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लोकसभा चुनाव: भाजपा राष्ट्रवाद के सहारे तो विपक्ष के पास सामाजिक समीकरणों का हथियार

Sun, 10 Mar 2019 07:54 PM IST
Gaurav Pandey विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Gaurav Pandey Updated Sun, 10 Mar 2019 07:54 PM IST
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Lok Sabha Elections 2019: BJP depends on nationalism, Opposition on social equation

चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनावों की तारीखों के एलान के साथ ही देश में चुनावी महासमर की बिसात बिछ गई है। पुलवामा आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में भारतीय वायुसेना द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर की गई बमबारी के बाद से प्रखर राष्ट्रवाद की लहरों पर सवार भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनावों का अपना एजेंडा तय कर लिया है। कभी जिन भगवान श्रीराम के सहारे दो लोकसभा सीटों से सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए 2014 में भाजपा 283 सीटों की पूर्ण बहुमत की सरकार तक पहुंची थी। 

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राम आज नेपथ्य में चले गए हैं और भाजपा ने राष्ट्र को अपना चुनावी मुद्दा बनाया है। उधर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस मोदी सरकार को राफेल के मुद्दे पर लगातार घेरकर भाजपा के राष्ट्रवाद की धार कुंद करने में जुटी है। इसके साथ ही कांग्रेस विपक्षी एकता और सामाजिक व जातीय समीकरणों को साधकर भाजपा के हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद का मुकाबला करने की तैयारी में है।
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2014 के लोकसभा चुनावों में जब भाजपा कांग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए सरकार को चुनौती दे रही थी, तब उसके पास अन्ना आंदोलन से कांग्रेस और यूपीए सरकार के खिलाफ उभरे जन असंतोष का ज्वार था और तमाम घोटालों और नीतिगत विकलांगता के बोझ से दबी कांग्रेस बुरी तरह लड़खड़ा रही थी। जबकि भाजपा के पास नरेंद्र मोदी जैसा लोकप्रिय चेहरा था जो अपने गुजरात मॉडल की सफल मार्केटिंग करके पूरे देश के कायापलट की उम्मीदें लोगों में जगा चुका था। इसके साथ ही भाजपा ने अपने जातीय और सामाजिक समीकरण भी साधे थे। 
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एक तरफ गोधरा कांड और उसके बाद हुई गुजरात हिंसा के बाद से ही नरेंद्र मोदी हिंदुत्व का प्रखर चेहरा बन चुके थे तो 2013 में उन्होंने एक सम्मेलन में मंच पर एक मुस्लिम धर्मगुरु द्वारा भेंट की जाने वाली जालीदार टोपी पहनने से इंकार करके अपनी इस छवि को और मजबूत कर लिया था। इसके साथ ही गुजरात मॉडल को विकास और सुशासन की नजीर बनाकर पेश करने के बाद मोदी विकास और सुशासन पुरुष भी बन चुके थे। 

भाजपा ने जातीय समीकरण भी साधे थे

इसके बावजूद भाजपा ने बिहार में रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और उत्तर प्रदेश में अपना दल से गठबंधन करके उत्तर भारत में जातीय समीकरणों को भी साधा था। इस तरह 2014 में बनी मोदी सरकार की इमारत में जातीय समीकरणों की ईंटें थीं, तो हिंदुत्व का सीमेंट सुशासन का पलस्तर और विकास का पेंट भी था। तब तक राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को परखा नहीं गया था,लेकिन उनके जोशीले भाषणों, चुटीले अंदाज और तूफानी चुनाव प्रचार ने देश भर में मोदी लहर पैदा कर दी थी।

लोगों की उम्मीदें आसमान पर थीं और सपनों को पंख लग गए थे। नतीजा भाजपा के लिए 283 और एनडीए के लिए 337 सीटों की जीत के रूप में सामने आया। विपक्ष बुरी तरह धराशायी था। कभी पूरे देश पर एकछत्र शासन करने वाली कांग्रेस महज 44 सीटों पर सिमट गई थी। लेकिन पिछले पांच सालों में गंगा, यमुना, कावेरी, साबरमती, ब्रह्मपुत्र और महानदी में काफी पानी बह चुका है। 

लोगों के सामने पांच साल की मोदी सरकार के कामकाज का लेखा जोखा है। स्वच्छता मिशन,जनधन खाते, उज्ज्वला योजना, किसान सम्मान राशि, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना, फसल बीमा योजना,शेष 18 हजार गावों में बिजली पहुंचाने, किसानों की आय दोगुनी करने की नीति, करदाताओं की संख्या में वृद्धि, बुनियादी सुविधाओं के विकास जैसे कार्यक्रमों की उपलब्धियां और दावे अगर सरकार के पक्ष में हैं तो 2014 में किए गए विदेशी बैंकों से लाखों करोड़ रुपए के काले धन की स्वदेश वापसी और सबके खातों में 15-15 लाख रुपए पहुंचने, प्रति वर्ष दो करोड़ लोगों को रोजगार देने, किसानों को फसल के न्यूतम समर्थन मूल्य में 50 फीसदी की वृद्धि, महिलाओं पर अत्याचारों पर लगाम, सीमाओं पर शांति और आतंकवाद पर पूर्ण लगाम, कश्मीर में सामान्य स्थिति की बहाली, आंतरिक सुरक्षा और अमन चैन की बहाली, नक्सलवाद का खात्मा और गंगा की प्रदूषण से पूर्ण मुक्ति जैसे वादों के पूरा न हो पाने का बोझ भी है। 

इसके अलावा नोटबंदी और जीएसटी से चरमराए व्यापार और मझोले व छोटे उद्यमियों की पीड़ा, किसानों की दुर्दशा और गोरक्षा के नाम पर जगह जगह हुई भीड़ हिंसा व बिगड़े सामाजिक सौहार्द का ठीकरा भी विपक्ष सरकार और भाजपा के ऊपर फोड़ रहा है। भाजपा के मूल जनाधार हिंदुत्ववादियों में अपनी पूर्ण बहुमत की केंद्र सरकार, 20 राज्यों में भाजपा और सहयोगी दलों की सरकार , राष्टपति, उपराष्ट्रपति भाजपा के बन जाने के बावजूद राम मंदिर न बन पाने, समान नागरिक संहिता लागू न होने, जम्म कश्मीर से अनुच्छेद 370 न हटाए जाने जैसे पुरातन मूल हिंदुत्ववादी मुद्दों के पूरा न होने की टीस भी है।

2014 से 2019 के सियासी समीकरणों की तस्वीर भी अलग

बीते पांच सालों में 2014 लोकसभा चुनावों के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, असम, त्रिपुरा की चुनावी जीत, गोवा, मेघालय,  मणिपुर में पिछड़ने के बावजूद सरकार बना लेने की रणनीति की कामयाबी अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी के खाते में दर्ज है तो दिल्ली, बिहार.पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान,छत्तीसगढ़ की चुनावी हार, गुजरात में कांग्रेस के साथ कांटे की टक्कर और कर्नाटक में सारी ताकत लगाने क बावजूद बहुमत से दूर रहने और सरकार हाथ से फिसल जाने की विफलता ने मोदी और भाजपा की अजेयता का मिथक भी तोड़ दिया है।

लोकसभा चुनावों से छह महीने पहले हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उत्तर भारत के तीन बड़े राज्यों मध्य प्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ को भाजपा से छीनकर कांग्रेस ने न सिर्फ अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा दिया बल्कि लगातार हार का आरोप झेल रहे अपने नेता राहुल गांधी की स्वीकार्यता भी बढ़ा दी है।

इसके साथ ही 2014 से 2019 के सियासी समीकरणों की तस्वीर भी अलग है। एनडीए से तेलुगू देशम और उपेंद्र कुशवाहा बाहर जा चुके हैं, जबकि नीतीश कुमार एनडीए के साथ आ गए हैं।उत्तर प्रदेश में कभी एक दूसरे के कट्टर विरोधी रहे सपा और बसपा एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। इनकी एकता की एक बानगी गोरखपुर, फूलपुर और कैरान के लोकसभा उपचुनावों और नूरपुर के विधानसभा उपचुनाव में मिल चुकी है और जिसने भाजपा नेतृत्व की पेशानी पर बल बढ़ा दिए हैं। अब सपा बसपा और अजित सिंह के रालोद का मजबूत गठबंधन बन चुका है। कांग्रेस अगर उत्तर प्रदेश में अलग भी लड़ती है तो इनके साथ कुछ सीटों पर समझदारी भी बना सकती है।

इन चुनावों में सामाजिक समीकरणों के महत्व को दोनों खेमे समझ रहे हैं। इसीलिए अपने तमाम अडियल पन को छोडकर भाजपा नेतृत्व ने बिहार में नीतीश कुमार और रामविलास पासवान और महाराष्ट्र में तमाम तल्खी के बावजूद शिवसेना के साथ बेहद उदारता दिखाई और सीट बंटवारे का मामला सुलटा लिया है। तमिलनाडु में भी भाजपा ने अन्ना द्रमुक का दामन थाम लिया है।

हालाकि जयललिता विहीन अन्ना द्रमुक इस बार करुणानिधि विहीन लेकिन स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रमुक कांग्रेस गठबंधन का कैसे मुकाबला कर पाएगी यह एक अहम प्रश्न है।उधर कांग्रेस ने तमिलनाडु में द्रमुक के साथ, बिहार में राजद के साथ, झारखंड में झामुमो के साथ, महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ, कर्नाटक में जद(एस) के साथ गठबंधन बना लिया है। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस और तेदेपा और जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस के बीच भी सहमति बन रही है।अभी दिल्ली, उत्तर प्रदेश असम में कांग्रेस के गठबंधन पर किंतु परंतु हैं।

चुनौतियां भी कम नहीं

भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि जिन राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, छत्तीसगढ, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश,असम, कर्नाटक,महाराष्ट्र में अपने पिछला प्रदर्शन दोहराने की है।इन राज्यों में 2014 में भाजपा ने अधिकतम सीटें जीती थीं और विपक्ष का लगभग सफाया कर दिया था। राजस्थान और गुजरात में तो भाजपा ने सभी सीटें जीती थीं। उत्तर प्रदेश में सपा बसपा रालोद गठबंधन भाजपा की कामयाबी की राह को रोक सकता है तो मध्म प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में हाल ही की जीत से उत्साहित कांग्रेस भाजपा से ज्यादा से ज्यादा सीटें छीनने की कोशिश करेगी। भाजपा को यहां अपनी सीटें बचाने की चुनौती है।

गुजरात में भी भाजपा का पलड़ा भारी रहने के बावजूद क्या पार्टी फिर सारी सीटें जीत पाएगी, यह यक्ष प्रश्न है। बिहार में नीतीश के साथ आने से भाजपा के सामाजिक समीकरण सुधरने की उम्मीद है लेकिन कुशवाहा के बाहर जाने और राजद कांग्रेस गठबंधन में शामिल होने का क्या असर पड़ेगा यह भी अहम सवाल है। झारखंड में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस झामुमो झाविमो राजद गठबंधन की कठिन चुनौती है।कर्नाटक में कांग्रेस जद(एस) गठबंधन भाजपा के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है।

भाजपा नेतृत्व इसे समझ रहा है। इसलिए उसने अपने प्रभाव क्षेत्र में होने वाले संभावित घाटे की भरपाई के लिए प.बंगाल, पूर्वोत्तर, उड़ीसा,तमिलनाडु और केरल में अतिरिक्त सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है।लेकिन भाजपा के लिए नागरिकता कानून के मुद्दे ने पूर्वोत्तर में उसके लिए खासा संकट पैदा कर रखा है, जबकि प.बंगाल में भाजपा को रोकने के लिए ममता बनर्जी एड़ी चोटी का जोर लगा रही हैं।हालाकि भाजपा ने यहां हिंदू ध्रुवीकरण का कार्ड खेला है। शबरीमला के बहाने यही कार्ड भाजपा ने केरल में भी खेला है। तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक का उसे सहारा है। उड़ीसा में भी भाजपा पूरा जोर लगा रही है। 

राष्ट्रवाद की लहर और सामाजिक समीकरणों की आंधी के बीच होगा यह चुनाव

इस चुनाव में कुछ दल जो एनडीए और यूपीए से अलग होकर मैदान में उतर रहे हैं, उनमें तेलंगाना में टीआरएस, उड़ीसा में बीजद और आंध्र में जगन रेड्डी प्रमुख हैं। भाजपा को चुनाव बाद इनसे सहयोग की उम्मीद है। जहां तक चुनावी मुद्दों की बात है तो भाजपा पिछले चुनाव के अपने वादों की चर्चा शायद ही करे, लेकिन वह अपने पांच साल की सरकार के दौरान किए गए कामों मसलन स्वच्छता अभियान, जनधन खाते, मुद्रा ऋण, किसान फसल बीमा योजना, किसान सम्मान राशि, आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना, मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, डिजिटल इंडिया, पांच लाख रुपए की आय पर आयकर छूट, किसानों को लागत का डेढ़ गुना मूल्य आदि को अपनी उपलब्धियों के रूप में पेश करेगी।

लेकिन उसे नोटबंदी, जीएसटी से अर्थव्यवस्था और कारोबार को हुए नुकसान, कर्ज में डूबे किसानों की दुर्दशा, रोजगार की खराब स्थिति, बिगड़ते सामाजिक सौहार्द, नीरव मोदी मेहलु चौकसी विजय माल्या की फरारी और राफेल पर लगातार सरकार की बढ़ती उलझनों के हमलों को भी झेलना होगा। 

भाजपा को भरोसा है कि मोदी की आक्रामक भाषण शैली और संवाद कला विपक्ष के सारे सवालों को खत्म कर देगी और जब मोदी कहेंगे कि हम घर में घुसकर मारेंगे तो राष्ट्रवाद की एसी आंधी चलेगी जिससे भाजपा की झोली वोटों और सीटों से भर जाएगी। वहीं विपक्ष को पूरी उम्मीद है कि इस बार लोग मोदी के भाषणों के झांसे में नहीं आएंगे और पिछले पांच सालों में नोटबंदी जीएसटी से जो तकलीफ उन्हें हुई है, उसका हिसाब चुनाव में लेंगे।

दलितों पर जो हमले बढ़े हैं, अल्पसंख्यकों में असुरक्षा पैदा हुई है और किसानों की तकलीफें लगातार बढ़ी हैं, इसका खामियाजा भाजपा को हार के रूप में भुगतना पड़ेगा। जहां तक सर्जिकल स्ट्राईक और राष्ट्रवाद का मुद्दा है तो विपक्ष को भरोसा है कि राफेल पर जिस तरह सरकार फंसती जा रही है, इससे भाजपा के ईमानदार शासन और राष्ट्रवाद के नारे की पोल भी जनता के बीच खुल रही है। कुल मिलाकर दोनों खेमे अपने-अपने दावों के साथ मैदान में उतर रहे हैं और 2019 का लोकसभा चुनाव राष्ट्रवाद की लहर और सामाजिक समीकरणों की आंधी के बीच है।

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