फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Malnutrition cases increased rapidly in Madhya Pradesh due to Coronavirus

कोरोना के चलते मध्यप्रदेश में तेजी से बढ़े कुपोषण के मामले, अगला नंबर उत्तर प्रदेश का!

Thu, 16 Jul 2020 06:38 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 16 Jul 2020 06:38 PM IST
सार

विशेषज्ञों का अनुमान, कोरोना काल में लोगों ने जुटाकर रखी भोजन सामग्री, केंद्र-राज्य की राहत सामग्री से भी मिली मदद, लेकिन कोरोना का असर लंबा खिंचने से गंभीर हो सकती है कुपोषण-भुखमरी की समस्या...

विज्ञापन
Malnutrition cases increased rapidly in Madhya Pradesh due to Coronavirus
malnutrition - फोटो : PTI (फाइल फोटो)

विस्तार

संयुक्त राष्ट्र की हालिया प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019 में न्यूनतम 69 करोड़ लोग भुखमरी की समस्या से जूझते रहे थे। वहीं कोविड-19 के कारण 2020 में न्यूनतम 13 करोड़ से अधिक अन्य लोग भुखमरी की समस्या का सामना करने पर मजबूर हो सकते हैं। जिससे वर्ष 2030 तक ‘शून्य भुखमरी’ के अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने में बड़ी चुनौती पेश हो सकती है। इस असर को कम करने के लिए वर्ल्ड फूड प्रोग्राम ने 13.8 करोड़ लोगों तक खाद्यान्न पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
विज्ञापन


वहीं, भारत के संदर्भ में यूपी जैसे बड़े राज्य में अभी कोरोना के कारण भुखमरी और कुपोषण की स्थिति में बढ़ोतरी के कोई संकेत नहीं मिले हैं, जबकि मध्यप्रदेश में इन मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर कोरोना काल लंबा खिंचता है, तो इन मामलों में तेज बढ़ोतरी हो सकती है।
विज्ञापन


देश के कई इलाकों में कोविड काल में श्रमिकों के पलायन, अनाज की उपलब्धता में कमी और रोजगार के अवसरों की कमी का असर बच्चों-महिलाओं में कुपोषण स्तर बढ़ने के रूप में सामने आ रहा है। विकास संवाद मध्यप्रदेश से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता राकेश मालवीय के मुताबिक कोविड काल में 45 दिनों के सर्वे में यह बात सामने आई है कि बच्चों की थाली में पोषक तत्त्वों की मात्रा 52 फीसदी तक कम हो गई है, जबकि महिलाओं की थाली में पोषक तत्वों की मात्रा में 67 फीसदी तक कि कमी आई है। उनका मानना है कि अगर कोरोना की समस्या ज्यादा आगे तक बढ़ती है तो कुपोषण स्तर में बढ़ोतरी हो सकती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


यूनिसेफ में पोषण विशेषज्ञ रिचा पांडेय ने अमर उजाला को बताया कि उत्तर प्रदेश में कोविड काल में कुपोषण बढ़ने के कोई संकेत नहीं मिले हैं। संभवतया इसका कारण यह है कि कोरोना काल में केंद्र-राज्य की मदद से लोगों के पास पर्याप्त भोजन सामग्री पहुंची है।

नकदी ट्रांसफर योजना से भी लोगों को पर्याप्त मात्रा में अपने लिए भोजन जुटाने का मौका मिला है। लेकिन अगर कोरोना काल ज्यादा लंबा खिंचता है, तो इसका असर कुपोषण के स्तर में बढ़ोतरी के रूप में देखने को मिल सकता है। हालांकि, अभी संगठन ने इसके विषय में कोई व्यापक सर्वे नहीं किया है।

एक हजार दिन का कार्यक्रम

बच्चों में कुपोषण की समस्या से निबटने के लिए यूनिसेफ ने ‘1000 दिन’ का विशेष अभियान शुरू किया है। इस योजना के तहत मां के गर्भ (नौ महीने या लगभग 270 दिन) से लेकर बच्चे के जन्म के आगे तक, कुल मिलाकर एक हजार दिन तक उसके पोषण का विशेष ध्यान रखना है।

यूनिसेफ का मानना है कि अगर इन 1000 दिनों में हम बच्चे के पोषण का विशेष ध्यान रखते हैं, तो उसके कुपोषित होने से बचाया जा सकता है। विद्वानों का मानना है कि जन्म के बाद शुरू के एक हजार दिन में होने वाले कुपोषण से बच्चे के आईक्यू स्तर (बौद्धिक स्तर) में 15 पॉइंट तक की कमी हो जाती है।

विद्वानों का मानना है कि एक बार इस कमी के हो जाने के बाद जीवन पर्यंत इस समस्या से उबरा नहीं जा सकता है। ऐसे बच्चों का शैक्षिक स्तर काफी कम रह जाता है। इतना ही नहीं, बाद में वयस्क के रूप में काम करने के दौरान भी उनकी उत्पादकता 10-15 फीसदी कम बनी रहती है।                                                             

भारत में कुपोषण की स्थिति

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में कुपोषण के कारण प्रति वर्ष पांच वर्ष से कम आयु के दस लाख बच्चों की मौत हो जाती है। भारत के लिए यह चिंताजनक तथ्य है कि वह अपने पड़ोसी देशों बांग्लादेश और नेपाल से भी कुपोषण और बाल मृत्यु दर के मामले में खराब स्थिति में है। भारत में मध्यप्रदेश, बिहार, ओडिशा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य कुपोषण में काफी अहम हैं।



कुपोषण पर भारत के सामाजिक ढांचे का भी स्पष्ट असर देखने को मिला है। एसीएफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अनुसूचित जनजाति में 28 फीसदी, अनुसूचित जाति में 21 फीसदी, पिछड़ी जातियों में 20 फीसदी और ग्रामीण समुदाय में 21 फीसदी बच्चों में कुपोषण देखने को मिलता है।

फाइट हंगर फाउंडेशन और एसीएफ ने कुपोषण को चिकित्सकीय आपात स्थिति के रूप में देखने को कहा है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed