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Mayawati: मायावती का इसलिए है चुनाव आयोग की 'प्रेस कांग्रेस' से सीधा नाता! लगाए जा रहे हैं यह बड़े कयास

Fri, 15 Mar 2024 05:31 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Fri, 15 Mar 2024 05:31 PM IST
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सार
सियासी गलियारों में चर्चाएं इस बात की हो रही हैं कि मायावती भले ही आगामी लोकसभा चुनाव में अकेले सियासी मैदान में उतरने वाली हैं, लेकिन हकीकत में अंदरूनी तौर पर कुछ और ही सियासी हलचल चल रही है। दरअसल एक चर्चा इस बात की भी हो रही है कि बसपा अधिसूचना जारी होने के बाद कोई बड़ा सियासी कदम उठा सकती है।...
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Mayawati: BSP can take some big political step after the press conference of Election Commission
Lok Sabha Election: Mayawati - फोटो : Amar Ujala/ Rahul Bisht

विस्तार

चुनाव आयोग शनिवार को देश में लोकसभा चुनाव की तारीखों का एलान करेगा। इसलिए सियासी नजरिए से शनिवार को देश के सभी बड़े राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम लोगों की भी निगाहें लगी हुईं हैं। लेकिन इस बीच राजनीतिक गलियारों में सियासी गठबंधन की नई गुणा गणित पर भी लोगों की निगाहें हैं। राजनीतिक गलियारों में कहा जा रहा है कि शनिवार को होने वाली चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बसपा कोई बड़ा सियासी कदम उठा सकती है। इस कदम को विपक्षी दलों के बड़े गठबंधन समूह I.N.D.I.A के साथ जोड़कर देखा जा रहा है।

सियासी गलियारों में चर्चाएं इस बात की हो रही हैं कि मायावती भले ही आगामी लोकसभा चुनाव में अकेले सियासी मैदान में उतरने वाली हैं, लेकिन हकीकत में अंदरूनी तौर पर कुछ और ही सियासी हलचल चल रही है। दरअसल एक चर्चा इस बात की भी हो रही है कि बसपा अधिसूचना जारी होने के बाद कोई बड़ा सियासी कदम उठा सकती है। ऐसे में शनिवार को होने वाली चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बसपा के आगामी राजनीतिक कदम पर चर्चाएं होने लगी हैं।

हालांकि गठबंधन की तमाम संभावनाओं को लेकर मायावती ने पहले ही इसे सिरे से खारिज कर दिया है। लेकिन मायावती के इस बयान के बाद भी सियासी गलियारों में गठबंधन की संभावनाओं को हवा मिल रही है। राजनीतिक जानकार ओपी मिश्रा कहते हैं कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने अगर सियासी गठबंधन को संभावनाओं को खारिज किया है, तो इसे खारिज ही माना जाना चाहिए। बात जब सियासी संभावनाओं की होती है, तो तमाम समीकरण देखे जाते हैं। ओपी मिश्रा कहते हैं कि अगर सपा, बसपा और कांग्रेस गठबंधन के साथ सियासी मैदान में उतरती है, तो निश्चित तौर पर एक साथ कई समीकरणों को साधा जा सकता है। इसमें जातीयता का समीकरण भी प्रमुखता से शामिल है। उनका मानना है कि संभवतः सियासी गलियारों में ऐसे सियासी और जातीयता के समीकरण के आधार पर गठबंधन के मायने निकाले जा रहे होंगे।

वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी रह-रह कर उठ रहा है कि आखिर मायावती के चुनाव की अधिसूचना के बाद गठबंधन की चर्चाएं क्यों हो रही हैं। सियासी जानकार बताते हैं कि जिस तरीके से सत्ता पक्ष के दबाव की एक कहानी मायावती की बसपा को लेकर कही जा रही है, संभवत अधिसूचना के बाद उसका असर नहीं होगा। यही वजह है कि अधिसूचना के बाद गठबंधन की चर्चा हो रही है। वहीं सूत्रों की मानें तो मायावती की प्रियंका गांधी से टेलीफोन पर बातचीत भी हुई थी। उस दौरान सियासी गलियारों में यह कयास तेजी से लगाए जाने लगे थे कि जल्द ही बसपा और कांग्रेस का समझौता हो सकता है। कहा तो यह तक गया था कि कांग्रेस पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर मायावती को आगे किए जाने की सिफारिश भी की जा सकती है। हालांकि चर्चाओं के बाद मायावती ने सोशल मीडिया पर आकर गठबंधन की चर्चाओं को महज अफवाह करार दिया था।

क्योंकि अब शनिवार को लोकसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा के साथ ही अधिसूचना जारी हो जाएगी। उसके बाद एक बार फिर से गठबंधन को लेकर शुरुआत किए जाने की बात कही जा रही है। सियासी जानकारों का कहना है कि वह बसपा जो लोकसभा चुनावों से पहले ही प्रत्याशियों की घोषणा कर देती थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है। अगर यही तय है कि उत्तर प्रदेश में मायावती बगैर किसी समझौते के मायावती सियासी मैदान में उतरने जा रही है, उनके गिनती के ही प्रत्याशी मैदान में उतरे हैं। इस आधार पर भी इन संभावनाओं को हवा मिल जाती है कि आखिर जब सपा ने अपने ठीकठाक प्रत्याशी उतार दिए हैं, भाजपा ने भी पचास से ज्यादा प्रत्याशी मैदान में उतार दिए, तो आखिर सभी अस्सी सीटों पर लड़ने का दावा करने वाली मायावती ने दस प्रत्याशी भी मैदान में क्यों नहीं उतारे।

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