फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   map clashes between nepal and india nepal is increasing friendship with china and internal politics occur

भारत-नेपाल के संबंधों में खटास, 200 साल पुराना है लिपुलेख-कालापानी विवाद

Tue, 26 May 2020 04:50 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Tanuja Yadav Updated Tue, 26 May 2020 04:50 PM IST
विज्ञापन
सार
  • नेपाल ने नए राजनीतिक नक्शे में लिपुलेख, कालापानी को बताया अपना क्षेत्र
  • भारत ने नेपाल के नए नक्शे को सिरे से खारिज किया, लिपुलेख को बताया अपना क्षेत्र
  • भारत और नेपाल के बीच चला आ रहा है यह मसला 200 साल से ज्यादा पुराना है
loader
map clashes between nepal and india nepal is increasing friendship with china and internal politics occur
भारत-नेपाल विवाद - फोटो : PIB India

विस्तार

हाल ही में नेपाल ने अपने नए राजनीतिक मानचित्र पर लिपुलेख और कालापानी को अपना हिस्सा बताकर विवाद खड़ा कर दिया है। भारत ने नेपाल के इस फैसले पर नाखुशी जताकर नेपाल के नए राजनीतिक मानचित्र को सिरे से खारिज कर दिया है। 



भारत ने कहा कि कोरोना संकट के बाद दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत हो सकती है। दरअसल जब रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने 80 किलोमीटर के धारचूला-लिपुलेख मार्ग का लोकार्पण किया तब नेपाल ने इस पर आपत्ति जताते हुए लिपुलेख को अपना क्षेत्र बताया। 


धारचूला-लिपुलेख वाला मार्ग कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए अच्छा होगा और इससे उनका समय भी बचेगा। पहले तीर्थयात्रियों को ये यात्रा पूरी करने में दो से तीन हफ्ते लग जाते थे लेकिन अब मात्र एक हफ्ते में यात्रा पूरी की जा सकेगी।

यह नया मार्ग पिथौरागढ़-तवाघाट-घटीअबागढ़ मार्ग का विस्तार है। नेपाल सरकार ने अपने नए राजनीतिक नक्शे में लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी और अपना क्षेत्र बताया है जिससे विवाद खड़ा हो गया है। आइए समझते हैं कि नेपाल के लिए ये इलाके इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं...

200 साल से ज्यादा पुराना है मामला

इन इलाकों पर अधिकार जताने का यह मामला करीब 200 साल पुराना है। 18वीं शताब्दी में नेपाल और ब्रिटिश राज के बीच युद्ध के बाद 1815 में एक समझौता हुआ जिसमें यह तय हुआ कि ये क्षेत्र ब्रिटिश राज के अधीन होंगे। 

1950 और 1970 के दशक के बाद नेपाल ने अब फिर इस मुद्दे को उठाया है। नेपाल के इस कदम के पीछे चीन का हाथ दिखाई पड़ता है क्योंकि जिस क्षेत्र पर नेपाल ने अपना दावा किया वह चीन की सीमा से भी लगता है।


किसकी शह पर हो रहा है काम

जानकारों की माने तो नेपाल काफी समय से चीन की आड़ में भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करता रहा है। नेपाल में कम्युनिस्ट सरकार चीन के लगातार संपर्क में है। चीन की मदद से कई परियोजना भारत की सुरक्षा चिंताओं की अनदेखी करके वहां शुरू की गई हैं।

नेपाल का एक पक्ष चाहता है चर्चा

नेपाल में कुछ लोग या एक तबका ऐसा भी है जो इस फैसले से चिंतित है। नेपाल प्रजातांत्रिक गठबंधन के किशोरी महतो का कहना है कि नेपाल में एक बड़ा समुदाय भारत के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने के पक्ष में है।

किशोरी महतो ने कहा कि इस समय भारत को बड़े भाई की भूमिका निभाना चाहिए। इस मुद्दे पर दोनों देशों का आपस में बातचीत करना बेहद जरूरी है। इससे दोनों देशों के संबंधों में मजबूती आएगी।

ओली की सत्ता पर उठ रहे थे सवाल
विदेशी मामलों के जानकार वेदप्रताप वैदिक का कहना है कि नेपाल के इस फैसले के पीछे बड़ी वजह अंदरूनी राजनीति है। काफी समय से केपी शर्मा ओली की सरकार में अंदर के लोग ही सवाल उठा रहे हैं। उनकी सरका के सहयोगी दल ही उनकी घेराबंदी कर रहे थे।

इस कदम से केपी ओली ने उनके विरोध में उठ रहे सुरों को दबाने की कोशिश की है। इसके अलावा वह चाहते हैं कि इस फैसले पर नेपाल की जनता राष्ट्रवाद के नाम पर उनका समर्थन करें।

नेपाल से भारत के रिश्ते कब-कब खराब हुए

साल 1989-90 में भी दोनों देशों के बीच नाकाबंदी हुई थी। भारत ने नेपाल के एक अलग ट्रेड एंड ट्रांजिट डील करने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। भारत इस तरह की केवल एक डील चाहता था। इस कारण भारत ने दोनों देशों की सीमा के 21 में से 19 बिंदुओं को बंद कर दिया था।

साल 2008 में नेपाल में जब प्रचंड बहुमत की सरकार बनी थी तो उन्होंने उस वक्त भारत को चौंका दिया था। वह सबसे पहले दिल्ली का दौरा करने की स्थापित परंपरा को तोड़कर चीन चले गए थे।

साल 2015 में सितंबर में भारत ने नेपाल के विरोध में अघोषित नाकाबंदी कर दी थी। भारत से सामान से भरे ट्रक नेपाल बॉर्डर पर खड़े रहे थे जबकि ठीक इससे चार महीने पहले नेपाल ने एक बड़े भूकंप का दंश झेला था।

क्या कभी ओली भारत के पक्ष में खड़े हुए

ऐसा कहा जाता है कि नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली विदेशी संबंधों के मामले में भारत और चीन से संतुलन बनाकर रखना चाहते हैं। कभी केपी ओली भी भारत समर्थक माने जाते थे। 1996 में भारत और नेपाल के बीच हुई महाकाली संधि में ओली की बड़ी भूमिका मानी जाती है।

यह संधि महाकाली नदी के बंटवारे पर हुई थी। 1990 के दशक में ओली कैबिनेट मंत्री रहे और 2007 में विदेश मंत्री। इस दौरान ओली का रुख भारत के प्रति अच्छा था लेकिन अब ऐसा कहा जाता है कि ओली का झुकाव चीन की तरफ ज्यादा है। जबकि प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए वह तीन बार भारत आ चुके हैं।

क्या भारत के पास कोई विकल्प है
लिपुलेख विवाद के बाद नेपाल और भारत दोनों देशों के नेताओं को कूटनीतिक संवाद शुरू करने की सलाह दी गई है। विदेश नीति के जानकारों ने दोनों देशों के नेताओं से यह अनुरोध किया है लेकिन भारत ने कोरोना के चलते इस पहल को रोक दिया है। 

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद को कूटनीतिक संवाद के अलावा किसी और तरीके से हल नहीं किया जा सकता है और इस तरह का संवाद करना कोई बहुत मुश्किल काम भी नहीं है।

नेपाल और चीन के करीब आने की वजहें

भारत के साथ नेपाल के रिश्तों में खटास से चीन नेपाल के करीब आना चाहता है। यही नहीं नेपाल भी पूरी तरह से भारत पर निर्भर होना नहीं चाहता है और भारत के विकल्प के रूप में चीन से करीबी बढ़ाई जाए। नेपाल एक लैंड लॉक्ड देश है और उसे व्यापार के लिए भारत के बंदरगाहों की जरूरत पड़ती है और चीन के मुकाबले यह काफी करीब है।

नेपाल चीन के साथ एक वैकल्पिक रास्ता तैयार करने पर काम कर रहा है। दोनों देशों के बीच तिब्बत से होते हुए दो हाइवे के निर्माण, बंदरगाहों की मरम्मत, ट्रेन सेवा और हवाई सेवा पर पहले ही बात हो चुकी है। चीन की इच्छा केरॉन्ग से काठमांडू, काठमांडू से पोखरा और लुम्बिनी तक रेल लाइन बिछाने की है। 

नेपाल चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना से भी जुड़ चुका है। नेपाल चीन से कई बॉर्डर पोस्ट खुलवाकर व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाने की ताक में भी रहता है। पोखरा में अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट, काठमांडू रिंग रोड परियोजना पर भी चीन काम कर रहा है।

नेपाल का सांस्कृतिक झुकाव भारत से ज्यादा 

नेपाल के पारंपरिक तौर पर भारत के संबंध काफी अच्छे रहे हैं। नेपाल की राजनीति से लेकर विदेश नीति तक भारत का प्रभाव मजबूत रहा है। नेपाल का एक बड़ा तबका भारत में नौकिरयों और दूसरे रोजगार से जुड़ा है।

वहीं नेपाल और भारत में आवाजाही के लिए वीजा की जरूरत नहीं पड़ती। भारतीय रुपया नेपाल में बेधड़क चलता है। नेपाल अपनी जरूरत का अधिकांश सामान भारत से लेता है। भारत में नेपाली नागरिक काम, इलाज, पढ़ाई, नौकरियों, रोजगार के लिए आसानी से आ जा सकते हैं जबकि चीन में आवाजाही आसान नहीं है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed