MP Election: आदिवासी बेल्ट में हार-जीत तय करने वाला जयस फैक्टर कैसे इस चुनाव में हुआ गायब, किसे मिलेगा फायदा?
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अब वोटिंग में चंद घंटे बाकी हैं, लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में मालवा-निमाड़ के आदिवासी क्षेत्रों में प्रभावी भूमिका निभाने वाले जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन (जयस) इस चुनाव में कहीं नज़र नहीं आया। बिखराव से कमजोर हुआ यह संगठन अब कई धड़ो में बंट गया है। डा. हीरालाल अलावा, लोकेश मुजाल्दा, विक्रम अछालिया व कमलेश्वर डोडियार अलग-अलग गुट का नेतृत्व कर रहे हैं। तीनों ही गुट तीन अलग अलग राजनीतिक दलों के साथ जुड़ गए हैं। कोई भाजपा का समर्थन कर रहा है, कोई कांग्रेस तो कोई आम आदमी पार्टी के साथ चुनावी मैदान में है।
दरअसल, जयस संग़ठन ने 2018 के चुनाव में बेहद प्रभावी तरीके से चुनाव लड़ा था। जयस ने आदिवासी इलाकों में पांचवीं अनुसूची का मुद्दा उठाकर आदिवासियों को प्रभावित करने का काम किया था। इसके अलावा आदिवासी संस्कृति की सुरक्षा और संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने का अधिकार देने की बात पूरे चुनाव में दोहराई थी। लेकिन यह मुद्दा पेसा का नियम लागू होने के बाद खत्म हो गया। इसमें स्थानीय स्तर पर वनोपज संग्रहण, विपणन सहित अन्य निर्णय लेने का अधिकार ग्राम सभाओं को दिया गया है।
राज्य की शिवराज सरकार ने इसे खूब प्रचारित भी किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्वयं आदिवासी क्षेत्रों में पेसा चौपाल लगाई, जिससे न केवल शिवराज सिंह चौहान को फायदा मिला, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले बढ़त भी मिली। आदिवासियों का झुकाव भी कांग्रेस की तरफ से भाजपा की तरफ शिफ्ट हुआ।
2018 के चुनाव के बाद से ही गुटों में बंटा जयस पूरे समय इसी बात में लगा रहा कि आदिवासी समाज को बता पाए कि जयस एक है। भीतर ही भीतर सभी नेता इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि विभिन्न गुटों कैसे भी एका हो जाए। जयस वर्ष 2013 में मध्यप्रदेश में सक्रिय हुआ। तब विक्रम अछालिया और डा. अलावा ही इसमें शामिल थे। बाद में डा. अलावा कांग्रेस में चले गए और जयस के सुप्रीमो होने का दावा करने लगे। दरअसल, पिछले चुनाव में डा. अलावा ने खुलकर कांग्रेस की मदद की थी। वे कांग्रेस के टिकट पर विधायक भी बन गए। इसके बाद से ही संग़ठन में दोफाड़ देखने को मिली थी।
पिछली बार जयस के सहयोग के कारण भाजपा को आदिवासी सीटों में 16 सीटों का नुकसान हुआ था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं। अलग गुटों के कारण संगठन की पकड़ कमजोर हो गई है। कई संग़ठन के नेता या तो कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं, या फिर भाजपा का। इसके अलावा कुछ नेता आम आदमी पार्टी के बैनर तले चुनाव मैदान में हैं। जबकि कुछ क्षेत्रों में जयस ने अपने उम्मीदवार भी खड़े किए हैं, हालांकि इनकी जीत की उम्मीद कम ही नजर आ रही है। जयस की राजनीतिक महत्वाकांक्षा उजागर होने से आदिवासी समाज ने भी उनसे दूरी बना ली है।