और जवानी’ फिल्म सुर्खियों में आने के लिए बनाई थी। मगर ये कभी रिलीज नहीं हुई।