CAPF: संसद में दावा- सीएपीएफ को दे रहे बेहतर कार्य का माहौल, दूसरी तरफ पदोन्नति के लिए कोर्ट जा रहे कार्मिक
गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने इन सवालों का जवाब भी दिया। उन्होंने बताया कि सीएपीएफ में संसाधनों की कोई कमी नहीं है। ये बल अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप नियमित आधार पर आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित किए जा रहे हैं। दूसरी ओर, इन केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कार्मिक, अपनी पदोन्नति व कल्याण के लिए कोर्ट में जाने पर मजबूर हैं।
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संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा सदस्य कीर्ति आजाद ने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों 'सीएपीएफ' में संसाधनों की कमी को लेकर तीन सवाल पूछे थे। क्या उक्त बलों के कर्मी, कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं, जिससे उनकी कार्यकुशलता प्रभावित हो रही है। बलों की स्थिति में सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने इन सवालों का जवाब भी दिया। उन्होंने बताया कि सीएपीएफ में संसाधनों की कोई कमी नहीं है। ये बल अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप नियमित आधार पर आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित किए जा रहे हैं। दूसरी ओर, इन केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कार्मिक, अपनी पदोन्नति व कल्याण के लिए कोर्ट में जाने पर मजबूर हैं। इतना ही नहीं, जब ये कार्मिक, हाईकोर्ट में अपने हकों की लड़ाई जीत जाते हैं तो सरकार उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चली जाती है।
सांसद कीर्ति आजाद का पहला सवाल था कि क्या बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी आदि जैसे केंद्रीय सशस्त्र बल, आवश्यक संसाधनों और आधुनिक उपकरणों की कमी का सामना कर रहे हैं। दूसरा सवाल, क्या उक्त बलों के कार्मिक, कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं, जिससे उनकी कार्यकुशलता प्रभावित हो रही है। तीसरा सवाल, यदि हां तो सरकार द्वारा केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की स्थिति में सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए हैं और इसकी वर्तमान स्थिति क्या है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने उक्त सवालों के जवाब में बताया कि सीएपीएफ में संसाधनों की कमी नहीं है। सीएपीएफ यानी असम राइफल्स, बीएसएफ, सीआरपीएफ, एसएसबी, आईटीबीपी, सीआईएसएफ और एनएसजी, ये बल आवश्यक संसाधनों व आधुनिक उपकरणों की कमी का सामना नहीं कर रहे हैं। मंत्रालय के अनुसार, ये बल अपनी जरुरतों के अनुरूप नियमित आधार पर आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित किए जा रहे हैं।
सीएपीएफ कर्मियों को अत्यधिक ऊंचाई, पहाड़ी क्षेत्रों, घने जंगलों और खराब मौसम वाले दूरदराज के इलाकों में बॉर्डर की हिफाजत, आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियानों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा जैसे अत्यंत चुनौतीपूर्ण एवं दुर्गम वातावरण में तैनात किया जाता है। इन चुनौतियों के बावजूद, केंद्र सरकार विभिन्न उपायों के माध्यम से सीएपीएफ कर्मियों की दक्षता बढ़ाने का लगातार प्रयास कर रही है।
सरकार द्वारा जवानों के कल्याण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। जवानों को उनकी तैनाती के स्थान के मुताबिक, पर्याप्त नवीनतम तकनीकी उपकरण, विशेष कपड़े और खाद्य पदार्थ, आवासीय क्वार्टर और बैरक प्रदान किए जाते हैं। इससे उनके आवास की संतुष्टि में सुधार होता है। कार्मिकों को अधिक कुशलता से काम करने में मदद मिलती है। जवानों को बेहतर कार्य परिस्थितियां प्रदान करने के लिए कई सकारात्मक उपाय किए गए हैं। जवानों के मानसिक स्वास्थ्य की नियमित निगरानी की जा रही है। उनकी शिकायतों का शीघ्र निवारण करने का प्रयास हो रहा है। किसी भी तरह की आपातकालीन स्थिति में कार्मिकों की तत्काल निकासी के लिए हेलिकॉप्टरों की व्यवस्था की गई है।
तनाव कम करने और वित्तीय/अन्य सहायता प्रदान करने के लिए भी कई तरह की पहल की गई हैं। छुट्टी से लौटने या स्थानांतरण पर कंपनी कमांडर/यूनिट कमांडेंट द्वारा अनिवार्य साक्षात्कार और परामर्श, यह व्यवस्था प्रारंभ की गई है। फील्ड अधिकारियों द्वारा कर्मियों की गतिविधियों और मानसिक स्वास्थ्य पर कड़ी निगरानी की जा रही है। अधिकारियों द्वारा जवानों के साथ अनौपचारिक बातचीत, खेलों में भागीदारी और उनके परिवार के कल्याण के बारे में विशेष पूछताछ की जाती है। कर्मियों को अपनी समस्याओं को बताने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। जवानों की मनोरंजक गतिविधियों का ध्यान रखा जा रहा है। इसके लिए बुनियादी प्लेटफार्म सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है। सरकार द्वारा कार्मिकों को विभिन्न आकर्षक भत्ते भी प्रदान किए जाते हैं। इन भत्तों में जोखिम एवं कठिनाई भत्ता, अतिरिक्त मुफ्त रेलवे वारंट/छुट्टी यात्रा रियायत, कश्मीर घाटी में तैनात कर्मियों के लिए वाई श्रेणी शहर (16%) की दर से अतिरिक्त मकान किराया भत्ता, जेएंडके में तैनात गैर-पात्र कर्मियों को हवाई यात्रा की सुविधा देना शामिल है।
इसके अलावा, ड्रेस भत्ता, अधिकारी रैंक से नीचे के कर्मियों के आवास के लिए मुआवजे का प्रावधान, समग्र कार्मिक रखरखाव भत्ता और शिक्षा रियायतें भी दी जाती हैं। सीएपीएफ के लिए 'आधुनिकीकरण योजना-IV' नामक एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना (कार्यान्वयन अवधि 01.01.2022 से 31.03.2026) भी कार्यान्वित की जा रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य हथियारों, संचार, सुरक्षात्मक गियर, निगरानी एवं सीमा सुरक्षा प्रणाली, प्रशिक्षण सामग्री, बख्तरबंद वाहनों और विशेष परिवहन वाहनों के मामले में नवीनतम एवं अत्याधुनिक उपकरणों को शामिल करके प्रत्येक केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की दक्षता और प्रदर्शन में सुधार करना है।
दूसरी तरफ केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में जवानों और अफसरों को अदालतों में अपनी पदोन्नति एवं हितों की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। इन बलों के कार्मिकों ने 'पुरानी पेंशन बहाली' और कैडर अधिकारियों की पदोन्नति, संगठित सेवा का दर्जा (ओजीएएस), नए सर्विस रूल्स एवं वित्तीय हितों को लेकर अदालती लड़ाई जीती है, लेकिन केंद्र सरकार ने इन्हें उक्त फायदे नहीं दिए। दिल्ली हाईकोर्ट ने इन बलों में ओपीएस लागू करने का फैसला सुनाया तो उसके खिलाफ केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट में चली गई। सीएपीएफ कैडर अधिकारियों की पदोन्नति, संगठित सेवा का दर्जा, नए सर्विस रूल्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया था, उस पर केंद्र सरकार रिव्यू पेटिशन में चली गई है।
इनके अलावा सीएपीएफ में ऐसे ही कई दूसरे मुद्दे भी हैं, जो अदालत तक पहुंचे हैं।
पहचान एवं पदोन्नति के मामले, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। सीएपीएफ में कई मामले भी रहे हैं, जो कोर्ट की अवमानना के लिए दायर किए गए हैं। सीआरपीएफ को अलविदा कह चुके सहायक कमांडेंट सर्वेश त्रिपाठी के मुताबिक, सीएपीएफ में सीधे नियुक्त राजपत्रित अधिकारियों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बात केवल पदोन्नति या दूसरे आर्थिक फायदों की नहीं है। यहां तो 'पहचान' के लिए लड़ना पड़ रहा है। इन बलों में मेडिकल कैडर, मिनिस्ट्रियल और यहां तक की वेटनरी डॉक्टर को भी समय पर पदोन्नति मिल जाती है, मगर एग्जीक्यूटिव कैडर के साथ हर मामले में भेदभाव होता है। सीआरपीएफ के एमटेक, बीटेक, आईआईटी व दूसरी डिग्री हासिल किए अधिकारियों को तय समय पर पदोन्नति से वंचित रखा जा रहा है। पॉलिसी के मोर्चे पर सरकार के निर्णय ठीक नहीं है। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने संगठित सेवा 'ओजीएएस' देने का आदेश दिया।
तत्कालीन केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने यह घोषणा करने के लिए बाकायदा प्रेसवार्ता की थी। केंद्रीय कैबिनेट ने नोटिफाई किया, लेकिन उसे लागू नहीं किया गया। जब ये फैसला लागू नहीं हुआ तो नए सर्विस रुल भी नहीं बने। ऐसे में एग्जीक्यूटिव कैडर को समयबद्ध पदोन्नति कैसे मिल सकती है। कैडर अफसरों ने दोबारा से सर्वोच्च अदालत में पदोन्नति की लड़ाई लड़ी और जीती। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में कैडर अधिकारियों की पदोन्नति, संगठित सेवा का दर्जा, नए सर्विस रूल्स एवं वित्तीय हितों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 को एक अहम फैसला सुनाया था, उस पर केंद्र सरकार गत सप्ताह रिव्यू पेटिशन में चली गई है। इसे सीएपीएफ के 13000 कैडर अधिकारियों को एक बड़ा झटका लगा है।
केंद्र सरकार के इस कदम से परेशान होकर सीएपीएफ के एक अधिकारी ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को खुला पत्र लिखा। इसमें सीएपीएफ अधिकारियों के लिए न्याय और सम्मान की गुहार लगाई गई है। पत्र में कहा गया है कि वे गंभीर अन्याय का सामना कर रहे हैं। सरकार ने हमें संगठित ग्रुप ए सेवा यानी 'ओजीएएस' का दर्जा देने से इनकार कर दिया है। सीएपीएफ के 11 लाख जवानों/अफसरों ने 2023 में 'पुरानी पेंशन' बहाली के लिए दिल्ली हाईकोर्ट से अपने हक की लड़ाई जीती थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को लागू नहीं किया। इस मामले में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से स्टे ले लिया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को 'भारत संघ के सशस्त्र बल' माना था। दूसरी तरफ केंद्र सरकार, सीएपीएफ को सिविलियन फोर्स बताती है। अदालत ने इन बलों में लागू 'एनपीएस' को स्ट्राइक डाउन करने की बात कही। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, चाहे कोई आज इन बलों में भर्ती हुआ हो, पहले कभी भर्ती हुआ हो या आने वाले समय में भर्ती होगा, सभी जवान और अधिकारी, पुरानी पेंशन स्कीम के दायरे में आएंगे। मौजूदा समय में भी यह मामला सर्वोच्च अदालत के समक्ष लंबित है।
सीएपीएफ के पूर्व अधिकारियों के मुताबिक, हर सर्विस का एक नाम होता है। संबंधित कैडर अधिकारी उससे पहचाने जाते हैं। हैरानी की बात तो ये है कि सीआरपीएफ के युवा अधिकारियों को इसके लिए भी अदालत जाना पड़ा। चूंकि ये क्लास वन अधिकारी हैं, इसलिए अपनी सेवा का एक नाम चाहते हैं। आखिर ये किस सेवा में हैं, यह पता होना चाहिए। जैसे अखिल भारतीय सेवा में रेवेन्यू सर्विस, इंजीनियरिंग सर्विस या रेलवे की कई सेवाएं, सीआरपीएफ का भी एक ऐसा ही नाम चाहते थे। इसके लिए दिल्ली हाईकोर्ट में जाना पड़ा। आरपीएफ और सीआरपीएफ का एक जैसा ही केस था। आरपीएफ को आईआरपीएफएस नाम दे दिया गया। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीआरपीएफ को नाम नहीं दिया। पुरानी पेंशन व्यवस्था भी अब खत्म हो चुकी है। करियर प्रोग्रेसन की स्थिति बहुत खराब है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी संगठित सेवा का दर्जा न मिलना और न ही एनएफएफयू को सही तरीके से लागू करना, इन सभी में सरकारी की मनमानी रही है।
एचआरए, टीए आदि के लिए न्यायालय की शरण में जाना पड़ रहा है। गौरव सिंह बनाम भारत सरकार, यह केस अदालत में पहुंचा। नॉन फंक्शनल सेलेक्शन ग्रेड (एनएफएसजी) के लिए करुणा निधान बनाम भारत सरकार, यह अवमानना का केस दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष दायर हुआ था। गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) के केस में अदालत की अवमानना, यह केस भी सुप्रीम कोर्ट में चला है। ओजीएएस यानी संगठित सेवा का मामला भी सर्वोच्च अदालत में है।
सीआरपीएफ में डॉक्टरों को तेज पदोन्नति और एग्जीक्युटिव अधिकारियों को कछुआ गति से आगे बढ़ाना, ये केस भी अदालत में पहुंचा है। सीएपीएफ के इंस्पेक्टरों का कहना है कि वित्त मंत्रालय के 2008 में जारी एक कार्यालय ज्ञापन 'ओएम' में कहा गया था कि जिन कर्मियों का 48 सौ रुपये का 'ग्रेड पे' है और उन्होंने इसमें चार साल की नौकरी कर ली है तो उनका ग्रेड पे 54 सौ रुपये हो जाएगा। यह बात केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में स्वत: ही लागू नहीं होती।
इसे लागू कराने के लिए अदालतों का सहारा लेना पड़ता है। आईटीबीपी के इंस्पेक्टर सुशील कुमार ने दिल्ली कोर्ट से यह लड़ाई जीती थी। उसके बाद बीएसएफ के लगभग सवा सौ इंस्पेक्टरों ने अदालत से अपने हक में आदेश जारी कराया। दिल्ली हाईकोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल के इंस्पेक्टरों को 54 सौ रुपये वाला 'ग्रेड पे' देने का आदेश दिया। सीआरपीएफ के इंस्पेक्टरों ने भी उक्त फायदे के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है।