म्यांमार में सेना ने सोमवार को फिर सत्ता पर कब्जा कर लिया। सेना ने देश की सर्वोच्च नेता और स्टेट काउंसलर आंग सान सू की और राष्ट्रपति विन मिंट समेत कई वरिष्ठ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। आजादी मिलने के बाद से म्यांमार पर ज्यादातर वक्त सेना का शासन रहा है। वर्ष 1962 में सेना यहां सत्ता पर काबिज हो गई थी। सेना की तानाशाही से देशवासियों को आजादी दिलाने और लोकतंत्र की बहाली के लिए आंग सान सू की 22 साल लंबी लड़ाई लड़ी थी। आइए जानते हैं कि म्यांमार में क्यों पैदा हुआ राजनीतिक संकट, कौन हैं आंग सान सू की और सेना प्रमुख जनरल मिन आंग ह्लाइंग, भारत पर क्या होगा इसका असर...
म्यांमार में फिर सेना का कब्जा: लोकतंत्र के लिए 22 साल अकेले लड़ीं सू की, जानिए भारत पर क्या पड़ेगा असर?
पहले हालत और फिर सत्ता बदली
म्यांमार की राजधानी नेपीता समेत बड़े शहरों में इंटरनेट बंद है और कुछ जगहों पर फोन सर्विस भी बंद कर दी गई है। सरकारी चैनल एमआरटीवीका टेलिकास्ट बंद हो गया है और उसने इसके लिए तकनीकी दिक्कतों का हवाला दिया है। लेकिन जब सोमवार सुबह लोग नींद से जागे, तब तक देश की कमान सेना के हाथ जा चुकी थी। सुबह लोगों को जब आधी रात को हो चुके सत्ता परिवर्तन के बारे में पता लगा, तो लोगों ने बाजारों में जाकर जमकर खरीदारी शुरू कर दी। कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया, जिन्हें चुप कराने के लिए सैनिक पहले से तैनात थे।
राजनीतिक संकट का कारण
दरअसल, पिछले साल नवंबर में हुए चुनावों में संसद के संयुक्त निचले और ऊपरी सदनों में सू की की पार्टी ने 476 सीटों में से 396 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन सेना के पास 2008 के सैन्य-मसौदा संविधान के तहत कुल सीटों का 25 फीसदी आरक्षित हैं। कई प्रमुख मंत्री पद भी सेना के लिए आरक्षित हैं। नतीजे आने के बाद वहां की सेना ने इस पर सवाल खड़े कर दिए। सेना ने चुनाव में सू की की पार्टी पर धांधली करने का आरोप लगाया है। इसे लेकर सेना ने सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और चुनाव आयोग की शिकायत भी की है।
कौन हैं आंग सान सू की?
लोकप्रिय नेता आंग सान सू की म्यांमार को आजादी दिलाने वाले जनरल आंग सान की बेटी हैं।
वर्ष 1948 में ब्रिटिश शासन से आजादी से पहले ही जनरल आंग सान की हत्या कर दी गई थी। सू की उस वक्त केवल दो साल की थीं।
दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली नेता के रूप में सू की की पहचान है।
आंग सान सू की ने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से वर्ष 1964 में स्नातक की पढ़ाई की थी।
वर्ष 1991 में नजरबंदी के दौरान ही सू की को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
वर्ष 1989 से 2010 तक लगभग 21 साल सू की नजरबंद रहीं।
वर्ष 2015 के नवंबर महीने में सू की के नेतृत्व में उनकी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ चुनाव जीत लिया।
ये म्यांमार के इतिहास में 25 साल में हुआ पहला चुनाव था। इसमें बड़ी संख्या में लोगों ने वोट किए थे।
सैन्य तानाशाही के खिलाफ 22 साल तक अकेले लड़ीं सू की
म्यांमार में सेना की तानाशाही से आजादी पाने के लिए आंग सान सू की ने वर्ष 1988 में लड़ाई शुरू की। उनके नेतृत्व में 1989 में हजारों लोग लोकतंत्र की मांग को लेकर तब की राजधानी यंगून की सड़कों पर आ गए थे। हालांकि, सेना की ताकत के आगे सू की आंदोलन कमजोर पड़ गया था और उन्हें नजरबंद कर दिया गया। अगले 22 साल तक देश की कमान सेना के हाथ ही रही। इनमें से 21 साल सू नजरबंद रहीं। आखिर में वो दिन आया, जब 2011 में देश की बागडोर सेना की जगह चुनी गई सरकार ने संभाली।
आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) ने चुनाव में जीत हासिल की। संविधान के मुताबिक, वे राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ सकती थीं। इसलिए सू की को स्टेट काउंसलर बनाया गया। संसद में सेना की मौजूदगी के लिए उसके प्रतिनिधि रखे गए।