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मुख्यमंत्री बिहार के: बेटे को लड़ाने की मांग पर चुनाव में न उतरने की धमकी दी, तिजोरी में मिली इतनी 'संपत्ति'
Tue, 17 Jun 2025 08:21 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 17 Jun 2025 08:21 AM IST
सार
बिहार के लिए ये चुनावी साल है। अक्तूबर-नवंबर में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव साल में अमर उजाला बिहार और बिहार से राजनीति जुड़े चेहरों के बारे में अलग-अलग सीरीज शुरू कर रहा है। इसी से जुड़ी ‘मुख्यमंत्री बिहार के’ सीरीज में हम आपको बिहार के मुख्यमंत्रियों के बारे में बताएंगे। आज बात बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा की।
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बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
21 अक्टूबर 1887 को बिहार के नवादा जिले के खानवा में एक बच्चे का जन्म होता है। ये बच्चा मुंगेर के जिला विद्यालय में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद पटना पहुंचता है। पटना कॉलेज में कानून की पढ़ाई करने के बाद साल 1915 में वापस मुंगेर लौटता है और वकालत शुरू कर देता है। इस युवा वकील को जिंदगी का असली मकसद मिलना अभी बाकी था। इस युवा को ये मकसद एक साल बाद यानी 1916 में मिलता है जब उसकी मुलाकात महात्मा गांधी से होती है। बनारस के सेंट्रल हिंदू कॉलेज में हुई इस मुलाकात के बाद इस युवा की जिदंगी इतनी बदलती है कि आगे चलकर ये युवा बिहार का मुख्यमंत्री बना। बिहार की जनता ने उन्हें प्यार से ‘बिहार केसरी’ कहा। हम बात कर रहे हैं बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा की।
बिहार के लिए ये चुनावी साल है। अक्तूबर-नवंबर में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव साल में अमर उजाला बिहार और बिहार से राजनीति जुड़े चेहरों के बारे में अलग-अलग सीरीज शुरू कर रहा है। इसी से जुड़ी ‘मुख्यमंत्री बिहार के’ सीरीज में हम आपको बिहार के मुख्यमंत्रियों के बारे में बताएंगे। मुख्यमंत्रियों की जिंदगी, उनके फैसलों और विवादों के बारे में भी बात होगी। इसकी पहली कड़ी में आज बाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा की, जिनका नाम आपको कई जगह श्रीकृष्ण सिंह भी मिलेगा।
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बिहार के लिए ये चुनावी साल है। अक्तूबर-नवंबर में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव साल में अमर उजाला बिहार और बिहार से राजनीति जुड़े चेहरों के बारे में अलग-अलग सीरीज शुरू कर रहा है। इसी से जुड़ी ‘मुख्यमंत्री बिहार के’ सीरीज में हम आपको बिहार के मुख्यमंत्रियों के बारे में बताएंगे। मुख्यमंत्रियों की जिंदगी, उनके फैसलों और विवादों के बारे में भी बात होगी। इसकी पहली कड़ी में आज बाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा की, जिनका नाम आपको कई जगह श्रीकृष्ण सिंह भी मिलेगा।
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महात्मा गांधी से एक मुलाकात ने बदल दी जीवन की दिशा
बात 1916 की हो रही थी, जब श्रीकृष्ण सिन्हा पहली बार महात्मा गांधी से मिले। इस मुलाकात ने उन्हें इतना प्रेरित किया कि श्रीकृष्णा सिन्हा आजादी की लड़ाई में कूद गए। आजादी की इस लड़ाई के लिए उन्होंने 1921 में वकालत का पेशा भी छोड़ दिया। 1922 में उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा। दलअसल, ये वो साल था जब अंग्रेज़ों ने कांग्रेस सेवा दल को एक अवैध पार्टी करार दिया। कृष्ण सिन्हा इस पार्टी के सदस्य थे और इसी कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। नमक सत्याग्रह के दौरान भी उन्हें जेल में डाल गया। आजादी की लड़ाई के दौरान श्रीकृष्ण सिन्हा ने लगभग आठ साल जेल में बिताए।
मुख्यमंत्री के रूप में श्रीकृष्ण सिन्हा के ये काम आज भी किए जाते हैं याद
1937 में, जब अंग्रेजों ने धीरे-धीरे राज्यों की सत्ता में भारतीयों को जगह देना शुरू किया तो बिहार में कांग्रेस सत्ता में आई। श्रीकृष्ण सिन्हा इस प्रांत के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 20 जुलाई 1937 को पटना में, भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत, अपने कैबिनेट का गठन किया। कृष्ण सिन्हा ने 1937 से 1961 तक बिहार की बागडोर संभाली। जमींदारी प्रथा को समाप्त करने वाले वे देश के पहले मुख्यमंत्री थे। उन्होंने कोशी, अघौर और सकरी में नदी-घाटी परियोजनाओं को भी लागू किया और बिहार में तेल-शोधन और उर्वरक उत्पादन जैसे भारी उद्योगों की भी शुरुआत की।
बात 1916 की हो रही थी, जब श्रीकृष्ण सिन्हा पहली बार महात्मा गांधी से मिले। इस मुलाकात ने उन्हें इतना प्रेरित किया कि श्रीकृष्णा सिन्हा आजादी की लड़ाई में कूद गए। आजादी की इस लड़ाई के लिए उन्होंने 1921 में वकालत का पेशा भी छोड़ दिया। 1922 में उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा। दलअसल, ये वो साल था जब अंग्रेज़ों ने कांग्रेस सेवा दल को एक अवैध पार्टी करार दिया। कृष्ण सिन्हा इस पार्टी के सदस्य थे और इसी कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। नमक सत्याग्रह के दौरान भी उन्हें जेल में डाल गया। आजादी की लड़ाई के दौरान श्रीकृष्ण सिन्हा ने लगभग आठ साल जेल में बिताए।
मुख्यमंत्री के रूप में श्रीकृष्ण सिन्हा के ये काम आज भी किए जाते हैं याद
1937 में, जब अंग्रेजों ने धीरे-धीरे राज्यों की सत्ता में भारतीयों को जगह देना शुरू किया तो बिहार में कांग्रेस सत्ता में आई। श्रीकृष्ण सिन्हा इस प्रांत के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 20 जुलाई 1937 को पटना में, भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत, अपने कैबिनेट का गठन किया। कृष्ण सिन्हा ने 1937 से 1961 तक बिहार की बागडोर संभाली। जमींदारी प्रथा को समाप्त करने वाले वे देश के पहले मुख्यमंत्री थे। उन्होंने कोशी, अघौर और सकरी में नदी-घाटी परियोजनाओं को भी लागू किया और बिहार में तेल-शोधन और उर्वरक उत्पादन जैसे भारी उद्योगों की भी शुरुआत की।
वोट मांगने नहीं जाते थे श्री बाबू
बिहार में विधानसभा चुनाव के इस दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक अपने प्रत्याशियों के लिए चुनावी मैदान में जाकर वोट मांगते दिखते हैं, लेकिन बिहार केसरी श्रीकृष्ण सिन्हा चुनाव के दौरान प्रत्याशियों के लिए तो क्या अपने लिए भी वोट मांगने नहीं जाते थे। 1957 के विधानसभा चुनाव में सिन्हा शेखपुरा जिले के बरबीघा से चुनाव लड़ रहे थे। उस दौरान उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा था कि इस चुनाव में वह जनता से वोट मांगने नहीं जाएंगे। उन्होंने कहा था कि अगर मैंने काम किया होगा या जनता मुझे इस लायक समझेगी, तो वोट देगी। अगर मुझे लायक नहीं समझेगी तो वोट नहीं देगी।
1957 के चुनाव में बेटे को टिकट देने की बात पर राजनीति छोड़ने पर अड़ गए
बिहार के एक वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने एक मीडिया ग्रुप से बातचीत में श्रीकृष्ण सिन्हा की सिद्धांतवादिता का जिक्र किया है। उन्होंने बताया था कि 1957 में चंपारण के कुछ लोगों ने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा के बेटे शिवशंकर सिन्हा को चंपारन की सीट से चुनाव लड़ाए जाने को लेकर आवाज उठा दी। हालांकि, श्रीबाबू ने यह कहते हुए इस मांग को खारिज कर दिया- लड़ा लीजिए, तब मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा। यानी बेटे के चुनाव लड़ने की स्थिति में पिता ही चुनावी राजनीति का त्याग कर देंगे।
बिहार में विधानसभा चुनाव के इस दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक अपने प्रत्याशियों के लिए चुनावी मैदान में जाकर वोट मांगते दिखते हैं, लेकिन बिहार केसरी श्रीकृष्ण सिन्हा चुनाव के दौरान प्रत्याशियों के लिए तो क्या अपने लिए भी वोट मांगने नहीं जाते थे। 1957 के विधानसभा चुनाव में सिन्हा शेखपुरा जिले के बरबीघा से चुनाव लड़ रहे थे। उस दौरान उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा था कि इस चुनाव में वह जनता से वोट मांगने नहीं जाएंगे। उन्होंने कहा था कि अगर मैंने काम किया होगा या जनता मुझे इस लायक समझेगी, तो वोट देगी। अगर मुझे लायक नहीं समझेगी तो वोट नहीं देगी।
1957 के चुनाव में बेटे को टिकट देने की बात पर राजनीति छोड़ने पर अड़ गए
बिहार के एक वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने एक मीडिया ग्रुप से बातचीत में श्रीकृष्ण सिन्हा की सिद्धांतवादिता का जिक्र किया है। उन्होंने बताया था कि 1957 में चंपारण के कुछ लोगों ने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा के बेटे शिवशंकर सिन्हा को चंपारन की सीट से चुनाव लड़ाए जाने को लेकर आवाज उठा दी। हालांकि, श्रीबाबू ने यह कहते हुए इस मांग को खारिज कर दिया- लड़ा लीजिए, तब मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा। यानी बेटे के चुनाव लड़ने की स्थिति में पिता ही चुनावी राजनीति का त्याग कर देंगे।
1957 में अपने ही साथी ने दे चुनौती, जीत के बाद दोनों रोए
श्रीकृष्ण सिन्हा की कहानी में एक अहम पड़ाव है 1957 का चुनाव। दरअसल, कांग्रेस ने यह चुनाव श्रीकृष्ण सिन्हा के नेतृत्व में ही लड़ा था। बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस ने 318 में से 210 सीटें जरूर हासिल कर लीं, लेकिन जातीय स्तर की राजनीति अंदर ही अंदर कांग्रेस में घर कर चुकी थी। ऐसे में श्रीकृष्ण सिन्हा के फिर मुख्यमंत्री बनने के रास्ते में अवरोध लग गए। फैसला हुआ कि अगले मुख्यमंत्री का फैसला विधायक दल करेगा। श्रीकृष्ण सिन्हा को चुनौती मिली अपने ही एक करीबी नेता अनुग्रह नारायण सिंह से। मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए यह जंग इसलिए भी दिलचस्प थी, क्योंकि श्रीकृष्ण सिन्हा भूमिहार थे और अनुग्रह नारायण राजपूत। खैर विधायक दल की बैठक हुई और श्रीकृष्ण सिन्हा को नेता चुन लिया गया।
बिहार में श्रीकृष्ण सिन्हा का घर
श्रीकृष्ण सिन्हा की कहानी में एक अहम पड़ाव है 1957 का चुनाव। दरअसल, कांग्रेस ने यह चुनाव श्रीकृष्ण सिन्हा के नेतृत्व में ही लड़ा था। बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस ने 318 में से 210 सीटें जरूर हासिल कर लीं, लेकिन जातीय स्तर की राजनीति अंदर ही अंदर कांग्रेस में घर कर चुकी थी। ऐसे में श्रीकृष्ण सिन्हा के फिर मुख्यमंत्री बनने के रास्ते में अवरोध लग गए। फैसला हुआ कि अगले मुख्यमंत्री का फैसला विधायक दल करेगा। श्रीकृष्ण सिन्हा को चुनौती मिली अपने ही एक करीबी नेता अनुग्रह नारायण सिंह से। मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए यह जंग इसलिए भी दिलचस्प थी, क्योंकि श्रीकृष्ण सिन्हा भूमिहार थे और अनुग्रह नारायण राजपूत। खैर विधायक दल की बैठक हुई और श्रीकृष्ण सिन्हा को नेता चुन लिया गया।
बिहार में श्रीकृष्ण सिन्हा का घर
इस घटना के बाद सिन्हा के समर्थकों ने उन्हें गाजे-बाजे के साथ घर तक पहुंचाया। इस हुजूम से अनुग्रह नारायण का खेमा गायब रहा। हालांकि, कुछ देर बाद जब श्रीकृष्ण सिन्हा अपने घर पहुंचकर जश्न से जुड़े, उसी दौरान एक तेज रफ्तार गाड़ी भी उनके घर के दरवाजे पर आकर रुकी। सिन्हा खुद घर से बाहर आकर इस गाड़ी को रिसीव करने पहुंचे। गाड़ी में सवार थे खुद अनुग्रह नारायण सिंह। जब वे गाड़ी से उतरे तो माहौल भावुक हो गया। अनुग्रह ने श्रीकृष्ण को चुनौती देने पर उनसे माफी मांगी और गले लगकर रोने लगे। इस पर सीएम के भी आंसू छलक आए।
सुरक्षाकर्मियों को छोड़ देते थे बाहर
बिहार के बुजुर्ग लोग बताते हैं कि श्री बाबू जब सीएम थे तो कई बार अपने गांव भी जाते थे। उस वक्त वह अपने सुरक्षाकर्मियों को गांव के बाहर ही छोड़ देते थे। वह कहते थे कि यह मेरा गांव है। यहां मुझे कोई खतरा नहीं।
मोरारजी देसाई के साथ श्रीकृष्ण सिन्हा।
बिहार के बुजुर्ग लोग बताते हैं कि श्री बाबू जब सीएम थे तो कई बार अपने गांव भी जाते थे। उस वक्त वह अपने सुरक्षाकर्मियों को गांव के बाहर ही छोड़ देते थे। वह कहते थे कि यह मेरा गांव है। यहां मुझे कोई खतरा नहीं।
मोरारजी देसाई के साथ श्रीकृष्ण सिन्हा।
निधन के बाद जब तिजोरी खुली तो सन्न रह गए लोग
श्रीकृष्ण सिन्हा की एक और विरासत पर हमेशा चर्चा होती रहती है। बताया जाता है कि 31 जनवरी 1961 को जब उनका निधन हुआ तो तीन लोगों की मौजूदगी में उनकी तिजोरी खोली गई। यह लोग थे- बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री दीपनारायण सिंह, जयप्रकाश और श्रीबाबू के मुख्य सचिव मजूमदार। गिनने पर अलग-अलग लिफाफों में कुल 24,500 रुपए और एक चिट्ठी मिली। इसमें 20 हजार रुपये प्रदेश कांग्रेस कमेटी के लिए चिह्नित थे। इसके अलावा तीन हजार रुपये उनके दोस्त शाह उजेर मुनीमी के परिवार को मिले, जो आर्थिक संकट से जूझ रहे थे। इसके अलावा एक हजार रुपये महेश प्रसाद सिन्हा की बेटी की शादी के लिए भेंट के तौर पर छोड़े गए थे। बाकी बचे 500 रुपए उन्होंने अपने नौकर के लिए संभाल कर रखे थे।
श्रीकृष्ण सिन्हा की एक और विरासत पर हमेशा चर्चा होती रहती है। बताया जाता है कि 31 जनवरी 1961 को जब उनका निधन हुआ तो तीन लोगों की मौजूदगी में उनकी तिजोरी खोली गई। यह लोग थे- बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री दीपनारायण सिंह, जयप्रकाश और श्रीबाबू के मुख्य सचिव मजूमदार। गिनने पर अलग-अलग लिफाफों में कुल 24,500 रुपए और एक चिट्ठी मिली। इसमें 20 हजार रुपये प्रदेश कांग्रेस कमेटी के लिए चिह्नित थे। इसके अलावा तीन हजार रुपये उनके दोस्त शाह उजेर मुनीमी के परिवार को मिले, जो आर्थिक संकट से जूझ रहे थे। इसके अलावा एक हजार रुपये महेश प्रसाद सिन्हा की बेटी की शादी के लिए भेंट के तौर पर छोड़े गए थे। बाकी बचे 500 रुपए उन्होंने अपने नौकर के लिए संभाल कर रखे थे।