Karnataka: कर्नाटक में हार गए सरकार गिराने वाले ज्यादातर दलबदलू नेता, जनता ने दोबारा नहीं पहुंचने दिया असेंबली
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
कर्नाटक में पिछले चुनावों में जेडीएस और कांग्रेस की सरकार को गिरा कर भाजपा के साथ आने वाले दलबदलू नेताओं को कर्नाटक की जनता ने इस बार नकार दिया। पिछले चुनावों में भाजपा में शामिल हुए जेडीएस और कांग्रेस के नेताओं में से 14 लोगों को इस बार भाजपा ने दोबारा टिकट देकर मैदान में उतारा था। इनमें से नौ विधायकों को कर्नाटक की जनता की नाराजगी झेलनी पड़ी और यह सभी नेता जिसमें कुछ मंत्री भी थे चुनाव हार गए। हालांकि दलबदल कर भाजपा में शामिल हुए पांच नेताओं को दोबारा उनकी जनता ने विधानसभा भेजा है।
यह वीडियो देखें: डीके शिवकुमार को सुप्रीम कोर्ट से मिली बड़ी राहत
2018 में कर्नाटक में जेडीएस और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बनाई थी। लेकिन सियासी उथल-पुथल में कांग्रेस के 13 और जेडीएस के तीन विधायकों ने इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ा और चुनाव जीतकर भाजपा में शामिल हुए। पांच साल बाद 2023 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस और जेडीएस का दामन छोड़कर भाजपा में शामिल हुए विधायकों में कइयों को मंत्री बनाया गया और सब को टिकट दिया गया। स्थानीय जनता ने ऐसे दलबदलू नेताओं को दोबारा विधानसभा जाने का जनादेश ही नहीं दिया। जानकारी के पाला बदलने वाले रोशन बेग और एएच विश्वनाथ ने इस बार का चुनाव ही नहीं लड़ा था। ऐसे में 14 दलबदलू नेता इस बार के विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने के लिए सियासी मैदान में उतरे थे। इनमें पांच नेता ही चुनाव जीत सके। चुनाव जीतने वालों में चार विधायक तो सिर्फ बैंगलोर के ही अलग-अलग क्षेत्रों से आते हैं।
कर्नाटक में दलबदलू नेताओं में हारने वालों में प्रताप गौड़ा पाटिल चुनाव हार गए। प्रताप गौड़ा को भाजपा ने मस्की विधानसभा क्षेत्र से चुनावी मैदान में उतारा था। उन्हें कांग्रेस के ही बसनगौड़ा ने हराया। इसी तरह कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर के सुधाकरण को कांग्रेस के उम्मीदवार प्रदीप ईश्वरन ने सियासी मैदान में पटखनी दे दी। कर्नाटक की होसकोटे विधानसभा सीट से एमटीवी नागराज भी पिछली सरकार में इस्तीफा देकर भाजपा से दोबारा विधायक बने थे। लेकिन इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार शरथ कुमार बेचेगौड़ा से चुनाव हार गए। कर्नाटक के हिरेकेरूर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के यू बसनवप्पा बनाकर ने अपनी ही पार्टी के दलबदलू नेता बीसी पाटील को चुनाव हरा दिया। इसी तरह कभी कांग्रेस में रहे श्रीमंत पाटिल को कांग्रेस के ही अलगोड़ा कागे ने इस विधानसभा के चुनाव में हरा दिया। कर्नाटक की अथानी सीट पर भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए लक्ष्मण साबरी ने महेश कुमाथली को चुनाव हरा दिया। 2017 के विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी का दामन छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए केसी नारायण गौड़ा और आर शंकर भी चुनाव हार गए। इसी तरह कल बदलने वालों में आनंद सिंह ने अपने बेटे सिद्धार्थ सिंह को सियासी मैदान में उतारा था। लेकिन वह भी इस बार चुनाव हार गए।
हालांकि जिन पांच विधायकों ने पिछली बार पाला बदलने के बाद भी इस बार चुनावी मैदान में जीत हासिल की है, उनमें से चार विधायक तो बेंगलुरु के अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से ही हैं। इनमें से शिवराज हेववार, एसटी सोमशेखर, एन मुनिरत्ना और के गोपालैया समेत बिराती बसवराज चुनाव जीते हैं। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार एनके लक्ष्मण कहते हैं कि दल बदल कर पिछली सरकार गिराने वाले नेताओं को पब्लिक ने नकार दिया। हालांकि जो विधायक चुनाव जीतकर दोबारा सदन में पहुंचे हैं उन्हें लेकर लक्ष्मण का कहना है कि उनकी यह जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से ही हुई है। वह कहते हैं कि दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक में सबसे बड़े रोड शो किए। मोदी के रोड शो के मैजिक का ही असर है कि दोबारा विधानसभा पहुंचे हैं। हालांकि जो विधायक दोबारा चुनाव जीतकर पहुंचे हैं, वह बहुत कम मार्जिन से ही चुनाव जीते हैं।
यह भी पढ़ें: Karnataka: सिद्धारमैया को ही कांग्रेस क्यों बनाना चाहती है CM, डीके शिवकुमार कैसे छूट रहे पीछे? पांच बड़े कारण
कर्नाटक में स्थानीय मतदान के लिए लोगों को जागरूक करने वाली एनसी गौड़ा मतदान जागरूकता समिति से जुड़े एस नागराज पल्ली कहते हैं कि वह और उनकी पूरी टीम इस बात को लेकर पूरे राज्य में विरोध कर रही थी कि दल बदलू नेताओं को दोबारा विधानसभा नहीं पहुंचने देना है। नागराज कहते हैं कि इसके लिए उनकी टीम ने किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन तो नहीं किया था, लेकिन वह लोगों को यह संदेश जरूर देना चाहते थे कि नेता सत्ता के लिए ही दल बदलते हैं। वह कहते हैं कि दल बदल कर चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेकर विधानसभा पहुंचे नेताओं की संवैधानिक और कानूनी तरह से तो सवाल नहीं रहे हैं। लेकिन उनकी राजनीतिक मंशा पर बड़ा सवालिया निशान पिछले चुनाव में ही उठ गया था। वह कहते हैं कि बड़ी वजह रही कि इस बार के विधानसभा चुनाव में जनता ने ऐसे पाला बदल नेताओं को विधानसभा पहुंचने से ही रोक दिया।