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Hindi News ›   India News ›   Mizoram People's Forum is ahead of Election Commission to follow the Code of Conduct

आचार संहिता का पालन करवाने में चुनाव आयोग से आगे मिजोरम पीपुल्स फोरम

Mon, 19 Nov 2018 03:23 AM IST
रीता तिवारी, आइजल
रीता तिवारी, आइजल Updated Mon, 19 Nov 2018 03:23 AM IST
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Mizoram People's Forum is ahead of Election Commission to follow the Code of Conduct

मिजोरम में चुनाव मैदान में उतरने वाले तमाम दल, चाहे वे क्षेत्रीय हों या राष्ट्रीय, आदर्श चुनावी संहिता का अक्षरश: पालन करते हैं। इसका श्रेय चुनाव आयोग को नहीं, बल्कि चर्च की ओर से प्रायोजित मिजोरम पीपुल्स फोरम (एमपीएफ) को जाता है। 

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एमपीएफ यहां चुनाव आयोग से भी ज्यादा असरदार और ताकतवर है। यह कहना ज्यादा सही होगा कि आचार संहिता के मामले में उसकी ओर से तय दिशा-निर्देश पत्थर की लकीर साबित होते हैं। इस बार भी तस्वीर अलग नहीं है।

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इस महीने की 28 तारीख को विधानसभा की 40 सीटों के लिए होने वाले चुनाव की खातिर राज्य में प्रचार धीरे-धीरे जोर पकड़ रहा है। लेकिन ऐसी हर चुनावी रैली में एमपीएफ का प्रतिनिधि मौजूद रहता है। वर्ष 2008 और 2013 के चुनावों में तो एमपीएफ ने हर इलाके में प्रचार के लिए एक साझा मंच बना दिया था। 

इलाके की हर पार्टी उसी मंच से नियत समय पर अपना प्रचार या रैली करती थी। तब उम्मीदवारों के घर-घर जाकर प्रचार करने पर पाबंदी थी। इस बार एमपीएफ ने इसमें ढील देते घर-घर प्रचार की अनुमति दी है।

एमपीएफ के दिशा-निर्देशों की वजह से ही राजधानी आइजल समेत राज्य के किसी हिस्से में ज्यादा पोस्टर, बैनर नजर नहीं आते। इसी तरह देश के दूसरे हिस्सों की तरह लाउडस्पीकरों के जरिए प्रचार का नजारा भी यहां दुर्लभ है। वैसे, हमेशा ऐसा नहीं था। 

मिजोरम को राज्य का दर्जा मिलने के बाद शुरुआती दौर में अमूमन तमाम उम्मीदवार अपने-अपने इलाकों में सामुदायिक भोज आयोजित करते थे। यह माना जाता था कि जिसने जिस उम्मीदवार का खाना खाया वह उसी को वोट देगा। उस दौरान वोटरों में पैसे बांटने की भी परंपरा थी, लेकिन राज्य के ताकतवर संगठन यंग मिजो एसोसिएशन ने 90 के दशक में इस पर रोक लगा दी थी।

संगठन ने हर बार की तरह अबकी भी राजनीतिक दलों  और उम्मीदवारों के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं। और उनका असर साफ नजर आता है। पैसों और बाहुबल के सहारे चुनाव लड़ना देश के बाकी राज्यों में जहां जीत की गारंटी है, वहीं यहां यह उम्मीदवारों की हार की वजह बन सकता है। 

एक राजनीतिक विश्लेषक वानलालुरेट कहते हैं कि यहां चुनावी मौहाल देश के दूसरे हिस्सों से अलग होता है। राजधानी आइजल में भी ज्यादा शोरगुल नहीं दिखाई देता। यह एमपीएफ के दिशा-निर्देशों का ही असर है।

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