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पैकेज था सूखे का, बन गई मंडियां और गोदाम

Sat, 23 Apr 2016 02:15 PM IST
समीरात्मज मिश्र/ बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
समीरात्मज मिश्र/ बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए Updated Sat, 23 Apr 2016 02:15 PM IST
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Market and Storehouse developed with the drought relief fund
सूखे की मार झेल रहा है बुंदेलखंड - फोटो : BBC

सूखे की मार झेल रहे बुंदेलखंड को साल 2010 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने 36 सौ करोड़ रुपए का भारी भरकम पैकेज जारी किया था। इस पैकेज के अनुसार सूखे और जल संकट से निपटने के लिए कुछ काम तत्काल करने थे और कुछ दूरगामी योजना के तहत कराए जाने थे। लेकिन इस रकम का जिस तरह से इस्तेमाल हुआ उसे देखकर और सुनकर विश्वास ही नहीं होता कि ऐसा भी हो सकता है।

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पहली कड़ीः सूखे बुंदेलखंड में गांव वीरान, घरों पर ताले
यह पैकेज खास तौर पर छोटे बांध लगाने, पेड़ लगाने और चेक डैम बनाने के लिए था। इसके लिए राज्य सरकार ने विभिन्न विभागों को अलग-अलग जिम्मेदारियां दीं। लेकिन काम कागजों पर अधिक दिखे, जमीन पर कम। बीस हजार नए कुएं बनाने और पुराने कुओं की मरम्मत करने के लिए पांच सौ करोड़ रुपए की सीमा तय की गई थी। लेकिन हाल ये है कि बुंदेलखंड में नया कुआं शायद ही कहीं दिखे, और पुराने कुओं की हालत देखकर लगता नहीं कि इनके रखरखाव पर सैकड़ों करोड़ रुपए बहा दिए गए।
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कुछ ऐसा ही हाल पशुपालन विभाग का भी है। यहां बकरियां खरीदने के लिए स्वयं सहायता समूहों को सौ करोड़ रुपए जारी किए गए थे। पर खरीददारी केवल कागजों पर ही हुई लगती है।

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कड़ी दर कड़ी खुलती गई कमियां

Market and Storehouse developed with the drought relief fund
बांध भी नहीं बन पाए - फोटो : BBC

दूसरी कड़ीः 'घर जलते रहे, बुझाने को पानी नहीं था'
यदि पेड़ लगाने और चेक डैम की बात करें तो वन विभाग को इसके लिए बड़ी धनराशि मुहैया कराई गई, लेकिन चेक डैम की जगह महज पत्थर रखकर खानापूर्ति कर दी गई। पेड़ लगाने की बात तो छोड़ ही दीजिए। स्थानीय लोगों को इस बात की भनक तक नहीं है कि उनके इलाके के विकास के लिए केंद्र सरकार ने इतनी बड़ी धनराशि जारी की थी। स्थानीय पत्रकार आशीष सागर कहते हैं कि वास्तव में इतनी बड़ी रकम का यदि आधा हिस्सा भी खर्च किया गया होता तो बुंदेलखंड की सूरत बदल गई होती।

तीसरी कड़ीः अवैध कब्जे ने छीन लिया पानी
पैकेज के दुरुपयोग का अहसास तब गंभीर रूप से हुआ जब इस पैसे से हर जिले में बड़ी मंडियां और गोदाम बने दिखे। सूखे से प्रभावित इस इलाके के हर जिले में मंडियां बनाई गई हैं। लेकिन इन मंडियों में आपको एक दाना नहीं मिलेगा। बुंदेलखंड पैकेज में कथित अनियमितताओं को लेकर कांग्रेस नेता प्रदीप जैन आदित्य सीधे तौर पर राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं। जब ये पैकेज जारी हुआ था उस समय प्रदीप जैन झांसी से सांसद थे और केंद्र सरकार में मंत्री भी।

बीबीसी से बातचीत में उनका कहना था, “हमने इस राशि की मॉनीटरिंग के लिए संसद से एक समिति बनाने का आग्रह किया था, लेकिन उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारों ने बहुत विरोध किया। इसके अलावा इस पैकेज के खर्च की जानकारी ऑनलाइन करने की भी बात मैंने कही थी लेकिन उसके लिए भी राज्य सरकारें तैयार नहीं हैं।” 

सूखे के पैसे पर मलाई काट रहे हैं कुछ लोग

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सूखे का फायदा किसानों को कम औरों को ज्यादा - फोटो : BBC
चौथी कड़ीः सूखा बुंदेलखंड कुछ पर बरसा रहा है ‘सोना’
आशीष बताते हैं, "बुंदेलखंड विशेष पैकेज से ही बांदा में चौधरी चरण सिंह रसिन बांध परियोजना बनी थी, जिसमें करीब 850 किसानों की कृषि जमीन डूब क्षेत्र की ली गई थी। लेकिन इसमें मछली पालन होता है।

किसान सिंचाई के पानी के लिए तरस रहे हैं।" आशीष का कहना है कि इस बांध के दोनों तरफ बसपा सरकार ने इको पार्क बनवा दिए और उसमें गौतमबुद्ध की प्रतिमा लगवाई। पार्क में बने हिरन, झूले, मूर्तियां आज बदहाल और टूटी हुई हैं। यही नहीं, प्लास्टर आफ पेरिस के कई खम्भे तेज हवा में टूट गए। इन खंभों में बालू भरी थी।

आशीष का कहना है कि यह बुंदेलखंड पैकेज के साथ की गई बेइमानी की जीती जागती तस्वीर है। उधर, वन विभाग ने बांदा जिले में कोल्हुआ जंगल में 58 लाख के ड्राई चेक डैम बनाए थे, वे भी पहली बारिश में ही बह गए।
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