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LS Polls: विदेश नीति में मोदी 3.0 में क्या होंगी प्राथमिकताएं, क्या भारत का विश्व गुरु का रुतबा रहेगा बरकरार?

Thu, 06 Jun 2024 11:26 AM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Thu, 06 Jun 2024 11:26 AM IST
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सार
अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने चुनावी जीत और हार पर टिप्पणी न करने के अमेरिकी रुख पर जोर देते हुए कहा कि पिछले छह हफ्तों में हमने जो देखा है वह इतिहास में लोकतंत्र का सबसे बड़ा अभ्यास है।
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LS Polls: What will be the priorities of Modi 3.0 in foreign policy, will India status as world leader remain
Modi 3.0 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में हो रहे लोकसभा चुनाव परिणामों पर पूरी दुनिया की नजरें थीं। पूरी दुनिया को उम्मीद थी प्रधानमंत्री मोदी तीसरे कार्यकाल में बड़े बहुमत के साथ लौटेंगे। प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे को आगे रख कर इस चुनाव में उतरने वाली भाजपा बहुमत से कुछ अंक दूर 240 पर आकर सिमट गई। हालांकि एनडीए गठबंधन को 272 के पूर्ण बहुमत से 292 सीटें ही आई हैं। वहीं, जैसे ही परिणाम एनडीए के पक्ष में आए, तो दुनियाभर के तमाम नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई दी। अमेरिका ने भी बड़ी सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए चुनावों के नतीजों पर टिप्पणी करने से परहेज किया। डिप्लोमेटिक सर्किल में इसके अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। वहीं अब ये भी अनुमान लगाए जा रहे हैं कि मोदी 3.0 में विदेश नीति को लेकर क्या प्राथमिकताएं होंगी? 



अमेरिका ने इन रिपोर्ट्स को किया खारिज
अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने चुनावी जीत और हार पर टिप्पणी न करने के अमेरिकी रुख पर जोर देते हुए कहा कि पिछले छह हफ्तों में हमने जो देखा है वह इतिहास में लोकतंत्र का सबसे बड़ा अभ्यास है। इतने बड़ी चुनावी प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करने और इसमें भाग लेने के लिए हम भारत सरकार और मतदाताओं की सराहना करते हैं। वहीं, उन्होंने उन रिपोर्ट्स को भी खारिज किया कि अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने भारतीय चुनावों में दखल देने की कोशिश की थी। उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिका और भारत के बीच करीबी साझेदारी जारी रहेगी।


भारत-अमेरिका भरोसेमंद भागीदार
वाशिंगटन में भारतीय पत्रकार सीमा सिरोही कहती हैं कि भले ही लोकसभा चुनावों में भाजपा को पहले की तरह स्पष्ट जनादेश नहीं मिला है, लेकिन राष्ट्रपति बाइडन के नेतृत्व में अमेरिका मोदी 3.0 के तीसरे कार्यकाल को बेहद सकारात्मक रूप से देखता है। वह कहती हैं कि भारत-अमेरिका के बीच साझेदारी मजबूत हुई है, कई मुद्दों को बेहद कुशलता पूर्वक सुलझाया है। बाइडन भारत को एक भरोसेमंद भागीदार और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक मजबूत शक्ति के तौर पर देखते हैं। वह कहती हैं कि भारत एक ऐसा देश है, जो अमेरिकी अधिकारियों की रातों की नींद हराम नहीं करता। हालांकि कुछ मुद्दों जैसे अल्पसंख्यकों पर भाजपा के रुख को लेकर चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं। 

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण
सीमा सिरोही आगे कहती हैं कि भारत की हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) रणनीति में अहम भूमिका है, ताकि इस इलाके को चीन के दबाव से मुक्त रखा जा सके। यहां भारतीय नौसेना की भूमिका लगातार बढ़ रही है। भारतीय नौसेना ने जिस तरह से हूथी विद्रोहियों के खिलाफ जो अभियान चलाया, वह इस बात का ताजा सबूत है। वहीं भारत क्वाड का भी एक अहम सदस्य है। वाशिंगटन को इस बात का पूरा अहसास है कि पिछले 10 वर्षों में भारत और अमरिका के बीच नजदीकियां बढ़ी हैं। वह कहती हैं कि बाइडन का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट है। वह चीन से हो रहे खतरे को समझते हैं, वहीं मोदी भी स्पष्ट दृष्टिकोण रखते हैं और उन क्षेत्रों में अमेरिका के साथ काम करने की इच्छा रखते हैं, जिन्हें करने के बारे में पहले कोई सोच भी नहीं सकता था। 

इस साल भारत आ सकते हैं अमेरिकी राष्ट्रपति 
पूर्व राजदूत राजीव भाटिया के मुताबिक विदेश नीति के मामले में नई सरकार चार प्रमुख प्राथमिकताओं पर फोकस कर सकती है। इनमें अमेरिका, यूरोपीय संघ, रूस, चीन और जापान जैसी बड़ी शक्तियों के साथ संबंध शामिल हैं। वह कहते हैं कि मोदी सरकार 3.0 इस साल क्वाड शिखर सम्मेलन आयोजित करने की भी कोशिश करेगी। क्योंकि अमेरिका और भारत में चुनाव होने से यह बैठक-बैठक बार-बार टल रही थी। चारों देशों के विदेश मंत्री इस साल जापान में मिल सकते हैं। क्वाड शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की बारी भारत की है और हो सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति भारत का दौरा करें। वह कहते हैं कि भारत इस साल रूस के साथ वार्षिक शिखर सम्मेलन भी आयोजित कर सकता है। पूर्व राजदूत भाटिया कहते हैं कि अपने तीसरे कार्यकाल में मोदी सरकार को चाहिए कि वह पड़ोसी देशों से संबंध सुधारे और पड़ोसी देशों के नेताओं को प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित करे। 

ट्रंप और बाइडन से हैं मोदी के अच्छे रिश्ते 
इंडो अमेरिकन फ्रेंडशिप एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष और अमेरिका और ब्रिटेन समेत कई देशों में उच्चायुक्त रह चुके पूर्व राजदूत सुरेंद्र कुमार कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ व्यक्तिगत समीकरण हैं। चाहे कोई भी नया अमेरिकी राष्ट्रपति बने या नया प्रधानमंत्री बने, भारत-अमेरिका संबंध शीर्ष पर बने रहेंगे। उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग का और विस्तार होगा। वह आगे कहते हैं कि  अपने तीसरे कार्यकाल में मोदी सरकार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में लंबे समय से अपेक्षित स्थायी सदस्यता पाने की कोशिश कर सकती है। इसके अलावा इस साल BIMSTEC शिखर सम्मेलन भी होना है। प्रधानमंत्री सितंबर 2024 में बैंकॉक में छठे BIMSTEC शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले सकते हैं। भारत बांग्लादेश, भूटान, पश्चिम एशिया, मालदीव, म्यांमार, ईरान और श्रीलंका के साथ मिलकर काम करेगा। 

पश्चिमी एशिया पर रहेगा फोकस
जेएनयू में पश्चिम एशियाई अध्ययन केंद्र में एसोसिएट प्रोफेसर एमडी मुदस्सिर कमर कहते हैं, भारत की विदेश नीति में पश्चिमी एशिया प्रमुखता से शामिल होगा। पिछले साल नई दिल्ली में जब जी-20 शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था, तब भारत ने मध्य पूर्व यूरोप आर्थिक गलियारा कनेक्टिविटी (IMEC) का एलान किया था। आईएमईसी एक प्राथमिकता है, चाहे सरकार कोई भी हो। क्योंकि अगर भारत पश्चिम एशिया के साथ व्यापार को और आगे बढ़ाना चाहता है, तो आईएमईसी पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र और यूरोप के साथ भी व्यापार की संभावना पैदा करेगा।

चीन और पाकिस्तान को लेकर यह होगी नीति 
भारत में चुनाव परिणामों को लेकर चीन के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि भाजपा बहुमत का आंकड़ा पाने में विफल रही। मोदी को अपने सहयोगी दलों पर निर्भर रहना होगा। इसलिए आर्थिक सुधार वाले फैसले लेना आसान नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार भी मानते हैं कि मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में चीन के साथ संबंध सामान्य नहीं रहने वाले हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर रिजवान अहमद कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि चीन और भारत के संबंध सामान्य होने वाले हैं। चीन भारत को अमेरिकी खेमे में देखता है और वह उसी के मुताबिक चलेगा। वह आगे कहते हैं कि जब तक भारत क्वॉड का हिस्सा है, तब तक उन्हें चीन के साथ संबंध सुधरने की उम्मीद नहीं लगती। गलवान घाटी में हुई हिंसा के बाद भारत ने यह स्टैंड लिया था कि जब तक सीमा पर हालात सामान्य नहीं हो जाते, तब तक दोनों देशों के बीच रिश्ते भी सामान्य नहीं हो सकते। देखा जाए तो यह रुख बेहद कड़ा है, लेकिन पीछे हटने की कोई सूरत नहीं है। 

वहीं पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारों को लेकर प्रोफेसर रिजवान कहते हैं कि भले ही पाकिस्तान भारत के साथ संबंध सुधारने की इच्छा रखता हो, लेकिन आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकती। पाकिस्तान आतंकवाद का पोषक रहा है और पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के आतंकी संगठनों से मधुर संबंध रहे हैं। पाकिस्तानी सेना पाकिस्तान के भीतर ही शांति बहाल नहीं होने देना चाहती, ऐसे में भारत के साथ शांति वार्ता तो दूर की कौड़ी है।

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