मणिपुर एग्जिट पोल: इतिहास में पहली बार अपने दम पर कमल खिला सकती है भाजपा!
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विस्तार
भारतीय जनता पार्टी का पूर्वोत्तर के मणिपुर राज्य में दबदबा कायम रह सकता है। सोमवार शाम को आए एग्जिट पोल में पार्टी फिर से सत्ता में वापसी करती हुई नजर आ रही है। यह पहली बार होगा जब भाजपा अपने दम पर राज्य की सत्ता पर काबिज होगी। यहां उसे सरकार बनाने के लिए किसी भी अन्य सहयोगी दल की जरूरत नहीं होगी।
जी न्यूज डिजाइन बॉक्स के एग्जिट पोल के मुताबिक मणिपुर में भाजपा की सरकार बनती दिख रही है। राज्य में भाजपा को 32 से 38 सीटें मिलने का अनुमान है। इसके अलावा दूसरे नंबर पर कांग्रेस रहने वाली है, जिसे 12-17 सीटें मिलती दिख रही हैं। मणिपुर चुनाव में एनपीएफ को 3-5 सीटें मिलने का अनुमान है और एनपीपी को 2-4 सीटें मिल सकती हैं। अगर वोट प्रतिशत की बात करें तो इसमें भी भाजपा का पलड़ा भारी है। भाजपा का वोट प्रतिशत 39 के करीब रह सकता है। इसके अलावा कांग्रेस को 30 फीसदी, एनपीएफ को 9 फीसदी, NPP को 6 फीसदी वोट मिल सकते हैं। अन्य के खाते में 16 फीसदी वोट जा सकते हैं।
भाजपा ने इस बार भी बीरेन सिंह पर खेला दांव
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को मणिपुर में 2014 के बाद से अहमियत मिलना शुरू हुई। 2016 में कांग्रेस के निवर्तमान मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भाजपा में आए तो पार्टी का ग्राफ और बढ़ा। भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में पहली बार 21 सीटें जीतीं। सरकार बनाने के लिए भाजपा ने नेशनल पीपुल्स पार्टी और नगा पीपुल्स फ्रंट के साथ समझौता किया। पार्टी इन चुनावों में एन बीरेन सिंह के चेहरे को आगे रखकर चुनावी मैदान में उतरी। फिर भाजपा, फिर विकास और डबल इंजन की सरकार के नारे के भाजपा इन चुनावों में मैदान में उतरी थी। मणिपुर के सीएम बीरेन सिंह एक कुशल राजनेता के पहले पत्रकार रहे हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे इकलौते नेता हैं, जो घाटी और पहाड़ी इलाकों के बीच संतुलन साधना जानते हैं।
सीएम के इन कार्यक्रमों ने भाजपा को दिलाई बढ़त
सीएम एन बीरेन सिंह ने अपने कार्यकाल में तीन कार्यक्रम मणिपुरवासियों के लिए चलाए। इनमें 'पहाड़ों की ओर चलो', गांवों की ओर चलो' के साथ 'सीएम द हाइसी' (मुख्यमंत्री को बताइए) जैसे कार्यक्रम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय है। कोरोना संक्रमण के दौरान भाजपा सरकार के कामों को भी लोगों ने सराहा है। भाजपा के शासनकाल में राज्य में शांति भी रही। हालांकि सीएम सिंह के सामने कई चुनौतियां भी है। पहली चुनौती दूसरे दलों से आए नेताओं, विशेषकर कांग्रेस से आने वालों को संतुष्ट रखना और वे चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी छोड़कर न भागें यह सुनिश्चित करना है। वहीं दूसरी कि वे गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून पर काफी हद तक निर्भर हैं। जबकि इस कानून की मणिपुर सहित पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी काफी निंदा होती रही है।
कांग्रेस के पास चेहरे की कमी
कांग्रेस पार्टी के पास मणिपुर में कोई एक सर्वमान्य चेहरा नहीं है। इसी कारण पार्टी का संगठन राज्य में कमजोर होता जा रहा है। राज्य में बड़े पैमाने पर कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। हालांकि पूर्व सीएम और कांग्रेस के कद्दावर नेता ओकराम इबोबी सिंह और पूर्व डिप्टी सीएम गैखंगम भी इस बार कांग्रेस की तरफ चुनावी मैदान में उतरे है। पार्टी ने राज्य में फिर से सत्ता में आने के लिए पांच वामपंथी दलों के साथ गठजोड़ किया हैं इन्हीं आधारों पर वह जीत का दावा कर रही है। अपनी सरकार बनाने का भरोसा जता रही है।
एनपीपी और एनपीएफ, सरकार में साथ पर चुनाव में अलग
एनपीपी वैसे तो मेघालय में अच्छा जनाधार रखने वाली पार्टी है। लेकिन मणिपुर उसका ठीक-ठाक दखल है। एनपीपी ने 2017 कि विधानसभा चुनावों में भाजपा को सरकार बनाने में भी मदद की और सरकार में भी शामिल रही। लेकिन इस बार एनपीपी ने भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ रही है। स्थानीय लोगों के अधिकारों की बात करने वाली एनपीपी ने चुनावों में लोगों से वादा किया है कि अगर पूर्ण बहुमत से उसकी सरकार ने बनी, तो वह सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून हटवाने का प्रयास करेगी। जबकि एनपीएफ नगालैंड में अधिक असर रखती है। जबकि मणिपुर में उसका प्रभाव थोड़ा कम है। 2017 के चुनावों में एनपीएफ भाजपा के साथ थी लेकिन इस चुनाव में अलग होकर चुनाव लड़ रही है।
मणिपुर चुनाव में यह मुद्दे रहे हावी
मणिपुर विधानसभा का चुनाव तीन मुद्दे के ईद गिर्द ही रहा। पहला- एएफएसपीए को हटाया जाना। इस मुद्दे पर सभी पार्टियां एकमत हैं। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भी इसके पक्षधर बताए जाते हैं कि एएफएसपीए हटना चाहिए। लेकिन उन्होंने अब तक इसके लिए प्रयास नहीं किया। हालांकि इन चुनावों में वे अब वादा कर रहे हैं कि केंद्र सरकार से इस संबंध में बातचीत शुरू की जाएगी।
राज्य में दूसरा मसला हिंसा का है। बीते साल चूड़ाचंद्रपुर की घटना में असम राइफल्स के कर्नल विप्लव त्रिपाठी के साथ ही छह आम नागरिकों की मौत का मसला यहां चुनाव में उठा। पड़ोसी नगालैंड में 14 नागरिकों की मौत का मामला भी इससे जुड़ा है। अभी जनवरी में भी मणिपुर के अलग-अलग हिस्सों में हुईं हिंसा की घटनाएं चुनाव के केंद्र में हैं। चुनाव पूर्व हिंसा भी यहां आम बात है। लोग इस समस्या का स्थायी समाधान चाहते हैं। राज्य में तीसरा मुद्दा पानी और बेहतर सड़क संपर्क की कमी को दूर करने का है। मणिपुर सूखा प्रभावित राज्य है और यहां पहाड़ी और मैदानी इलाकों के बीच सड़क संपर्क भी बेहतर नही है।
यह था पिछली बार का नतीजा
मणिपुर की 60 सदस्यीय विधानसभा के लिए दो चरणों में चुनाव संपन्न हुए। यहां 28 फरवरी को हुए पहले चरण के मतदान में 38 साटों पर करीब 78.03 फीसदी वोटिंग हुई। तो वहीं, पांच मार्च को हुए दूसरे चरण के मतदान में 22 सीटों के लिए 76.04 वोटर्स ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। मणिपुर में 2017 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 28 सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि भाजपा को 21 सीटें मिली थीं। लेकिन भाजपा ने निर्दलीयों और कांग्रेस के बागियों के दम पर सरकार बना ली थी। इस चुनाव में एनपीएफ ने चार, एनपीईपी ने चार, टीएमसी ने एक, निर्दलीय ने एक सीट हासिल की थी। जबकि साल 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 42 सीटें मिली थी। भाजपा का यहां खाता तक नहीं खुला था।