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महबूबा को पार्टी और अलगाववादियों से मिलेगी चुनौती
राघवेंद्र नारायण मिश्र/ अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 05 Apr 2016 02:00 AM IST
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- फोटो : PTI
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जम्मू-कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के लिए राह आसान नहीं है। उन्हें पग-पग पर चुनौतियों से रूबरू होना पड़ेगा। सांसद तारिक हमीद कर्रा के महबूबा के शपथ ग्रहण समारोह से दूरी बनाने से पीडीपी का अंतर्कलह सतह पर आ गया है। वहीं, अलगाववादियों के प्रति नरम रुख रखने वाली महबूबा के लिए मुख्यमंत्री बनने के बाद पुराने स्टैंड पर कायम रहना मुश्किल होगा। ऐसे में उनको पार्टी के साथ-साथ अलगाववादियों से भी चुनौती मिलेगी।
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दरअसल, कर्रा पहले भाजपा से गठबंधन के खिलाफ थे और इस बार पार्टी के तीन दिग्गजों को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करने पर जोर दे रहे थे। महबूबा ने मुफ्ती मोहम्मद सईद के विश्वासपात्र डा. हसीब द्राबू और नईम अख्तर को मंत्रिमंडल से बाहर रखने की कर्रा की नसीहत को दरकिनार कर साहसिक निर्णय लेने की क्षमता दिखाई है लेकिन अपने लिए शुरुआत में ही विरोधी गुट भी तैयार कर लिया है। पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान सांसद मुजफ्फर हुसैन बेग फिलहाल महबूबा के साथ हैं और नई सरकार के गठन में उनकी भूमिका भी अहम रही है। लेकिन डा. हसीब द्राबू को अहमियत बेग को भी नहीं भाती है। लिहाजा विश्वास के रिश्ते में यह कांटा फिलहाल फंसा हुआ है। पुरानी प्रतिद्वंद्विता कभी भी सामने आ सकती है।
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अलगाववादियों के प्रति महबूबा का रुख पहले से नरम रहा है। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने पुराने स्टैंड पर कायम रहना उनके लिए मुश्किल होगा। जम्मू-कश्मीर में हालात अचानक बदल जाते हैं। सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में स्थानीय युवक की मौत पर हिंसक प्रदर्शन के बीच अलगाववादियों की सियासत शुरू होती है। वैसी स्थिति में अलगाववादी संगठन महबूबा के खिलाफ भी मोर्चा खोल सकते हैं। आतंकवादी गुटों को जम्मू-कश्मीर में स्थिर सरकार कभी नहीं भाती है। नतीजतन हर सरकार के गठन के बाद वे ताकत दिखाने की कोशिश करते रहे हैं।
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आतंकी संगठन अपनी मौजूदगी के सबूत देने के लिए किसी घटना को अंजाम दे सकते हैं। सुरक्षा बलों और केंद्रीय गृह मंत्रालय को इस प्रकार के इनपुट मिले हैं। लिहाजा सतर्कता बरती जाने लगी है। आतंकी हमले भी महबूबा के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं। वैसी स्थिति में भाजपा अपने स्टैंड पर कायम रहते हुए आतंकियों के विरोध में खड़ी होगी और महबूबा को गठबंधन के अंदर भी सामंजस्य बनाने की चुनौती पर खरा उतरना होगा।
महबूबा के पास प्रशासनिक अनुभव है। लिहाजा उन्हें विश्वासपात्र नौकरशाहों और पार्टी के पुराने नेताओं पर निर्भर रहना पड़ सकता है। सरकार गठन के लिए उन्होंने त्याग भी किया है। अपने कोटे के दो मंत्री घटाए और भाजपा का कोटा बढ़ा दिया। पीडीपी कोटे से अल्ताफ बुखारी, जावेद मुस्तफा मीर, मोहम्मद अशरफ मीर और अब्दुल मजीद पाडर को मंत्री पद से हटाने के बाद असंतुष्ट गुट पैदा हो सकता है। नतीजतन महबूबा को पार्टी के अंदर और सरकार दोनों मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। यह उनकी योग्यता की अग्निपरीक्षा भी होगी।