काजल की कोठरी में बेदाग हैं दीदी
- हमेशा मोर्चे पर आगे रह कर करती हैं नेतृत्व
- पार्टी नेताओं पर आरोप, लेकिन ममता की छवि बेदाग
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दो-तिहाई बहुमत हासिल कर सत्ता में लौटने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार और उनकी पार्टी तृणमूल और उसके नेताओं पर भले तमाम तरह के आरोप लगे और लग रहे हों, खुद ममता राजनीति के काजल की कोठरी में रह कर भी सफेद सूती साड़ी की तरह ही बेदाग हैं।
कांग्रेस से अपना राजनीतिक कैरियर शुरू करने वाली ममता वर्ष 1984 में पहली बार उस समय सुर्खियों में आईं जब वह कोलकाता की जादवपुर संसदीय सीट पर सीपीएम के धाकड़ नेता सोमनाथ चटर्जी को हरा कर संसद में पहुंचीं। अपने लगभग चार दशक लंबे राजनीतिक जीवन में ममता ने दूसरे राजनेताओं से इतर सादी जीवन शैली अपनाई। वह शुरू से ही परंपरागत बांग्ला तांत (सूती) साड़ी और हवाई चप्पल पहनती रही हैं।
यही नहीं, उन्होंने कभी न तो कोई आभूषण पहना और न ही किसी श्रृंगार प्रसाधन का इस्तेमाल किया। सफेद सूती साड़ी और हवाई चप्पल से उनका नाता कभी नहीं टूटा। चाहे वह केंद्र में मंत्री रही हों या महज सांसद। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उनके पहनावे या रहन-सहन में कोई अंतर नहीं आया। निजी या सार्वजनिक जीवन में उनके रहन-सहन और आचरण पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि वह जमीन से जुड़ी नेता हैं। वह चाहे सिंगुर में किसानों के समर्थन में धरना और आमरण अनशन का मामला हो या फिर नंदीग्राम में पुलिस की गोलियों के शिकार लोगों के हक की लड़ाई का, ममता ने हमेशा मोर्चे पर रह कर लड़ाई की।
सीएम बनने के बाद भी अपने ही मकान में रहती हैं ममता
मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह कालीघाट में अपने उसी पुराने मकान में रहती हैं और पुरानी कार में चलती हैं। जेड प्लस सुरक्षा होने के बावजूद ममता को कभी यह पसंद नहीं आया कि उनके लिए दूसरे नेताओं की तरह सड़कें खाली करा दी जाएं और आम लोगों को परेशानी हो।
दोस्त और दुश्मन दोनों उनकी सादगी का लोहा मानते है। सीपीएम नेता अशोक भट्टाचार्य मानते हैं कि राजनीतिक पहलू को दरकिनार कर दिया जाए तो राजनीति की कीचड़ में रहकर भी ममता बेदाग हैं। लंबे अरसे से ममता की राजनीति को करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार तुषार प्रधान कहते हैं कि मैंने इतना ईमानदार नेता कभी नहीं देखा। वह कहते हैं कि ममता अब भी उसी पुराने मकान में रहती हैं जिसकी छत से बरसात में पानी रिसता है। इस घर तक जाने वाली सड़क और घर का दरवाजा भी बेहद संकरा है। वह एक घटना का जिक्र करते हुए बताते हैं कि एक बार प्रधानमंत्री रहते अटल बिहारी वाजपेयी ममता से मिलने उनके घर आए तो वह बड़ी मुश्किल से दरवाजे के भीतर घुस सके थे। प्रधान उस समय मौके पर ही मौजूद थे।
राज्य के ग्रामीण इलाकों के दौरे पर निकलने वाली ममता बीच अचानक सड़क पर अपना काफिला रुकवा कर अक्सर कभी चाय बागानों में काम कर रही महिलाओं से उनका हाल-चाल पूछने लगती हैं तो कभी किसी छोटे बच्चे को गोद में लेकर पुचकारने लगती हैं। एक सख्त और कुछ हद तक तानाशाह राजनेता की छवि वाली ममता अपनी आम आदमी की छवि को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। अविवाहित ममता को फुर्सत के वक्त खाना पकाना, किताबें पढ़ना और चित्र बनाना पसंद है।