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Mahatma Gandhi: 'बापू अपने नाम पर 'गांधीवाद' के समर्थक नहीं रहे'; उनका दर्शन होड़ रखने में विश्वास नहीं रखता
Thu, 03 Oct 2024 07:42 PM IST
पवन पांडेय
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
Published by: पवन पांडेय
Updated Thu, 03 Oct 2024 07:42 PM IST
सार
आज महात्मा गांधी के दर्शन की उपयोगिता कहीं ज्यादा बढ़ गई है। दुनिया के सभी विचारशील लोग यह मानने लगे हैं कि यदि दुनिया को इस हिंसा से बचाना है तो यह लक्ष्य केवल गांधी की राह पर चलने से ही हासिल की जा सकती है।
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महात्मा गांधी पर अपने विचार रखते हुए प्रो. दिलीप सिमियन।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
आज जिस तरह दुनिया हिंसा की आग में झुलसती दिखाई दे रही है, ऐसे समय में महात्मा गांधी के दर्शन की उपयोगिता कहीं ज्यादा बढ़ गई है। दुनिया के सभी विचारशील लोग यह मानने लगे हैं कि यदि दुनिया को इस हिंसा से बचाना है तो यह लक्ष्य केवल गांधी की राह पर चलने से ही हासिल की जा सकती है। प्रो. दिलीप सिमियन ने यह बातें महात्मा गांधी के जन्मदिन पर दिल्ली में आयोजित एक सभा के दौरान कही।
'बापू अपने नाम पर 'गांधीवाद' के समर्थक नहीं रहे'
प्रो. दिलीप सिमियन ने कहा कि वे स्वयं कभी इस विचारधारा के समर्थक नहीं थे, लेकिन लंबे समय तक जनता के बीच काम करने के बाद उन्हें समझ आया कि यदि दुनिया के हर व्यक्ति तक बिना किसी हिंसा, बिना किसी प्रतिस्पर्धा के रोटी, कपड़ा पहुंचाना है तो यह लक्ष्य केवल गांधी के दर्शन के द्वारा सबको प्रेम करने के बाद ही हासिल किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि गांधी का दर्शन किसी से किसी तरह की कोई होड़ रखने में विश्वास नहीं रखता, बल्कि यह आपसी साहचर्य, प्रेम और विश्वास पर आधारित है।
यदि दो लोगों, वर्गों या देशों के बीच किसी मुद्दे पर प्रतिस्पर्धा होती है तो उनके बीच एक दूसरे के प्रति संदेह पैदा होता है, कभी डर और भय पैदा होता है, जबकि प्रेम और आपसी सद्भाव पर आधारित गांधी का दर्शन लोगों को एक दूसरे से जुड़ने के लिए प्रेरित करता है। इसमें आपसी विद्वेष के लिए कहीं कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि यदि दुनिया को हिंसा से बचाना है तो केवल गांधी का दर्शन ही लोगों को दिशा दिखा सकता है।
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गांधी के बाद दूसरा कोई गांधीवादी नहीं
प्रो. दिलीप सिमियन ने एक विद्वान के कथन का उदाहरण देते हुए कहा कि ईसा मसीह के बाद इस पृथ्वी पर कोई दूसरा ईसाई पैदा नहीं हुआ। इस कथन का अंतर्निहित अर्थ यह है कि बाद में उनका अनुसरण करने वाले लोग ईसा मसीह के मूल उपदेशों को भूलकर तरह-तरह के आडंबर में पड़ जाते हैं, वे दिखावे में धार्मिक होने का व्यवहार करते हैं, लेकिन व्यवहार में वे ईसा मसीह की शिक्षाओं को महत्त्व नहीं देते।
'दुनिया को किसी गांधीवाद की आवश्यकता नहीं'
ठीक इसी तरह एक बार जब किसी ने गांधी की लिखी पुस्तकों को नष्ट करने का प्रयास किया और कहा कि गांधी के नाम पर कोई नया सिद्धांत नहीं जोड़ा जाना चाहिए। जब यह बात महात्मा गांधी को पता चली तो उन्होंने कहा कि यह बिल्कुल ठीक बात है। दुनिया को किसी गांधीवाद की आवश्यकता नहीं है। इसका मूल आशय यह है कि गांधी स्वयं यह मानते थे कि कोई सत्यता किसी से ग्रहण करने की चीज नहीं होती, बल्कि यह स्वयं अपने अंदर झांकने और स्वयं को जानने की प्रक्रिया होती है।
सत्य जिसे गांधी ईश्वर का सच्चा रूप मानते थे, वस्तुतः सूर्य के जैसा होता है। कोई व्यक्ति सीधे सूर्य की ओर नहीं देख सकता। लेकिन सूर्य के प्रकाश के कारण ही हम दुनिया की दूसरी वस्तुओं को आसानी से देख पाते हैं, उनके अंदर की विविधता से एक दूसरी चीजों का अंतर कर पाते हैं। ठीक उसी तरह सत्यता का प्रकाश चाहे सीधे तौर पर न देखा जा सके, लेकिन उसके कारण हम दूसरी वस्तुओं को समझने और उनके बीच अंतर को समझ पाते हैं। संभवतः यही कारण है कि बाइबल में ईश्वर को प्रकाश की तरह वर्णित किया गया है।
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'बापू अपने नाम पर 'गांधीवाद' के समर्थक नहीं रहे'
प्रो. दिलीप सिमियन ने कहा कि वे स्वयं कभी इस विचारधारा के समर्थक नहीं थे, लेकिन लंबे समय तक जनता के बीच काम करने के बाद उन्हें समझ आया कि यदि दुनिया के हर व्यक्ति तक बिना किसी हिंसा, बिना किसी प्रतिस्पर्धा के रोटी, कपड़ा पहुंचाना है तो यह लक्ष्य केवल गांधी के दर्शन के द्वारा सबको प्रेम करने के बाद ही हासिल किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि गांधी का दर्शन किसी से किसी तरह की कोई होड़ रखने में विश्वास नहीं रखता, बल्कि यह आपसी साहचर्य, प्रेम और विश्वास पर आधारित है।
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यदि दो लोगों, वर्गों या देशों के बीच किसी मुद्दे पर प्रतिस्पर्धा होती है तो उनके बीच एक दूसरे के प्रति संदेह पैदा होता है, कभी डर और भय पैदा होता है, जबकि प्रेम और आपसी सद्भाव पर आधारित गांधी का दर्शन लोगों को एक दूसरे से जुड़ने के लिए प्रेरित करता है। इसमें आपसी विद्वेष के लिए कहीं कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि यदि दुनिया को हिंसा से बचाना है तो केवल गांधी का दर्शन ही लोगों को दिशा दिखा सकता है।
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गांधी के बाद दूसरा कोई गांधीवादी नहीं
प्रो. दिलीप सिमियन ने एक विद्वान के कथन का उदाहरण देते हुए कहा कि ईसा मसीह के बाद इस पृथ्वी पर कोई दूसरा ईसाई पैदा नहीं हुआ। इस कथन का अंतर्निहित अर्थ यह है कि बाद में उनका अनुसरण करने वाले लोग ईसा मसीह के मूल उपदेशों को भूलकर तरह-तरह के आडंबर में पड़ जाते हैं, वे दिखावे में धार्मिक होने का व्यवहार करते हैं, लेकिन व्यवहार में वे ईसा मसीह की शिक्षाओं को महत्त्व नहीं देते।
'दुनिया को किसी गांधीवाद की आवश्यकता नहीं'
ठीक इसी तरह एक बार जब किसी ने गांधी की लिखी पुस्तकों को नष्ट करने का प्रयास किया और कहा कि गांधी के नाम पर कोई नया सिद्धांत नहीं जोड़ा जाना चाहिए। जब यह बात महात्मा गांधी को पता चली तो उन्होंने कहा कि यह बिल्कुल ठीक बात है। दुनिया को किसी गांधीवाद की आवश्यकता नहीं है। इसका मूल आशय यह है कि गांधी स्वयं यह मानते थे कि कोई सत्यता किसी से ग्रहण करने की चीज नहीं होती, बल्कि यह स्वयं अपने अंदर झांकने और स्वयं को जानने की प्रक्रिया होती है।
सत्य जिसे गांधी ईश्वर का सच्चा रूप मानते थे, वस्तुतः सूर्य के जैसा होता है। कोई व्यक्ति सीधे सूर्य की ओर नहीं देख सकता। लेकिन सूर्य के प्रकाश के कारण ही हम दुनिया की दूसरी वस्तुओं को आसानी से देख पाते हैं, उनके अंदर की विविधता से एक दूसरी चीजों का अंतर कर पाते हैं। ठीक उसी तरह सत्यता का प्रकाश चाहे सीधे तौर पर न देखा जा सके, लेकिन उसके कारण हम दूसरी वस्तुओं को समझने और उनके बीच अंतर को समझ पाते हैं। संभवतः यही कारण है कि बाइबल में ईश्वर को प्रकाश की तरह वर्णित किया गया है।
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