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कर्ज और बिजली बिल माफी सहित इन मांगों के साथ मुंबई पहुंचे हैं किसान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Updated Mon, 12 Mar 2018 11:40 AM IST
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मुंबई की सड़कें सोमवार को किसानमय दिखीं। महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों से करीब 35000 से अधिक किसान मुंबई पहुंच गए हैं। किसी भी हालत में लोन माफी की मांग के साथ फॉरेस्ट राइट एक्ट के साथ साथ कृषि न्यूनतम मूल्य निर्धारण जैसी विभिन्न मांगों के साथ मुंबई पहुंचे किसान आज विधानसभा का घेराव करेंगे।
किसान के इस आंदोलन को शिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस समेत कई दल इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। इस आंदोलन में आदिवासी क्षेत्रों जैसे नासिक, थाणे और पालघर सहित महाराष्ट्र के कई हिस्सों के किसान इस भाग से रहे हैं।
किसानों की मांग है कि बीते साल सरकार ने कर्ज माफी का जो वादा किसानों से किया था उसे पूरी तरह से लागू किया जाए। किसानों का कहना है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए और गरीब और मझौले किसानों के कर्ज माफ किए जाएं।
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इसके साथ ही किसान आदिवासी वनभूमि के आवंटन से जुड़ी समस्याओं के निपटारे की भी मांग कर रहे हैं ताकि आदिवासी किसानों को उनकी जमीनों का मालिकाना हक मिल सके।
राज्य के आर्थिक सर्वे की बात करें तो बीते सालों में कृषि विकास दर कम हुई है। संविधान के अनुसार कृषि राज्य का मामला है। लेकिन इस दिशा में महत्वपूर्ण फैसले केंद्र सरकार करती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य से लेकर आयात-निर्यात के फैसले भी केंद्र सरकार के ही होते हैं।
वहीं किसानों की मांग है कि उन्हें स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों के अनुसार यानी खेती में होने वाले खर्चे के साथ-साथ उसका पचास फीसदी और दाम समर्थन मूल्य के तौर पर मिलना चाहिए। ऐसा करने से किसानों की आय की स्थिति को सुधारा जा सकता है।
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किसान के इस आंदोलन को शिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस समेत कई दल इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। इस आंदोलन में आदिवासी क्षेत्रों जैसे नासिक, थाणे और पालघर सहित महाराष्ट्र के कई हिस्सों के किसान इस भाग से रहे हैं।
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किसानों की मांग है कि बीते साल सरकार ने कर्ज माफी का जो वादा किसानों से किया था उसे पूरी तरह से लागू किया जाए। किसानों का कहना है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए और गरीब और मझौले किसानों के कर्ज माफ किए जाएं।
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इसके साथ ही किसान आदिवासी वनभूमि के आवंटन से जुड़ी समस्याओं के निपटारे की भी मांग कर रहे हैं ताकि आदिवासी किसानों को उनकी जमीनों का मालिकाना हक मिल सके।
राज्य के आर्थिक सर्वे की बात करें तो बीते सालों में कृषि विकास दर कम हुई है। संविधान के अनुसार कृषि राज्य का मामला है। लेकिन इस दिशा में महत्वपूर्ण फैसले केंद्र सरकार करती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य से लेकर आयात-निर्यात के फैसले भी केंद्र सरकार के ही होते हैं।
वहीं किसानों की मांग है कि उन्हें स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों के अनुसार यानी खेती में होने वाले खर्चे के साथ-साथ उसका पचास फीसदी और दाम समर्थन मूल्य के तौर पर मिलना चाहिए। ऐसा करने से किसानों की आय की स्थिति को सुधारा जा सकता है।
क्या कहते हैं किसान
Hiraman Waghmare
- फोटो : social media
राधाबाई किसान गागोंडे-नासिक के डिंडोरी तहसील की दाहिवी गांव से आई हैं। वह इस रैली में पिछले छह दिनों से इस रैली में शामिल हैं। राधाबाई बताती हैं कि पिछले 20 सालों से वह जंगल की एक जमीन की जुताई कर रही हैं और उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों के खेतों में काम करते हुए बिता दी है। वह बताती हैं कि अब मैं चाहती हूं कि वह खेत मेरे नाम कर दिया जाए जिससे मेरे पोते पोतियों के लिए शिक्षा की व्यवस्था हो सके और उनकी जिंदगी कुछ बेहतर हो सके।
हीरामन वाघमेरे 46 साल के हैं और उनके पास भी नासिक के चिकाडी गांव में 5 एकड़ जमीन है। उनकी पूरी खेती किसानी अच्छे मानसून पर निर्भर है। हीरामन ने बातचीत के दौरान बताया कि वह पूरी तरह से मॉनसून पर निर्भर हैं क्योंकि उनके पास बोरवेल कराने के पैसे नहीं है।
हीरा दीहाड़ी मजदूरी भी करते हैं और प्रतिदिन का 50-100 रूपये कमाते हैं। उन्हें आशा है कि एक दिन सरकार वन क्षेत्र की वह जमीन जिसकी वह जुताई कर रहे हैं उनके नाम कर देगी और शायद उन्हें भी इस जमीन के टुकड़े के लिए लोन भी मिल जाए।
राजेभाउ राठौड़ मराठवाड़ा क्षेत्र के परभानी जिले के एक गांव से इस रैली में यह सोच कर आए हैं कि शायद सरकार द्वारा उनका लिया हुआ कृषि लोन माफ कर दे। राजेभाउ ने वर्ष 2012 में 1.80 लाख का लोन लिया था लेकिन लोन लेने के बाद ही लागातार सूखा पड़ता रहा और वह लोन चुका नहीं पाए।
राजेभाउ के पास तीन एकड़ जमीन है जिसपर खेती नहीं की जा सकती है। और मैं इस जमीन से फायदा बिल्कुल नहीं उठा पा रहा हूं। वह इस रैली में इसलिए आए हैं कि उन्हें उम्मीद है कि उनका लोन माफ हो जाएगा और वह फ्रेश लोन लेकर अपनी जमीन में बोरवेल करा पाएंगे। उन्होंने बोरवेल के लिए लोन की मांग की थी लेकिन बैंक ने उनकी अरजी खारिज कर दी है।
रामराजे महादिक कॉटन की खेती करते हैं और पिंक बोलवॉर्म हमले के बाद उनकी पूरी खेती बरबाद हो गई। 10 क्विंटल कॉटन 2-3 क्विंटल में सिमट कर रह गया। 50 क्विंटल की जगह सिर्फ 12 क्विंटल की खेती ही मेरे हिस्से में आई सरकार ने कहा था कि हमें मुआवजा दिया जाएगा लेकिन अभी तक खराब हुई फसल का कोई मुआवजा नहीं मिला है।
उन्होंने कहा कि हमने तो पूरी मेहनत की लेकिन मौसम और कीड़े की मार ने हमारी खेती बरबाद कर के रख दी अब हम क्या करें।
हीरामन वाघमेरे 46 साल के हैं और उनके पास भी नासिक के चिकाडी गांव में 5 एकड़ जमीन है। उनकी पूरी खेती किसानी अच्छे मानसून पर निर्भर है। हीरामन ने बातचीत के दौरान बताया कि वह पूरी तरह से मॉनसून पर निर्भर हैं क्योंकि उनके पास बोरवेल कराने के पैसे नहीं है।
हीरा दीहाड़ी मजदूरी भी करते हैं और प्रतिदिन का 50-100 रूपये कमाते हैं। उन्हें आशा है कि एक दिन सरकार वन क्षेत्र की वह जमीन जिसकी वह जुताई कर रहे हैं उनके नाम कर देगी और शायद उन्हें भी इस जमीन के टुकड़े के लिए लोन भी मिल जाए।
राजेभाउ राठौड़ मराठवाड़ा क्षेत्र के परभानी जिले के एक गांव से इस रैली में यह सोच कर आए हैं कि शायद सरकार द्वारा उनका लिया हुआ कृषि लोन माफ कर दे। राजेभाउ ने वर्ष 2012 में 1.80 लाख का लोन लिया था लेकिन लोन लेने के बाद ही लागातार सूखा पड़ता रहा और वह लोन चुका नहीं पाए।
राजेभाउ के पास तीन एकड़ जमीन है जिसपर खेती नहीं की जा सकती है। और मैं इस जमीन से फायदा बिल्कुल नहीं उठा पा रहा हूं। वह इस रैली में इसलिए आए हैं कि उन्हें उम्मीद है कि उनका लोन माफ हो जाएगा और वह फ्रेश लोन लेकर अपनी जमीन में बोरवेल करा पाएंगे। उन्होंने बोरवेल के लिए लोन की मांग की थी लेकिन बैंक ने उनकी अरजी खारिज कर दी है।
रामराजे महादिक कॉटन की खेती करते हैं और पिंक बोलवॉर्म हमले के बाद उनकी पूरी खेती बरबाद हो गई। 10 क्विंटल कॉटन 2-3 क्विंटल में सिमट कर रह गया। 50 क्विंटल की जगह सिर्फ 12 क्विंटल की खेती ही मेरे हिस्से में आई सरकार ने कहा था कि हमें मुआवजा दिया जाएगा लेकिन अभी तक खराब हुई फसल का कोई मुआवजा नहीं मिला है।
उन्होंने कहा कि हमने तो पूरी मेहनत की लेकिन मौसम और कीड़े की मार ने हमारी खेती बरबाद कर के रख दी अब हम क्या करें।