लगातार बयान देने वाले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत चुप क्यों हैं?
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देश में आम चुनाव चल रहा है। दो चरण का मतदान हो चुका है। तीसरे चरण के लिए 23 अप्रैल को मतदान होना है, लेकिन आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत चुप हैं? बुधवार को उद्योगपति रतनटाटा ने नागपुर जाकर आरएसएस प्रमुख से मुलाकात की। समझा जा रहा था कि इसके बाद संघ प्रमुख का कोई बयान आएगा, लेकिन वह कुछ नहीं बोले। संघ प्रमुख की यह खामोशी भाजपा और संघ के प्रचारकों, नेताओं में कौतूहल का विषय बन गई है। प्रयाग क्षेत्र के संघ के एक बड़े नेता इस सवाल को फिलहाल हंसकर टाल गए।
इलाहाबाद और बनारस में सक्रिय संघ के नेताओं को थोड़ा हैरानी हो रही है। कभी संघ के मशहूर चिंतक में शुमार वरिष्ठ सूत्र के अनुसार संघ प्रमुख के पास बोलने के लिए कुछ नहीं बचा है। संघ प्रमुख बोल सकते हैं, लेकिन वह बिना मतलब का कोई राजनीतिक बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहते। कुछ लोगों को मानना है कि ताजा राजनीतिक हालात से संघ प्रमुख भी असहज हैं।
केन्द्र सरकार की राम मंदिर निर्माण, जम्मू-कश्मीर, पाकिस्तान की नीति से भी वह खुश नहीं हैं। इस तरह के कुछ और कारण संभव है, जिसके चलते मोहन भागवत का कोई बयान नहीं आया। जबकि बिहार विधानसभा चुनाव के समय भी उनका बयान आया था और कई अन्य अवसरों पर वह सामाजिक संरचना के संदर्भ में ही सही अपनी बात रखते रहे हैं।
कब आया था पिछला बयान?
-संघ प्रमुख ने 11 अप्रैल को पहले चरण के मतदान में हिस्सा लेने के बाद एक सहज, स्वाभाविक बयान दिया था। इसमें उन्होंने नोटा का विरोध किया था। सभी के लिए मतदान को जरूरी और अनिवार्य बताया था। संघ प्रमुख ने इस दौरान देश के लोगों से किसी न किसी उम्मीदवार को अपना मत देने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि लोगों को राष्ट्रीय सुरक्षा, पहचान और विकास के लिए मतदान में हिस्सा लेना चाहिए।
-26 फरवरी को पुलवामा में आतंकी हमले के बाद आत्मरक्षा में भारत द्वारा बालाकोट पर की गई कार्रवाई के बाद संघ प्रमुख का बयान आया था। इसमें उन्होंने वायुसेना को बधाई देते हुए कहा था कि जवानों की तेरहवीं ठीक ढंग से हो गई।
-इससे पहले 6 फरवरी को आरक्षण के मुद्दे पर उनका बयान सामने आया था। इस बयान में उन्होंने कहा था कि जो आरक्षण के हकदार हैं, उसे इसका हक मिलना चाहिए।
-18 जनवरी 2019 को मोहन भागवत ने केन्द्र सरकार की जम्मू-कश्मीर नीति पर सवाल उठाया था। उनके इस बयान में सैनिकों के शहादत को लेकर चिंता साफ झलक रही थी। संघ प्रमुख ने सवालिया लहजे में कहा था कि युद्ध नहीं हो रहा है तो क्यों सैनिक शहीद हो रहे हैं।
लेकिन कुछ और नहीं बोले भागवत
संघ से जुड़े विचारक की माने तो वह मौन हैं। आरएसएस कभी राजनीति में नहीं पड़ता। संघ एक सामाजिक रचना से जुड़ा सांस्कृतिक महत्व का संगठन है। राष्ट्रीयता उसका धर्म है। संघ के दरवाजे सभी राजनीतिक दलों और भारतीयों के लिए खुले हैं। इसलिए संघ प्रमुख कोई बयान देकर संघ को किसी तरह की राजनीति में नहीं धकेलना चाहते।
बताते हैं इस स्थिति को सहज समझा जा सकता है। इस बारे में इलाहाबाद के संघ से जुड़े और पेशे से शिक्षक सूत्र का कहना है कि 2014 के चुनाव में अंदरूनी स्तर पर पूरी सक्रियता थी। प्रांत प्रचारक से लेकर अनुषांगिक संगठनों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में 2014 जैसी तेजी नहीं देखने को मिल रही है।
झांसी के संघ से जुड़े सूत्र की माने तो संघ के नेताओं की चुनाव प्रचार में मौजूदगी तो है, लेकिन उनमें 2014 के चुनाव जैसा उत्साह नहीं है। सभी का मानना है कि संघ प्रमुख का वक्तव्य आने पर संगठन में निचले स्तर तक एक ऊर्जा का संचार हो जाता है। इस बार अभी इसकी कमी साफ दिखाई दे रही है।