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Glacier: आर्कटिक ग्लेशियर से हर साल दो हजार टन से अधिक मीथेन उत्सर्जन, जलवायु परिवर्तन पर पड़ेगा असर

Sat, 15 Jul 2023 05:46 AM IST
जलज मिश्रा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: जलज मिश्रा Updated Sat, 15 Jul 2023 05:46 AM IST
सार

शोध में ग्लेशियरों के पिघलने, भूजल से मीथेन गैस रिसने तथा इसके बड़े भंडार का पता लगाया गया है। शोध से पता चलता है कि आर्कटिक ग्लेशियरों के पीछे हटने और अधिक झरनों के बनने से मीथेन उत्सर्जन के बढ़ने के आसार हैं।

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More than two thousand tons of methane emissions every year from Arctic glacier will affect climate change
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Social Media

विस्तार

नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित नए शोध से पता चला है कि गर्म होते आर्कटिक के ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। बुदबुदाते भूजल से शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस मीथेन निकल रही है। स्वालबार्ड में ग्लेशियरों के पिघलने से हर साल 2,000 टन से अधिक मीथेन का उत्सर्जन हो रहा है। यह नॉर्वे के सालभर में तेल और गैस ऊर्जा उद्योग से उत्पन्न मीथेन उत्सर्जन के करीब 10% के बराबर है। यह शोध कैंब्रिज विवि और नॉर्वे में स्वालबार्ड विवि के शोधकर्ताओं की अगुवाई में किया गया है।

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शोध में ग्लेशियरों के पिघलने, भूजल से मीथेन गैस रिसने तथा इसके बड़े भंडार का पता लगाया गया है। शोध से पता चलता है कि आर्कटिक ग्लेशियरों के पीछे हटने और अधिक झरनों के बनने से मीथेन उत्सर्जन के बढ़ने के आसार हैं। इस तरह के स्रोत आर्कटिक में बर्फ पिघलने और जमी हुई जमीन से होने वाले अन्य मीथेन उत्सर्जन के कारण ग्लोबल वार्मिंग बढ़ सकती है। प्रकृति का संतुलन बिगाड़ने में भी इसका बड़ा योगदान है। शोध के अनुसार ये स्रोत मीथेन उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत हैं जिन्हें अब तक वैश्विक अनुमानों में शामिल नहीं किया है। वैज्ञानिक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि आर्कटिक के पिघलने से निकलने वाली अतिरिक्त मीथेन मानवजनित ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा सकती है। शोधकर्ताओं ने स्वालबार्ड में सौ से अधिक झरनों के जल रसायन की लगभग तीन साल तक निगरानी की, जहां हवा का तापमान आर्कटिक के औसत से दो गुना तेजी से बढ़ रहा है।

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झरनों को पहचानना नहीं होता आसान
शोधकर्ताओं द्वारा पहचाने गए मीथेन निकलने वाले झरनों को अधिकांश ग्लेशियरों के नीचे छिपी एक पाइपलाइन प्रणाली द्वारा पाला जाता है, जो इसे अंदर के तलछट और आसपास के आधार के भीतर बड़े भूजल भंडार में प्रवेश करता है। एक बार जब ग्लेशियर पिघलते हैं और पीछे हटते हैं तो झरने बनते हैं, जहां यह भूजल नेटवर्क सतह तक पहुंच जाता है। ग्लेशियरों के पिघलने से बने झरनों को पहचानना हमेशा आसान नहीं होता, इसलिए शोधकर्ताओं ने उन्हें पहचानने के लिए उपग्रह चित्रों की मदद ली।

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शेल और कोयले जैसी चट्टानों में होती हैं प्राकृतिक गैसें
अध्ययन में पता चला कि शेल और कोयले जैसी कुछ चट्टानों में मीथेन सहित प्राकृतिक गैसें होती हैं, जो चट्टानों के निर्माण के दौरान कार्बनिक पदार्थों के टूटने से उत्पन्न होती हैं। यह मीथेन चट्टान में दरार के माध्यम से और भूजल में ऊपर की ओर बढ़ सकती है। शोधकर्ताओं ने स्वालबार्ड में ग्लेशियर पिघलने से उत्पन्न जटिल और व्यापक प्रतिक्रियाओं को समझना शुरू किया है। मापे गए झरनों से निकलने वाली मीथेन की मात्रा इन ग्लेशियरों के नीचे फंसी हुई गैस की कुल मात्रा से कम हो जाएगी, जो बाहर निकलने की प्रतीक्षा कर रही है। इसका मतलब है कि हमें तत्काल वृद्धि के खतरे को स्थापित करने की आवश्यकता है।

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