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Maharashtra: शिवसेना यूबीटी में टूट की अटकलों के बीच उद्धव की बैठक में पहुंचे सिर्फ चार सांसद
Sun, 14 Jun 2026 03:34 PM IST
नितिन गौतम
पीटीआई, मुंबई
पीटीआई, मुंबई
Published by: नितिन गौतम
Updated Sun, 14 Jun 2026 03:34 PM IST
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महाराष्ट्र की बड़ी खबरें
- फोटो : अमर उजाला
शिवसेना (यूबीटी) में संभावित टूट की खबरों के बीच पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने रविवार को अपने आवास मातोश्री में सांसदों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई। बैठक में पार्टी के 9 लोकसभा सदस्यों में से केवल 4 ही प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित हो सके, जबकि 5 सांसद ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। सांसदों की भौतिक रूप से गैरहाजिरी ने राजनीतिक गलियारों में नई अटकलों को जन्म दे दिया है।
राजनीतिक चर्चाओं में दावा किया जा रहा है कि तहत शिवसेना (यूबीटी) के सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। इन दावों को खारिज करते हुए पार्टी नेता संजय राउत ने कहा कि संसदीय दल पूरी तरह एकजुट है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि हम डरने वाले नहीं हैं।
बैठक में दक्षिण मुंबई के अरविंद सावंत, दक्षिण मध्य मुंबई के अनिल देसाई, ईशान्य मुंबई के संजय दीना पाटिल और नासिक के राजाभाऊ वाजे उपस्थित थे। वहीं, शिरडी के भाऊसाहब वाकचौरे, धराशिव के ओमराजे निम्बालकर, यवतमाल के संजय देशमुख, हिंगोली के नागेश पाटिल आष्टीकर और परभणी के संजय जाधव ऑनलाइन शामिल हुए। पार्टी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि अनुपस्थिति के पीछे पारिवारिक बीमारियां, निजी व्यस्तताएं और विधान परिषद चुनाव जैसे ठोस कारण हैं। हालांकि, ठाकरे के बुलावे के बावजूद आधे से अधिक सांसदों का मातोश्री न पहुंचना महाराष्ट्र के बदलते समीकरणों के बीच बड़े संकेत दे रहा है।
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बिना अनुमति लंबी गैरहाजिरी गंभीर कदाचार, बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेवा से हटाने का फैसला बरकरार रखा
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक के किसी अधिकारी का बिना अनुमति लंबे समय तक काम से अनुपस्थित रहना जनहित के लिए हानिकारक है और इसे गंभीर कदाचार माना जाएगा। अदालत ने ऐसे ही एक मामले में आरबीआई कर्मचारी को सेवा से हटाने के फैसले को बरकरार रखते हुए उसे राहत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति आर.आई. चागला और अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने 10 जून को पारित आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता अनिमेष बाकुली आरबीआई में वरिष्ठ सहायक के पद पर कार्यरत थे, जो एक जिम्मेदार पद है। ऐसे पद पर रहते हुए उनकी लंबी अवधि की अनधिकृत अनुपस्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा, 'इस प्रकार की अनधिकृत अनुपस्थिति जनहित के प्रतिकूल है और गंभीर कदाचार की श्रेणी में आती है, जिसके लिए सेवा से बर्खास्तगी सही है।' कोर्ट ने बाकुली की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का आरबीआई का फैसला कानूनी तौर पर गलत नहीं है।
2023 के आदेश को चुनौती दी थी
बाकुली ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फरवरी 2023 में जारी आरबीआई के उस आदेश को रद्द करने की मांग की थी, जिसके तहत उन्हें अनधिकृत अनुपस्थिति के आधार पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई थी। उन्होंने दिसंबर 2020 से रोके गए वेतन और अन्य भत्तों के भुगतान की भी मांग की थी।
कोलकाता तबादले की मांग कई बार हुई खारिज
याचिका के अनुसार, बाकुली वर्ष 2013 से आरबीआई में कार्यरत थे और जनवरी 2018 में उन्हें वरिष्ठ सहायक बनाया गया था। उन्होंने कई बार अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए कोलकाता तबादले का अनुरोध किया, लेकिन आरबीआई ने उनकी मांग स्वीकार नहीं की। मार्च 2020 से वह अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति के बिना ड्यूटी से अनुपस्थित रहने लगे। आरबीआई ने उन्हें कई बार पत्र भेजकर काम पर लौटने या मेडिकल प्रमाणपत्र के साथ अवकाश आवेदन देने को कहा, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
विभागीय जांच में भी नहीं हुए शामिल
इसके बाद आरबीआई ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर विभागीय जांच शुरू की। बैंक के अनुसार, बाकुली ने नोटिस का जवाब नहीं दिया और न ही जांच बैठकों में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा। जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद आरबीआई ने उनके खिलाफ अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा लागू कर दी।
कोविड का हवाला देकर मांगी थी राहत
बाकुली का कहना था कि कोविड-19 महामारी के दौरान वह अपने माता-पिता के पास कोलकाता चले गए थे, इसलिए मुंबई लौटकर ड्यूटी जॉइन नहीं कर सके। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विभागीय जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया और उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि विभागीय कार्यवाही के दौरान उन्हें कई अवसर दिए गए थे, लेकिन उन्होंने उनका उपयोग नहीं किया।
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राजनीतिक चर्चाओं में दावा किया जा रहा है कि तहत शिवसेना (यूबीटी) के सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। इन दावों को खारिज करते हुए पार्टी नेता संजय राउत ने कहा कि संसदीय दल पूरी तरह एकजुट है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि हम डरने वाले नहीं हैं।
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बैठक में दक्षिण मुंबई के अरविंद सावंत, दक्षिण मध्य मुंबई के अनिल देसाई, ईशान्य मुंबई के संजय दीना पाटिल और नासिक के राजाभाऊ वाजे उपस्थित थे। वहीं, शिरडी के भाऊसाहब वाकचौरे, धराशिव के ओमराजे निम्बालकर, यवतमाल के संजय देशमुख, हिंगोली के नागेश पाटिल आष्टीकर और परभणी के संजय जाधव ऑनलाइन शामिल हुए। पार्टी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि अनुपस्थिति के पीछे पारिवारिक बीमारियां, निजी व्यस्तताएं और विधान परिषद चुनाव जैसे ठोस कारण हैं। हालांकि, ठाकरे के बुलावे के बावजूद आधे से अधिक सांसदों का मातोश्री न पहुंचना महाराष्ट्र के बदलते समीकरणों के बीच बड़े संकेत दे रहा है।
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बिना अनुमति लंबी गैरहाजिरी गंभीर कदाचार, बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेवा से हटाने का फैसला बरकरार रखा
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक के किसी अधिकारी का बिना अनुमति लंबे समय तक काम से अनुपस्थित रहना जनहित के लिए हानिकारक है और इसे गंभीर कदाचार माना जाएगा। अदालत ने ऐसे ही एक मामले में आरबीआई कर्मचारी को सेवा से हटाने के फैसले को बरकरार रखते हुए उसे राहत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति आर.आई. चागला और अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने 10 जून को पारित आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता अनिमेष बाकुली आरबीआई में वरिष्ठ सहायक के पद पर कार्यरत थे, जो एक जिम्मेदार पद है। ऐसे पद पर रहते हुए उनकी लंबी अवधि की अनधिकृत अनुपस्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा, 'इस प्रकार की अनधिकृत अनुपस्थिति जनहित के प्रतिकूल है और गंभीर कदाचार की श्रेणी में आती है, जिसके लिए सेवा से बर्खास्तगी सही है।' कोर्ट ने बाकुली की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का आरबीआई का फैसला कानूनी तौर पर गलत नहीं है।
2023 के आदेश को चुनौती दी थी
बाकुली ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फरवरी 2023 में जारी आरबीआई के उस आदेश को रद्द करने की मांग की थी, जिसके तहत उन्हें अनधिकृत अनुपस्थिति के आधार पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई थी। उन्होंने दिसंबर 2020 से रोके गए वेतन और अन्य भत्तों के भुगतान की भी मांग की थी।
कोलकाता तबादले की मांग कई बार हुई खारिज
याचिका के अनुसार, बाकुली वर्ष 2013 से आरबीआई में कार्यरत थे और जनवरी 2018 में उन्हें वरिष्ठ सहायक बनाया गया था। उन्होंने कई बार अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए कोलकाता तबादले का अनुरोध किया, लेकिन आरबीआई ने उनकी मांग स्वीकार नहीं की। मार्च 2020 से वह अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति के बिना ड्यूटी से अनुपस्थित रहने लगे। आरबीआई ने उन्हें कई बार पत्र भेजकर काम पर लौटने या मेडिकल प्रमाणपत्र के साथ अवकाश आवेदन देने को कहा, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
विभागीय जांच में भी नहीं हुए शामिल
इसके बाद आरबीआई ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर विभागीय जांच शुरू की। बैंक के अनुसार, बाकुली ने नोटिस का जवाब नहीं दिया और न ही जांच बैठकों में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा। जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद आरबीआई ने उनके खिलाफ अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा लागू कर दी।
कोविड का हवाला देकर मांगी थी राहत
बाकुली का कहना था कि कोविड-19 महामारी के दौरान वह अपने माता-पिता के पास कोलकाता चले गए थे, इसलिए मुंबई लौटकर ड्यूटी जॉइन नहीं कर सके। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विभागीय जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया और उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि विभागीय कार्यवाही के दौरान उन्हें कई अवसर दिए गए थे, लेकिन उन्होंने उनका उपयोग नहीं किया।