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Manipur Violence: उत्तर पूर्व में नए फ्रंट खुलने का खतरा, 'हेड हंटर' की चेतावनी; चीन व म्यांमार हुए सक्रिय

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Sat, 24 Jun 2023 03:22 PM IST
सार

1944 में नागालैंड में बड़ी लड़ाई हुई। आजाद हिंद फौज व जापान की सेना ने ब्रिटिश आर्मी का जमकर मुकाबला किया। एक स्थिति ऐसी भी आई कि ब्रिटेन की सेना ने लगभग हथियार डाल दिए थे।

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Manipur Violence: Threat of new front opening in North East, 'Head Hunter' warns; China-Myanmar became active
Manipur Violence - फोटो : Social Media

विस्तार

मणिपुर में 3 मई से शुरु हुई हिंसा थमने का नाम ही नहीं ले रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, हिंसाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं। हिंसा में सौ से अधिक लोग मारे गए हैं, जबकि 50 हजार से ज्यादा लोगों ने अपना घर छोड़कर सुरक्षित जगहों पर शरण ली है। लूटे गए छह हजार हथियारों में से अभी 1500 भी वापस नहीं हुए हैं। रोड ब्लॉक कर सुरक्षा बलों का रास्ता रोका जा रहा है। अब तो असम राइफल सहित दूसरे सुरक्षा बलों पर हमले भी होने लगे हैं।
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मणिपुर की हिंसा के बीच नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालिम, 'एनएससीएन' ने उत्तर पूर्व में संघर्ष के नए फ्रंट खुलने की संभावना जताई है। किन्हीं कारणों से शांत दिखाई पड़ रहे 'हेड हंटर' नागाओं की चेतावनी बहुत डरावनी है। उसमें कहा गया है कि मणिपुर में जानबूझकर हिंसा कराई जा रही है। इसे तुरंत रोकना होगा, अन्यथा पूरा उत्तर पूर्व इस आग से झुलस सकता है। भारत सरकार यह ध्यान रखे कि मणिपुर हिंसा के बीच दो पड़ोसी मुल्क म्यांमार और चीन सक्रिय हो रहे हैं।  
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'हेड हंटर' को हल्के में लेना होगी बड़ी भूल
केंद्र सरकार में उत्तर पूर्व के मामलों से जुड़े विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि मणिपुर हिंसा के बाद अब वे समूह भी दोबारा से सक्रिय हो सकते हैं, जो भारत सरकार के साथ किन्हीं समझौतों में शामिल रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी चिंता 'हेड हंटर' यानी नागाओं को लेकर है। उत्तर पूर्व में 'नागा' समुदाय के लिए हेड हंटर शब्द इस्तेमाल किया जाता रहा है। दशकों पहले जब नागा किसी लड़ाई या युद्ध का हिस्सा बनते तो इनके बारे में कहा जाता था कि ये लोग दुश्मन का सिर काटकर लाने के लिए जाने जाते हैं। ये दुश्मन पर धावा बोलकर उसका सिर काट देते थे। इनसे सब लोग डरते थे। आज मणिपुर में 'कुकी और मैतेई' के बीच चले संघर्ष में अब नागाओं ने आवाज उठानी शुरू कर दी है।
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'एनएससीएन' द्वारा जारी अपने पत्र में ये चेतावनी दी गई है कि उत्तर पूर्व में चिंगारी दबी है, खत्म नहीं हुई है। मणिपुर में जल्द से जल्द हिंसा खत्म नहीं हुई तो यह आग असम, नागालैंड, मिजोरम सहित कई दूसरे हिस्सों तक पहुंचने में देर नहीं लगाएगी। म्यांमार और चीन सक्रिय हैं। इन देशों की तरफ से मणिपुर में नए फ्रंट खोलने को हवा दी जा रही है। अगर नागालिम या कोई दूसरा फ्रंट खुलता है तो केंद्र सरकार के लिए उत्तर पूर्व को संभालना बहुत मुश्किल हो जाएगा। 

पूर्व ले.जन. एल निशिकांत सिंह (रिटायर्ड) की टिप्पणी
राज्य के बिगड़ते हालात को लेकर सेना के पूर्व अफसरों ने भी आवाज उठाई है। ले.जन. एल निशिकांत सिंह (रिटायर्ड) ने कहा, मैं मणिपुर से जुड़ा एक सामान्य भारतीय की तरह रिटायर्ड लाइफ जी रहा हूं। ये स्टेट अब राज्य विहिन हो चुका है। मणिपुर में लाइफ और प्रॉपर्टी को किसी भी समय, किसी के द्वारा नष्ट किया जा सकता है। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक ने भी निशिकांत सिंह की बात पर अपनी सहमति जताई है। जन. वेद प्रकाश मलिक ने मणिपुर के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल के ट्वीट को रिट्वीट करते हुए लिखा, मणिपुर में कानून और व्यवस्था की स्थिति पर उच्चतम स्तर पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। इस मुद्दे पर विपक्ष भी केंद्र सरकार को घेर रहा है। राहुल गांधी ने ट्विटर पर लिखा, 'मणिपुर 50 दिनों से जल रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री चुप रहे।

सर्वदलीय बैठक तब बुलाई गई, जब प्रधानमंत्री स्वयं देश में नहीं हैं। स्पष्ट रूप से, यह बैठक प्रधानमंत्री के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने कहा, कांग्रेस, जनता दल (यूनाइटेड), तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सहित 10 विपक्षी दलों के सदस्यों ने 10 जून को प्रधानमंत्री कार्यालय को एक ज्ञापन सौंपकर पीएम मोदी से मिलने के लिए समय मांगा था। प्रधानमंत्री विपक्षी दलों के सदस्यों से बिना मिले ही अमेरिका चले गए। कांग्रेस पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जब मणिपुर को लेकर जारी अपने वीडियो संदेश में कहा कि यह हिंसा देश की अंतरात्मा पर गहरा घाव है तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 24 जून को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। 

आजादी से पहले ही नागाओं की जिद रही है
आजादी से पहले ब्रिटिश आर्मी के साथ इनकी खूब लड़ाई होती रही है। ये लोग खुद को भारत का नागरिक नहीं मानते थे। इनका प्रयास था कि उत्तर पूर्व का कुछ भाग और पड़ोसी मुल्क का एक बड़ा हिस्सा उन्हें मिल जाए। इनका अपना संविधान हो। हालांकि ब्रिटेन ने 1857 के बाद नागाओं को भारत से अलग नहीं माना। उन्हें भारत का हिस्सा बनाया। बाद में भी लड़ाई होती रही, लेकिन ये भारत में ही रहे। आजादी की लड़ाई के दौरान नागा क्लब को नेशनल काउंसिल का रूप दिया गया।

साइमन कमीशन जब भारत आया तो उसे नागा क्लब की ओर से प्रतिवेदन दिया गया। नागा क्लब ने उस प्रतिवेदन में अपने समुदाय को भारत से अलग करने की मांग की। नेशनल काउंसिल ने कहा, हमें अपने फैसले लेने दो। उत्तर पूर्व के मामलों के जानकार एक सेवानिवृत्त अधिकारी बताते हैं, नागा तो आज भी ऐसे ही मौके की तलाश में हैं। ये अवधारणा, केंद्र सरकार और उत्तर पूर्व की सुरक्षा के लिए कमजोर कड़ी बन सकती है। दशकों तक सरकार ने नागाओं को बहला फुसला कर शांत किया हुआ है। उन्हें राष्ट्रवाद से कोई मतलब नहीं। जीडीपी और यूएनओ से कोई लेना देना नहीं। इनकी तीन मांग रही हैं कि हमें अलग देश, अलग झंडा और अलग संविधान चाहिए। 

जब ब्रिटेन ने लगभग हथियार डाल दिए थे
1944 में नागालैंड में बड़ी लड़ाई हुई। आजाद हिंद फौज व जापान की सेना ने ब्रिटिश आर्मी का जमकर मुकाबला किया। एक स्थिति ऐसी भी आई कि ब्रिटेन की सेना ने लगभग हथियार डाल दिए थे। फरवरी 1946 में जब नागा क्लब से नागा नेशनल काउंसिल बनी तो उसमें कहा गया कि हमें अपने फैसले लेने दो। नागाओं ने कहा, हमें न तो बंगाल और न ही असम के साथ जाना है। जवाहर लाल नेहरू ने कहा, तुम भारत में आओ। नागा समुदाय ने इस प्रस्ताव को रिजेक्ट कर दिया।

ब्रिटेन से भारत की आजादी का प्रारूप तैयार करने के लिए जो तीन सदस्यीय दल आया था, उनसे भी नागाओं ने खुद के लिए अलग संविधान की मांग की। नागा मूवमेंट में फिजो को बहुत सम्मान दिया जाता है। उन्हें नागालैंड काउंसिल का अध्यक्ष बनाया गया। बाद में उन्हें जेल में डाला गया। हालांकि बांग्लादेश के रास्ते फिजो, लंदन पहुंच गया। फिजो ने कभी नहीं माना कि नागालैंड, भारत का हिस्सा है। अभी दो ग्रुप सक्रिय हैं। दशकों से चल रही नागा की लड़ाई अभी केवल दबी हुई है, खत्म नहीं हुई है। केंद्र सरकारों ने विभिन्न समझौतों के तहत नागाओं को शांत कर रखा है।

जीवित है ग्रेट नागालिम की अवधारणा
जब 1947 में भारत को आजादी मिली तो नागा लोगों ने नागालैंड को आजाद देश घोषित कर दिया था। उस वक्त ग्रेटर नागालिम की अवधारणा सामने आई। इसके तहत नागाओं ने असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर व बर्मा के कुछ हिस्से को मिलाकर ग्रेट नागालिम बनाने की मांग की। साल 2015 में मोदी सरकार ने इनके साथ एक समझौता किया। सूत्र बताते हैं कि उस समझौते में बहुत कुछ गुप्त रहा। नागालिम समझौते की असली शर्तें क्या रही, यह बात किसी को नहीं मालूम चली। उस वक्त भी अलग संविधान व अलग झंडे की बात उठाई गई। 'एनएससीएन' के पत्र के मुताबिक, मणिपुर में नागा, मैतेई, कुकी, ये सब मिलकर रह रहे थे।

2021 में आर्मी की 21 पैरा की फायरिंग में छह लोग मारे गए थे। बाद में पता चला कि वे सब किसान थे। गलतफहमी में वह घटना हुई थी। उसके बाद फैली हिंसा में आठ मारे गए। लोगों ने सशस्त्र बल 'विशेष शक्तियां' अधिनियम (अफस्पा) हटाने की मांग कर दी। केंद्रीय गृह मंत्रालय में उत्तर पूर्व के मामले देख चुके एक अधिकारी के मुताबिक, नागालैंड में लोग एकदम भड़क जाते हैं। बस यूं कहें कि चिंगारी जब तक दबी है, तो दबी है। यह चिंगारी किसी भी वक्त मणिपुर व मिजोरम सहित उत्तर पूर्व के दूसरे हिस्सों को अपनी चपेट में ले लेगी।


मणिपुर में आज सुरक्षा बलों का रास्ता रोक दिया गया है। लोगों के घर जलाए जा रहे हैं। पुलिस पर एक समूह के साथ मिलीभगत के आरोप लगे हैं। अलगाववादी समूह ‘एनएससीएन’ की आशंका को हल्के में लेना एक बड़ी भूल होगी। वहां पर संघर्ष के नए फ्रंट खुलने में देर नहीं लगेगी।
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