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नाराज रामदास आठवले ने कहा, एनडीए के साथ ही रहूंगा अगर मान ली यह मांग

Mon, 25 Feb 2019 06:51 PM IST
ललित फुलारा चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ललित फुलारा Updated Mon, 25 Feb 2019 06:51 PM IST
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Lok Sabha Elections 2019: Ram Das Athawale wants 2 seats from BJP-Shiv Sena alliance
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले - फोटो : अमर उजाला

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से नाराज चल रहे रामदास आठवले का कहना है कि वह आने वाले लोकसभा चुनाव में राजग के साथ ही रहेंगे लेकिन उनकी कुछ मांगे हैं। आठवले ने कहा कि उनकी पार्टी को दो सीटें चाहिए। उन्होंने साफ किया है कि उन्हें एक सीट शिवसेना और एक सीट भाजपा से चाहिए। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया-ए के अध्यक्ष रामदास आठवले ने कहा उन्हें एक सीट मुंबई और एक सीट मुंबई से बाहर से चाहिए।

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केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री रामदास आठवले, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से पिछले दो दिनों से अपनी नाराजगी खुलेआम जाहिर कर रहे थे। महाराष्ट्र में उनकी पार्टी को तवज्जो नहीं मिलने के चलते वे राजग से खफा थे। रामदास आठवले की पार्टी आरपीआई महाराष्ट्र में सीमित है। पार्टी के पास खुद का चुनाव चिन्ह तक नहीं है। महाराष्ट्र में जहां अनुसूचित जाति की जनसंख्या 11 फीसदी है उसमें रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया-ए का मत प्रतिशत 1 फीसदी से भी कम है। लोकसभा चुनाव के लिए जब पिछले हफ्ते महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना का गठबंधन हुआ था तो उसमें न ही आठवले को बुलाया गया और न ही उन्हें कोई सीट दी गई थी।

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रामदास आठवले महाराष्ट्र में अनुसूचित जाति की राजनीति के बड़े चेहरों में से एक हैं। क्रांतिकारी कवि और सामाजिक कार्यकर्ता नामदेव ढसाल ने जब महाराष्ट्र में 1972 में दलित पैंथर्स की स्थापना की तो आठवले भी उनके साथ सक्रिय हुए। यह वह दौर था जब महाराष्ट्र में आठवले और शिव सैनिकों की भिड़ंत आम बात थी। इसके बाद आठवले ने पूरे महाराष्ट्र में घूमकर अनुसूचित जाति को अपने पक्ष में इकट्ठा किया।


1980 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार ने आठवले के कौशल को पहचाना और उन्हें अपनी सरकार में सामाजिक कल्याण मंत्री बनाया। यहीं से आठवले की राजनीति शुरू हुई। सन 1980 के मध्य से लेकर 2011 तक रामदास आठवले की पार्टी कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ गठबंधन में रही। 2014 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आठवले ने कांग्रेस-एनसीपी से अपना गठबंधन तोड़ लिया और राजग का दामन थामा।

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