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Hindi News ›   India News ›   Lok Sabha Elections 2019: LK Advani may slam government again after blog

आडवाणी सही समय पर अभी और बयां करेंगे अपने दिल का हाल!

Fri, 05 Apr 2019 07:24 PM IST
शशिधर पाठक शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: शशिधर पाठक Updated Fri, 05 Apr 2019 07:24 PM IST
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Lok Sabha Elections 2019: LK Advani may slam government again after blog
लाल कृष्ण आडवाणी - फोटो : PTI

भाजपा के स्थापना दिवस से ठीक दो दिन पहले पांच साल से ठप पड़े ब्लॉग को तरोताजा करके लालकृष्ण आडवाणी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को अपने मन का संदेश दे दिया है। उन्होंने ब्लॉग में परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की वर्तमान नीतियों पर जमकर भड़ास निकाली है, लेकिन भाजपा के भीष्म पितामह इतने भर से चुप बैठने वाले नहीं हैं। सूत्र बताते हैं कि जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आएगी, आडवाणी जी अपने वक्तव्य के जरिए आक्रामक होते जाएंगे।

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आडवाणी लिख सकते हैं दूसरा ब्लॉग

सूचना यही है कि आडवाणी ब्लॉग की दूसरी कड़ी लिखने की तैयारी कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि ब्लॉग की पहली किश्त प्रसारित होने के बाद मीडिया और सोशल मीडिया ने इसे हाथों-हाथ ले लिया। इसके बाद आडवाणी के घर की टेलीफोन की सभी लाइनें लगातार घनघनाने लगीं। उम्रदराज और पुराने नेताओं ने भी आडवाणी जी संपर्क की कोशिश की है। फिलहाल वह शांत और संयत रहकर अपनी पीड़ा को एक रास्ता देने की तैयारी कर रहे हैं।
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वाजपेयी के नाम को आगे किया 

यह आडवाणी के करीबी जानते हैं। आडवाणी ने ऐसा दो बार किया। जब वह खुद नेतृत्व संभालने की बजाय खुद पहल करके अटल जी के नेतृत्व में काम करने के लिए राजी हो गए। आडवाणी को पहला प्रस्ताव पहली बार सरकार बनने की स्थिति से पहले आया था। संघ चाहता था कि वह लीड करें। राम मंदिर आंदोलन के लिए सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा ने आडवाणी को भाजपा का हीरो बना दिया था। संगठन पर आडवाणी की मजबूत पकड़ थी, लेकिन आडवाणी ने अपनी सोच और सिद्धांत को वरीयता देकर अटल बिहारी वाजपेयी के नाम को आगे किया। अटल पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री बने और आगे बढ़कर नेतृत्व किया।
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दूसरा अवसर आडवाणी को उप प्रधानमंत्री बनाए जाने के पहले आया था। बताते हैं तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अटल की जगह आडवाणी को प्रधानमंत्री देखना चाहता था। आडवाणी के गुट के भाजपा नेता भी यही चाहते थे। लेकिन बताते हैं तब भी आडवाणी ने निजी स्वार्थ को पीछे धकेला। अटल की तरफ से उप प्रधानमंत्री पद का प्रस्ताव आया और आडवाणी ने पत्नी कमला और बेटी प्रतिभा आडवाणी की सलाह मानकर उप प्रधानमंत्री बनना कुबूल कर लिया। वह अटल से नहीं टकराए। 


सिद्धांतों को रखा ऊपर 

आडवाणी ने ब्लॉग में लिखा है। उनके लिए सबसे पहले राष्ट्र, फिर पार्टी और अंत में वह (निजी हित) हैं। आडवाणी के करीबियों का कहना है कि यह अक्षरश: सही है। आडवाणी जीवन भर राष्ट्रीय संप्रभुता को केंद्र में रखकर पार्टी के विचारों, सिद्धांतों के लिए संघर्ष करते रहे। उन्होंने कभी परिवारवाद की राजनीति नहीं की। पार्टी के हितों, सिद्धांतों को सबसे ऊपर रखा। उनके इस रास्ते में कभी अटल बिहारी वाजपेयी भी नहीं आए और आडवाणी की इसी सोच, उनके समर्पण ने भाजपा के संगठन पर उनकी मजबूत पकड़ बनाई थी। अब आडवाणी कुछ कह रहे हैं।
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